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Power equation: शक्ति-समीकरण

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पुलिस का काम टेढ़ी खीर है। वास्तव में ये डारविन के विकासवाद के सिद्धांत को झूठा साबित करने की कभी ना खत्म होने वाली जद्दोजहद है। आदमी के उत्पत्ति के बारे में धर्म और विज्ञान की अलग-अलग राय है। पहले का कहना है कि भगवान ने दुनियां बनाई है। उसकी मर्जी के बिना पत्ता भी हिलता। सबको अपने कर्मों का फल मिलता है। विज्ञान का कहना है कि ऐसा कुछ नहीं है। आदमी करोड़ों साल की विकासवाद की प्रक्रिया की उपज है, बंदरों से निकली एक प्रजाति है। वातावरण के हिसाब से ढलते-ढलते इसने आधुनिक मानव का रूप ले लिया है। जो प्रजाति नहीं ढल पाती वो विलुप्त हो जाती है।
आदमी की कल्पनाशीलता इसकी ताकत है। इसके बूते ये प्रकृति से लगातार संघर्ष करता रहता है। इससे रियायतें लेता रहता है। इसी क्रम में इसने प्रजातंत्र जैसी राजनीतिक व्यवस्था बनाई है जो विकासवाद के सिद्धांत को उलटने की बात करती है। इसका आश्वासन है कि शेर और बकरी एक ही घाट में पानी पिएं। शेर को अपनी ताकत को गुमान और बकरी को अपनी कमजोरी का मलाल नहीं होना चाहिए। हकीकत में ऐसा हो नहीं पाता। शेर दाव लगते ही पंजा मार देता है। बकरी थर-थर कांपती रहती है कि पुलिस के आते-आते शेर कहीं उसका काम तमाम ही ना कर दे। बल-बुद्धि की विषमता को सरकारी प्रयास से पाटने का संकल्प जितना अद्भुत है इसे अंजाम तक पहुंचाना उतना ही कठिन है। आदमी एक-दूसरे के पीछे लगा ही रहता है। बाहुबली शिकार में जुटे रहते हैं। लुट-पिट गए बाप-बाप करते रहते हैं। तमाशबीन और खबर्ची पुलिस और सरकार को लानतें भेजते रहते हैं।
प्रजातंत्र में सरकारें लोग चुनते हैं। इसीलिए सरकार के प्रति लोगों के संतुष्टि का स्तर मायने रखता है। अभी की तो छोड़िये, सैकड़ों साल पहले जहांगीर तक ने अपने किले के आगे न्याय का घंटा लगवा रखा था। कोई पीड़ित हो तो आधी रात को भी इसे बजाकर इंसाफ की गुहार लगा सकता था। अपने क्षवि के प्रति सजग अन्य राजाओं ने भी प्रजा-हितैषी और न्यायप्रिय होने की कहानी रची। प्रजातंत्र में लोगों के लिए न्याय तो सरकारों का आक्सिजन है। ये अलग बात है कि हमारे देश में ये एक कुटीर उद्योग की तरह फल-फूल रहा है। बिचौलियों की एक लम्बी-चौड़ी फौज भिन्न स्तर पर लोगों और सरकारी अमलों को मिलाने में लगी है। ले-देकर काम करवाने में जुटी है। तेज-तर्रार और महत्वाकांक्षियों के लिए तो ये तरक्की की पहली और जरूरी सीढ़ी है। चपरासियों और बिना दरकार के सुरक्षाकर्मियों का घेरा तोड़ किसी सरकारी दफ्तर को लांघना आम लोगों के लिए आसान नहीं होता है। किसी तरह घुस भी गए तो काम हो ना हो, बेइज्जती तो होनी ही होनी है। थक-हार कर लोग बिचौलियों के शरणागत होते हैं।
लोगों के समस्या समाधान के प्रति सरकारी लोगों में बेरुखी से निजात पाने के लिए बड़ी कोशिशें हो रही है। इंफारमेशन टेक्नॉलजी के जरिए लोगों को सरकार के शिखर से जोड़ा जा रहा है। सर्वे द्वारा उनकी तसल्ली के स्तर के बारे में भी पूछा जा रहा है। लेकिन जिधर भी जाएं, सरकारी दफ्तरों के आगे लोग अपनी बदहाली का रोना रोते मिलेंगे। थाने-तहसील संभाल रहे कर्मी कह देते हैं कि जहां मर्जी जाओ, लौट कर तो इधर ही आओगे। पानी तो पुल के नीचे से ही गुजरेगा। होता भी यही है। ये बेबसी सरकार के प्रति लोगों में असंतोष का कारण बनती है।
2016-17 में मैं हिसार रेंज का आईजी था। वहां भी यही दिक्कत थी। हवलदार-थानेदार-डीएसपी-एसपी से निराश लोग मेरे दफ्तर पहुंच जाते थे। प्रथा थी कि इनकी शिकायत को एसपी को भेज उनसे जांच करवा ली जाय। अगर मसला गम्भीर हो तो ऐक्शन-टेकन रिपोर्ट भी मंगवा लिया जाय। वो आगे मार्क होते-होते थानेदार तक पहुंच जाती। पूरी परिक्रमा के बाद फरियादी वापस उसी थानेदार के पास पहुंच जाता जिससे तंग होकर उसने अपनी महायात्रा शुरू की थी। काम क्या होगा, ताने सुनने की जलालत झेलनी पड़ती कि हो आए ऊपर? क्या उखाड़ लिया?
मेरा मानना है कि ऐसा नहीं है कि पुलिसकर्मी संवेदनहीन हैं या इन्हें बात करना नहीं आता। अपनों के लिए तो बड़े-बड़े पापड़ बेलते हैं। जो इनकी कुर्सी हिला सकते हैं, उनके आगे तो इनके मुंह से चासनी बरसती है। बेरुखी और बदसलूकी तो ये एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। हड़काएंगे नहीं तो लोग बिचौलियों के पास कैसे भागेंगे? सेटिंग कैसे होगी? मैंने नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे और फिर नीचे से ऊपर के इस फिजूल के सफर का एक काट निकाला। शिकायत-कर्ताओं से पूछने लगा कि सबसे पहले उसका मामला किस पुलिस अधिकारी ने डील किया था। फिर फोन मिलाकर उसको शिकायती का फोन नम्बर नोट करवा देता। साथ में कह देता कि इनसे बात कर लो। अगर इनकी बात किसी और महकमें से जुड़ी है तो उधर इसकी पैरवी कर दो या शिकायत सीएम विंडो पर डाल दो। अगर इनकी शिकायत गलत है तो इनको समझा दो कि कानूनी अपराध है, वापस जाओ। अगर इनकी बात सही हो तो एक तय समय-सीमा में इनका काम कर दो। साथ में कहता कि अगर उपरोक्त एक्शन नहीं लिया तो अगले सप्ताह शिकायतकर्ता को लेकर मेरे पास आ जाओ।
परिणाम उत्साहवर्धक रहे। अफसरों की खरी-खोटी के डर से वे पीड़ितों से सीधे मुंह बात करने लगे। उन्हें शांत रखने की गरज से कोक-चाय-जूस पिलाने लगे। दो-चार ही वापस आए। सर्वे करवाया तो सौ में पंचानवे ने कहा कि वे पुलिस एक्शन से खुश हैं। इससे दो बात साबित होती है। एक, कम्प्यूटर आदमी का विकल्प नहीं है। लोगों को समस्या-समाधान के साथ सकारात्मक बात-व्यवहार भी चाहिए। दूसरे, परिवर्तन के लिए लम्बे-चौड़े बजट और सालों के समय की जरूरत नहीं है। शक्ति-समीकरण बदल दें तो सबकुछ बदल जाता है।
ओपी सिंह
(लेखक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं। यह इनके निजी विचार हैं।)

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