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Passing through the corona period: कोरोना काल से गुजरते हुए

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मेरा शुरू से यह मानना रहा है, कि कोरोना को लेकर पूरी दुनियाँ भर की सरकारों ने हबड़-तबड़ मचा दी, जिससे पब्लिक में खौफ भर गया। ऐसा लगा, मानों कोरोना के अलावा और कोई बीमारी नहीं है। याद करिए, जब कोरोना की दस्तक चीन के वुहान शहर में हुई थी, तब अमेरिका और उसके मित्र व उसके दबाव में आने वाले तमाम देशों ने इसे चीन का एक कुचक्र समझा था। भारत चूँकि आजकल नया-नया अमेरिका का दोस्त हुआ है, इसलिए वह यह प्रचारित करने में सबसे आगे था।
किंतु जब यह ईरान, इटली, फ्रÞांस, इंग्लैंड होते हुए अमेरिका पहुँचा, तब  हबड़-तबड़ मच गई। अमेरिका, योरोप के देशों ने फौरन कदम उठाए और इसके फैलाव पर अंकुश लगाया। मगर भारत सरकार तब तक अचेत रही। पहले तो यह समझा गया, कि यह ठंडे मुल्क में ही फैलता है। फिर कहा गया, कि कोरोना खाते-पीते समृद्ध लोगों की बीमारी है। और भारत में चूँकि लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक है, इसलिए फिक्र की कोई बात नहीं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी पुत्री-दामाद के साथ भारत आए। अहमदाबाद की एक सभा में गए और आगरा का ताजमहल देखने भी। इस यात्रा के बाद अचानक एक दिन 20 मार्च को प्रधानमंत्री टीवी पर आए और देश को कोरोना महामारी की भवावहता के बारे में बताते हुए 22 मार्च को पूरे देश में टोटल कर्फ़्यू लगाने का ऐलान किया। यह भी कहा, कि उसी दिन शाम को पाँच बजे लोग अपनी-अपनी छतों या बॉलकनी पर कोरोना से लद रहे बहादुरों- डॉक्टर, नर्सों, पुलिस वालों के सम्मान में घंटे, घड़ियाल बजाएँ। यह टोटका भी किया गया। और इसके बाद 25 मार्च से देश में तीन हफ़्तों के लिए कंप्लीट लॉक डाउन की घोषणा हो गई।
इसके बाद का हाल यह है, कि हम सात महीनों से अपने-अपने घरों में कैद हैं। और 20 अक्तूबर को प्रधानमंत्री ने अपने उदबोधन में फिर यह भय दिखाया। सच बात तो यह है, कि अधिकांश लोग हतप्रभ रह गए। उन्हें समझ ही नहीं आया कि कोरोना वायरस के कारण विश्व भर में उत्पात मचाये कोविड-19 कैसी बीमारी है, जो लोगों को आइसोलेशन की तरफ धकेल रही है। जब समाज में परस्पर प्रेम, सद्भाव, निकटता और संवाद पर जोर हो, तब यह बीमारी हमें अकेलेपन में जाने की सलाह देती है, और आपसी संवाद से हमें विलग करती है। यह कोई बीमारी है, या राजनीति का वैश्विक शिगूफा? उस वक्त ही लोगों को यह लग गया था, कि भले आज हम भयाक्रांत हैं, लेकिन यह सवाल उठेगा जरूर, कि यह असल में कोरोना कोई बीमारी थी? क्योंकि 2020 की शुरूआत से ही पूरा विश्व आर्थिक महामारी की तरफ जा रहा था। मार्केट में खरीदार कम हो रहे थे बाजार उत्पाद से भरा हुआ था। लेकिन किस तरह के उत्पाद थे वे? सिर्फ विलासिता के और आपसी मारकाट करने के उत्पाद थे। मानवता की सेवा के उत्पाद न के बराबर थे। और यह पोल तब खुली, जब पाया गया, कि इतने चिकित्सकों, खोजों और रिसर्च के बाद भी कोरोना वायरस से मुक्ति की कोई दवा हमारे पास नहीं है। साल भर बीतने के बाद भी नहीं बन सकी है। किसी भी मुल्क में न तो पर्याप्त संख्या में चिकित्सक हैं, न अस्पताल और न ही मेडिकल किट। तब फिर क्या लाभ हुआ, इस तरह के विकास का, जो सिर्फ लड़वाता है! यह विकास एक तरह का ढोंग साबित हुआ। ऐसे समय में दिल्ली के कौटिल्य बुक्स से प्रकाशित और अरुण त्रिपाठी, डॉ. एके अरुण और डॉ. अनिल चतुवेर्दी द्वारा संपादित पुस्तक कोरोना काल यह सोचने को विवश तो करती है कि हम कैसे समय में खड़े हैं। कोरोना काल पुस्तक में कोरोना और उसकी भयावहता पर लिखे गए 42 लेखों का संकलन है। पहला लेख उस पत्रकार की आपबीती है, जो शायद सबसे पहले कोरोना की चपेट में आया। योगेश जादौन अप्रैल की शुरूआत में ही इसकी चपेट में आ गए थे। और अपनी जिजीविषा के चलते ये उससे शीघ्र ही मुक्त हुए। उन्होंने यह लेख उन शुरूआती दिनों में ही लिखा था तथा बहुत चर्चित हुआ था।
एक बात तो योगेश ने साबित कर ही दी थी, कि खौफ को भगाओ तो किसी से भी जीता जा सकता है। इस संकलन में 23 लेख पत्रकार/ संपादक अरुण त्रिपाठी के हैं। उन्होंने कोरोना के राजनीतिक दुश्चक्र का बेबाकी से खुलासा किया है और इसी बहाने यह भी बताया है, कि कैसे खाते-पीते वर्ग ने मजदूरों की पीड़ा को झुठला दिया। इस वर्ग ने या तो उनका मजाक उड़ाया अथवा नई अर्थनीति में उन्हें हाशिये पर डाल देने की साजिÞश रची। और न सिर्फ़ मजदूर बल्कि समाज के निचले पाँवदान में खड़े हर व्यक्ति को कोरोना के बहाने पीछे ढकेला गया। इसमें मजदूरों के अलावा औरतें सर्वाधिक शिकार हुईं। सबसे पहले उन्हें ही नौकरी से हटाया गया।
रेल पटरियों की पटरी पर बिखरी रोटियों को समेटने में 16 मजदूर कट मरे। इस सूचना पर न सरकार गंभीर हुई न विरोधी दल न मीडिया। इस पर अरुण त्रिपाठी आगि बड़वागि ते बड़ी है आग पेट की शीर्षक से लिखे अपने लेख में यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं, कि तुलसी के राम के भरोसे आई सरकार तुलसी द्वारा उठाये गए पेट की आग के सवाल को भूल गई। जनता कहाँ जाई का करी! बोलते हुए बेचैन है, किंतु राजा मयूर नचाने में। डॉक्टर अनिल चौधरी ने इस आपदा में किसानों पर पड़ी मार को बहुत ही तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया है। उपज, किसानों की लागत और कीमतों पर बेबाकी के साथ लिखा है।
किसान के पास न ट्रांसपोर्ट के साधन हैं न भंडारण की क्षमता तो वह कैसे किसानी से अपना और अपने परिवार का खर्च चलाएगा। डॉक्टर एके अरुण ने बताया है, कि जब इतना भीषण संकट हो तो सरकार एलोपैथी के अलावा अन्य चिकित्सा पद्धतियों की क्यों उपेक्षा कर रही है। जबकि होम्योपैथी में कई ऐसी दवाएँ हैं, जो इससे लड़ने में सक्षम हैं। लेकिन एलोपैथी का बाजार बहुत ताकतवर है, इसलिए सरकार होम्यो दवाओं के प्रति उदासीन है। अपने एक अन्य लेख वायरसों की अनोखी दुनिया में वे कई धारणाओं का खंडन करते हुए वे लिखते हैं, कि वायरस वर्षों तक सुस्त रह सकते हैं पर कब किसी जेनेटिक संरचना को वे अपने अनुकूल ढाल लें, कुछ कहा नहीं जा सकता। इसलिए यह मान लेना ही भ्रम है कि अब कोरोना गया। जब तक उसके मूल में प्रहार नहीं होगा, वह बना रहेगा। इस कोरोना काल में आठ लेख डॉक्टर अरुण के हैं। डॉक्टर अनिल चतुवेर्दी के लेख नगरों से जुड़ा महामारियों का इतिहास से पता चलता है कि प्रकृति के कुपित होने से महामारियाँ फैलती हैं। और फिर उन्हें रोकना सहज नहीं होता। कोरोना के दुष्प्रभाव ने समाज के हर अंग पर हमला किया है। गौरव गुलमोहर ने रंगमंच कलाकारों के सम्मुख आजीविका का संकट में कलाकारों की पीड़ा लिखी है। अरुण त्रिपाठी कोरोना के खौफ के खौफ को स्पष्ट करते हुए अपने एक लेख में बताते हैं कि लोगों को ऐसे में अपना गांव-घर याद आया। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिÞले से 2170 किमी दूर आंध्र के नेल्लोर में कमाने गए रवि पांड़े अपनी टीवीएस रेडान बाइक में सवार होकर अनवरत 43 घंटे चलते हुए गांव लौट आए। कई प्रदेशों से गुजरते हुए। और यह कोई रवि पांड़े ही नहीं, हर प्रवासी की पीड़ा है। सबको इस संकट में अपना गाँव-घर याद आया। सबसे बड़ी बात तो यह कि कोरोना ने डब्लूएचओ की साख पर भी संकट खड़ा कर दिया है।
अमेरिका, चीन और रूस की तनातनी का शिकार अब यह संस्था भी हो गई है। धर्मेंद्र कमरिया ने इस संदेह का बहुत अच्छा विश्लेषण किया है। श्रमिक चेतना के उन्मेष का समय में प्रेम सिंह ने उम्दा सवाल उठाए हैं, कि क्या कोरोना की तालाबंदी ने मजदूरों को फिर से संगठित होने के लिए तैयार किया है। कुल 240 पेज की इस पुस्तक का हर लेख पठनीय है। प्रकाशक हैं, कौटिल्य बुक्स, 309, हरि सदन, 20, अंसारी रोड, दरिया गंज, नई दिल्ली। पुस्तक का मूल्य है 350 रुपए। पुस्तक में संकलित हर लेख को उसके लेखक बहुत ही सटीक ढंग से पेश किया है। भाषा सहज और बोधगम्य है। खास बात कि इसका हर लेख कोई न कोई नई बात कहता है।
(लेखक वरिष्ठ संपादक हैं। यह इनके निजी विचार हैं।)
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