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Man dole re: मन डोले रे

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आजकल मानसिक बीमारी का बड़ा शोर मचा हुआ है। जिसे देखिए वही सिर पकड़े बैठा है। इसकी मार के बारे में तरह-तरह के सर्वे किए जा रहे हैं। डरावनी रिपोर्ट छापी जा रही है कि हर पाँचवाँ आदमी इसका शिकार है। उसे फ़ौरन इलाज की दरकार है। अस्पताल का आलम ये है कि डाक्टर लाख पर एक हैं। ऊपर से बीमारों को डर कि अगर लोगों को पता चल गया कि उन्हें कोई मानसिक रोग है तो उनका मजाक बनेगा। उन्हें गम्भीरता से नहीं लिया जाएगा।

ऐसे में सवाल ये है कि आख़िर मानसिक बीमारी है क्या? बेहतर होगा कि बात मानसिक स्वास्थ्य से शुरू करें। किसी के अच्छे मेंटल हेल्थ का मतलब ये हुआ कि वो कारगर है, अपना काम ठीक-ठाक कर सकता है। लोगों से उसके रिश्ते अच्छे हैं। वो स्वयं को हालात के अनुरूप ढाल सकता है। इसके उलट मानसिक बीमारी की स्थिति में एक आदमी के सोच, व्यवहार और भावनाओं में प्रतिकूल फ़र्क़ पड़ जाता है। उसे अपना काम करने और सामाजिक और पारिवारिक तालमेल बिठाने में भारी परेशानी होती है।

ऐसा नहीं कि मानसिक बीमारी आधुनिक सभ्यता की उपज है। पुराने और मध्यकालीन युग में तो स्थिति और भी भयावह और क्रूर थी। असामान्य व्यवहार का कारण आदमी में शैतानों के प्रवेश माना जाता था। यूरोपीय देशों में तो इन बेचारों को चौराहे पर ज़िंदा जला दिया जाता था। वैज्ञानिक युग में शोध की संस्कृति विकसित हुई। आदमी के व्यवहार का वैज्ञानिक तरीक़े से व्यापक अध्ययन हुआ। निष्कर्ष ये निकला कि आदमी के व्यवहार के तीन नियामक हैं – जीन, वातावरण एवं तीसरा आत्मबोध जो जीन और वातावरण के इंटरएक्सन से विकसित होता है। मानसिक रोग हालात के प्रतिरूप या अनुपयुक्त आचरण है जिससे रोग से ग्रसित व्यक्ति के प्रभावशीतला पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। जिस योगदान की अपेक्षा आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था उससे करती है उसे करने में वो अक्षम है। ये भी विचारधारा बनी कि किसी अन्य की तरह ये भी एक रोग ही है। दवाई और थेरापी से इसे पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है। कम से कम रोगी को इस स्तर पर तो लाया ही जा सकता है कि वो अपने आपको सम्भाल ले, अपना काम खुद कर ले।

मानसिक रोग के मूल में विरासत में मिली जीन है जो एक वंश-वृक्ष में हज़ारों साल से चली आ रही होती है। वातावरण के हिसाब से कहीं ये दब जाती है और कहीं ये विकराल रूप धारण कर लेती है। बचपन के अनुभवों का मानसिक स्वास्थ्य के स्तर से सीधा सम्बन्ध है। अगर ये पोषित करने वाले हों तो आदमी एक कारगर इंसान बनता है। उसके पास वो सारे मानसिक औज़ार होते हैं जो उसे विपरीत परिस्थितियों से जूझने के लिए चाहिए। समस्या उसे चुनौतियाँ लगती है। विपरीत परिणाम जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया लगती है। हर झटके से उबरने का हौसला होता है।

हमारे घर-स्कूल-कालेजों के वातावरण का हमारे मानसिक संतुलन पर ख़ासा असर होता है। बाज़ारी व्यवस्था में आपसे एक ऐसे इंसान के रूप में बड़े होने की अपेक्षा रहती है जो नियम-क़ानून के हिसाब से चले। अपने समय और क्षमता के हिसाब से काम करे और बदले में जो कुछ भी मिल जाए उसी से तसल्ली करे। खेल घर से ही शुरू हो जाता है। अगर गरीब हैं तो संघर्ष बालपन से ही शुरू हो जाता है। स्थिति से बाहर निकलने का जज़्बा या निराशा के गर्त में और धँसने का ख़्याल माता-पिता-शिक्षक और सम्पर्क में आने वाले बड़े लोग देते हैं। शोषित होने की स्थिति में मन में हमेशा के लिए घाव बन जाता है जो अन्य और स्वयं के प्रति उसके नज़रिए को प्रभावित करता है। जो भरे-पूरे घर के हैं उनके सामने चुनौती ये रहती है कि कैसे हक़ीक़त की समझ विकसित करें। सिर्फ़ साधन-सम्पन्न हो जाने से बचपन अच्छा बीतेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। ये बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि ज़िम्मेवार बड़े लोग उन्हें क्या सिखाते हैं और जीवन की क्या परिस्थितियाँ बनती है।

जैसी हमारी स्कूली व्यवस्था है, थोड़े ही लोगों को ये लगता है कि वे किसी काम के हैं। शिक्षा से जुड़े लोग ज़्यादातर इसे जीविकोपार्जन का ज़रिया समझते हैं। अच्छे अंक लाने वाले को तो कभी-कभार शाबाशी मिल जाती है। बाक़ी एक तरह से अपनी बेइज़्ज़ती कराने स्कूल जाते हैं। माता-पिता और शिक्षकों का एक गैंग-सा बन जाता है। उनके बीच फँसे बच्चे उनकी राय के अनुसार ही अपने को अच्छा या बेकार समझते बड़े होते हैं। भाग्यशाली हैं जो इस हंगामे के बीच से अपना आत्मविश्वास बचा ले जाते हैं। अपने को चुनौतियों से मुक़ाबले के लायक़ समझते हैं। तबीयत से भिड़े रहते हैं। ऊँच-नीच, हार-जीत, निंदा-स्तुति, अपने-पराए, अनुकूल-विपरीत के मध्य स्थिर-चित्त और संयमित रहते हैं।

जिंदगी में हमें क्या मिलेगा और क्या नहीं ये बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि क्या हम अन्य लोगों के साथ मिल-जुलकर काम कर सकते हैं। इसके लिए ऊँचा इमोशनल इंटेलिजेन्स चाहिए। IQ हमें चीजों को फुर्ती से सही-सही समझने की क्षमता देता है। इमोशनल इंटेलिजेन्स, जिसे हम EQ (इमोशनल कोशंट) से नापते हैं, हमें लोगों की समझ देता है। अगर ये उचित स्तर का हो तो हम दूसरों से मेलजोल कर किसी साझा लक्ष्य के लिए सफलतापूर्वक काम कर सकते हैं।

असल में एक सफल, संयमित जीवन के लिए IQ से भी ज़्यादा ज़रूरी EQ है। ऐसे में हमें शिक्षा को अर्जित अंकों तक ही सीमित ना रख बच्चों के इमोशनल इंटेलिजेन्स के विकास पर भी ध्यान देना चाहिए।

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