Home संपादकीय विचार मंच Maharashtra – a tragic farce of democracy and morality: महाराष्ट्र – लोकतंत्र और नैतिकता का एक त्रासद प्रहसन

Maharashtra – a tragic farce of democracy and morality: महाराष्ट्र – लोकतंत्र और नैतिकता का एक त्रासद प्रहसन

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25 नवंबर की सवसे बड़ी खबर यह है कि, अजित पवार के उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही उनके खिलाफ चल रही सिंचाई घोटाले की सारी जांचे रुक गयी हैं। अब वे पवित्र बन चुके हैं। भाजपा के दावे, भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस से भाजपा की असलियत, भ्रष्टाचार के खिलाफ निल जांच तक का यह सफर निंदनीय है। कथनी और करनी, नैतिकता और पाखंड, की स्प्लिट पर्सनालिटी से युक्त भाजपा का वास्तविक, चाल, चरित्र, चेहरा और चिंतन है। 2014 से लगातार देवेंद्र फडणवीस यह कह रहे थे कि हजारों करोड़ के सिंचाई घोटाले में अजित पवार लिप्त हैं और वे जेल भेजे जाएंगे। चक्की पीसिंग पीसिंग एंड पीसिंग, वाला उनका एक पुराना वीडियो अब भी सोशल मीडिया पर खूब देखा और साझा किया जा रहा है। 25 नवंबर को मुख्यमंत्री फडणवीस ने शायद सबसे पहले इसी फाइल पर दस्तखत किया जो अजित पवार के सिंचाई घोटाले से सम्बंधित है। इसे सरकार की पहली उपलब्धि माना जाना चाहिये। आइए अब इस नैतिक गठबंधन की सरकार के पृष्ठभूमि की चर्चा करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र संकट पर कल सोमवार को दोनों पक्षो को सुनने के बाद अपना फैसला, आज (मंगलवार) 26 नवंबर को सुबह 10.30 पर सुनाएगा। महाराष्ट्र विधानसभा में किसी को पूर्ण बहुमत न मिलने के कारण 12 नवंबर को राष्ट्रपति शासन लगा था, और फिर 23 नवंबर को अचानक सुबह राष्ट्रपति शासन समाप्त हुआ और भाजपा और एनसीपी के देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार ने क्रमश: मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। फिर बहुमत, राज्यपाल के सरकार बनाने के लिये आमंत्रित करने के निर्णय, राष्ट्रपति शासन के समाप्ति आदि आदि पर विवाद हुआ और यह मामला सुप्रीम कोर्ट में एनसीपी, शिवसेना द्वारा ले जाया गया जहां आज सुप्रीम कोर्ट ने सुनवायी पूरी कर ली है और निर्णय सुरक्षित रख लिया है। आज का विमर्श इसी विंदु पर है। 12 नवंबर को महाराष्ट्र में राज्यपाल की अनुशंसा पर केंद्रीय सरकार ने राष्ट्रपति से राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की और राष्ट्रपति ने सलाह मांग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया और अचानक संविधान के अनुच्छेद 356 पर पुन: बहस शुरू हो गयी। अनु 356 के साथ यह पहला विवाद नहीं जुड़ा है, और न अंतिम है, बल्कि यह केरल की पहली निर्वाचित वामपंथी सरकार के बर्खास्तगी से शुरू हो कर अब महाराष्ट्र तक का यह सफर है और जैसे अभी वक़्त का सफर जारी है, यह विवाद भी उसी के हमकदम आगे भी रहेगा। राजनीति संभावनाओं का खेल है।
महाराष्ट्र विधानसभा 2019 का आम चुनाव भाजपा और शिवसेना ने एक साथ मिलकर लड़ा था, और जब दोनों को मिला कर बहुमत का आंकड़ा पार हो गया तो, यह उम्मीद सभी को थी कि यह देवेंद्र फडणवीस सरकार का दूसरा कार्यकाल होगा। पर शिवसेना ने खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया और यह कहा कि उनके और भाजपा के बीच ढाई ढाई साल तक के मुख्यमंत्री बनने का एक गोपनीय समझौता हुआ था जिसके अनुसार उन्हें पहले ढाई साल के लिये यह पद मिलने का फामूर्ला दोनों मित्र दलों की बैठक में तय हुआ था । भाजपा ने इस मांग को ठुकरा दिया और यह भी कहा कि ढाई ढाई साल के मुख्यमंत्री होने का कोई वादा उभय दलों के बीच हुआ ही नहीं था। यह उल्लेखनीय है कि भाजपा और शिवसेना दोनो ही एक दूसरे के साथ लगभग न केवल 25 सालों से हैं बल्कि दोनो के बीच वैचारिक समानता भी है।
भाजपा और शिवसेना दोनों ही आपस मे मिलकर जब सरकार नहीं बना सके तो, राज्यपाल ने पहले भाजपा को और फिर शिवसेना को सरकार बनाने के लिये आमंत्रित किया। भाजपा को इस कार्य हेतु अड़तालीस घँटे और शिवसेना को चौबीस घंटे का समय दिया गया। शिवसेना एनसीपी और कांग्रेस ने आपस मे मिल कर सरकार बनाने की बात सोची तब तक राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी और 12 नवंबर को राष्ट्रपति शासन राज्य में लगा दिया गया। यह राष्ट्रपति शासन 23 नवंबर तक लगा रहा और फिर एक नाटकीय घटनाक्रम में अचानक सुबह इसे समाप्त करके भाजपा और एनसीपी की सरकार को राज्यपाल ने शपथ दिला दी। यही मामला, सुप्रीम कोर्ट में है जहां 26 नवम्बर को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना है।
महाराष्ट्र संकट से कुछ अहम संवैधानिक मुद्दे भी उठ खड़े हुये हैं। यह मुद्दे अनुच्छेद 356 के प्रयोग और कैबिनेट तथा प्रधानमंत्री के विशेषाधिकार जो उसे बिजनेस रूल्स 1961 के नियम 12 के अंतर्गत प्राप्त हैं, से सम्बंधित है। महाराष्ट्र विधानसभा में किसे बहुमत है, किसे बहुमत नहीं है, कौन किसे खरीद बेच रहा है यह सब पहली बार देश के संसदीय लोकतंत्र में नहीं हो रहा है बल्कि यह पहले भी हो चुका है और आगे भी होता रहेगा। सत्ता राजनीति का मुख्य कारक भाव है। लेकिन 23 नवंबर की सुबह जिस प्रकार आनन फानन में राज्य से राष्ट्रपति शासन के समाप्ति की सिफारिश, प्रधानमंत्री ने बिना कैबिनेट की बैठक के राष्ट्रपति को भेजी है वह एक अप्रत्याशित कदम था। उसकी वैधानिकता की चर्चा और पड़ताल जरूरी है।
भारत सरकार ने, 23 नवम्बर 2019 को महाराष्ट्र में लगे राष्ट्रपति शासन को समाप्त करने के लिये, बिना कैबिनेट, यानी मंत्री परिषद की राय लिये राष्ट्रपति से जो अनुशंसा की वह प्रधानमंत्री को कार्य आवंटन नियमावली 1961 के नियम 12 के अंतर्गत किया गया था। संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति को असीम शक्तियां हैं पर वह अपनी मनमर्जी से इन अधिकारों का उपयोग नहीं कर सकते है। वह भारत के कैबिनेट की सलाह पर ही अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते है।
महाराष्ट्र में कैबिनेट की अनुशंसा पर राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। और कैबिनेट की अनुशंसा, महाराष्ट्र के राज्यपाल की रिपोर्ट पर आधारित थी। संविधान के अनुच्छेद 356 में केंद्र सरकार को राष्ट्रपति शासन लगाने का अधिकार है। यह अधिकार राज्य में जब किसी भी दल की सरकार नहीं बन पा रही हो और राज्यपाल को यह समाधान हो गया हो कि अब राज्य में लोकप्रिय सरकार का गठन संभव नहीं है तो राज्यपाल अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजते हैं और फिर उस रिपोर्ट के आधार पर केंद्रीय कैबिनेट राष्ट्रपति से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंसा करती है। तब राज्य की सारी प्रशासनिक मशीनरी राज्यपाल के सीधे अधीन हो जाती है और राज्य से सम्बंधित वित्तीय और विधायी कार्य संसद द्वारा निपटाए जाते हैं। पर यह स्थिति एक असामान्य परिस्थितियों के लिये प्राविधितित की गयी है। इसीलिए इस पर अनेक नियंत्रण या चेक और बैलेंस भी रखे गए हैं। छह महीने से अधिक समय के लिये राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुमति संसद से लेना आवश्यक है। राष्ट्रपति शासन कभी भी तीन साल से अधिक समय तक के लिये नहीं लगाया जा सकता है। इसका कारण यह है कि संविधान निमार्ता इस विंदु पर सजग थे कि संसदीय लोकतंत्र जो हमारे संविधान का मूल आधार है वह हर दशा में बरकरार रहे। संविधान के किसी प्राविधान की आड़ लेकर किसी भी प्रकार की अधिनायकवादी शासन व्यवस्था को थोपा न जा सके।
संसदीय लोकतंत्र में जनता की सारी शक्तियां संसद और शासन के तीन अंगों में से एक कार्यपालिका के रूप में मंत्रिमंडल में निहित होती हैं। मंत्रिमंडल में जो कैबिनेट मंत्री होते हैं वे ही मिलकर कैबिनेट या मंत्री परिषद का गठन करते हैं। यही मंत्रिपरिषद सबसे बडी एक्जीक्यूटिव होती है और कार्यपालिका की सारी शक्तियां उसी में निहित होती हैं। प्रधानमंत्री की स्थिति संविधान के अनुसार फर्स्ट अमंग इक्वल्स यानी सभी समान किन्तु प्रथम की होती है। राष्ट्रपति को सलाह देने का काम और अधिकार इसी कैबिनेट का है। कैबिनेट या कार्यपालिका को अपना दायित्व निपटाने के लिये बिजनेस नियमावलियां बनी हैं जिनके अंतर्गत सबको अपना अपना काम करने के लिये विभिन्न अधिकार दिए हैं। ऐसा ही एक अधिकार बिजनेस रूल्स 1961 के अंतर्गत नियम 12 में है। सामान्य नियमों के अनुसार, राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने और उसे समाप्त करने के लिये राज्यपाल की रिपोर्ट कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत होती है और कैबिनेट उस पर विचार कर के राष्ट्रपति को तदनुसार अपनी सलाह देती है। लेकिन महाराष्ट्र में संविधान के प्राविधानों और बिजनेस रूल्स का जमकर दुरुपयोग किया गया और कानूनी प्राविधानों की आड़ में जबर्दस्ती की गयी। 12 नवंबर 2019 को प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स सम्मेलन में ब्राजील जाने के पहले कैबिनेट की मीटिंग बुला कर महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की थी। राष्ट्रपति ने कैबिनेट की सलाह पर राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर दी।

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