Home संपादकीय विचार मंच How much of neighborhood’s Nepal is unknown! : पड़ोस का नेपाल कितना बेगाना!

How much of neighborhood’s Nepal is unknown! : पड़ोस का नेपाल कितना बेगाना!

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साल 2012 में मैं पहली दफे नेपाल गया था। वह भी कार से। मेरे अलावा पत्नी, बड़ी बेटी, दामाद और उसके दोनों बच्चे थे। मेरे दामाद तब गोंडा में पोस्टेड थे, और मैं मेरठ में। एक दिन पत्नी को लेकर मैं मेरठ से निकला और गजरौला, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, शाहजहां पुर, सीतापुर, लखनऊ, बाराबंकी, कर्नल गंज होते हुए 800 किमी का सफर तय कर गोंडा पहुंचे। अगले रोज नेपाल के लिए चल दिए। दोपहर तक हम बलराम पुर, तुलसीपुर, देवीपाटन होते हुए बढ़नी पहुंचे। बॉर्डर पर एसएसबी (सशस्त्र सीमा बल) के अपने परिचित मित्रों ने भनसार (अनुमति पत्र) बनवा दिया।
एक जवान ने मुझे नेपाल का सिम भी दिया।  हमारी कार को नया नंबर प्लेट मिला, जिसे हमने नम्बर प्लेट पर लगाने की बजाय सामने के सीसे के वाइपर में दबा दिया। जो भी गाड़ी देखता, वह जान जाता कि गाड़ी इंडिया की है। बढ़नी बॉर्डर पार करते ही नेपाल का कृष्णा नगर  बॉर्डर था। वहां से गाड़ी भाग चली। कुछ देर बाद हम एक उच्च पथ पर आ गए। सड़क के दोनों तरफ चाय की दूकानें थीं। अधिकांश पर पांडेय टी स्टाल लिखा था। और हर दूकान के बाहर की तरफ एक लाल रंग के पारदर्शी थैले में पकौड़ियां लटकी हुई थीं। दामाद ने चाय पीने की इच्छा जताई। गाड़ी जहां रोकी वहां त्रिपाठी टी स्टाल लिखा था। लेकिन उस स्टाल के प्रोप्राइटर ने चाय बनाने में कोई रुचि नहीं दिखाई। रूखे अंदाज में कहा, दूध नहीं है। हमने कहा, ठीक है, कुछ बिस्किट ही दे दो। उसने कहा, बिस्किट भी नहीं है। उसकी दूकान पर लटके थैलों को देख कर मैंने कहा ये पकौड़ियां ही दे दो। उसने कहा, ये पकौड़ियां नहीं, सूखी हुई मछली है। पता चला, यहां चाय की दूकानों पर शराब मिलती हैं और चखने के लिए सूखी मछली। हम वहां से चल दिए और बुटवल पहुंचे, वहां जाकर बिस्किट्स, चिप्स, केक वगैरह खरीदे और आगे बढ़े। सड़क अच्छी थी और अब हम कुछ ऊंचाई वाले इलाके में थे। शाम सात के आसपास हम नारायण घाट पहुंच गए। वहां हमने दो कमरे लिए। और शाकाहारी भोजन के लिए तलाश शुरू की। होटल एक मारवाड़ी का था, इसलिए वहीं पर वेज थाली मिल गई।
अगले दिन सुबह हम होटल से निकले। चितवन राष्ट्रीय उद्यान देखा। इसके बाद पहाड़ी रास्ता शुरू हो गया। घुमावदार और बेढंगा। कुछ घंटों बाद हम मनोकामिनी मंदिर के करीब पहुंच गए। यह नेपाल के गुरखा जिÞले में है। यह मंदिर बागमती नदी के दूसरे छोर पर ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। वहां तक पहुंचने के लिए रोप वे है। यह रोप वे विश्व के कुछ सबसे ऊंचे रोप वे में से है। करीब 13 सौ मीटर की खाड़ी चढ़ाई तय करता है तथा साढ़े तीन किमी लम्बा है। रोप वे का तब किराया चार सौ नेपाली रुपया था। अर्थात् 250 भारतीय रुपए। हम सब लोग मंदिर के लिए गए। रोप वे से उतरने के बाद करीब आधा किमी चढ़ना उतरना पड़ता है। यह गोरखाओं का मंदिर है। कहा जाता है, कि इस मंदिर में आने वालों की हर कामना पूरी होती है।
मंदिर में एक विशाल घंटा है, जो बजाए जाने पर शेर के दहाड़ने जैसी आवाज करता है। आसपास काफी दूकानें हैं, खाने-पीने की भी। पर अधिकांश में नॉन-वेज ही मिलता है। चिकेन या मटन। हमने वहां मैगी खाईए और फिर इस तरफ आ गए। अभी काठमांडू कोई 105 किमी दूर था और रास्ता और ज्यादा पहाड़ी। हम आगे बढ़े। और शाम सूरज ढलने के बाद काठमांडू पहुंचे। एक ऊंची पहाड़ी से उतरते ही काठमांडू घाटी शुरू होती है। एक नेपाली पत्रकार मित्र ने होटल बुक करवा दिया था। एक आदमी से रास्ता पूछा, तो उसने हमें भारतीय जानकर कहा, चलिए मैं आपको और अच्छे होटलों में ले चलता हूं। पर मैंने मना कर दिया। उस समय तक रास्ता बताने को गूगल मैप नहीं आया था। कुछ देर बाद सड़क समतल और चौड़ी हो गई। अब हम नेपाल की राजधानी में थे। मुझे बता दिया गया था, कि यहां के ट्रैफिक कानून सख़्त हैं, इसलिए सिग्नल नहीं तोड़ने और अपनी लेन में चलना है। हमें हमारा होटल मिल गया। सामान कमरों में रख कर हम नेपाल की राजधानी को देखने निकले। लेकिन यहां काठमांडू में भारतीय मुद्रा के सिर्फ़ सौ रुपए ही स्वीकार किए जाते थे। पांच सौ अथवा हजार के नोट नहीं। अब बड़ी मुश्किल थी। सौ के ज्यादा नोट थे नहीं। सामान भी था और पैसा भी किंतु मुद्रा का संकट। मेरा क्रेडिट कार्ड भारत में ही मान्य था। इसलिए हम लौट आए। काठमांडू में भी पहाड़ गंज जैसी संकरी गलियों में होटल थे और करोल बाग जैसे बाजारों में पाकिस्तानी व्यापारी छाए थे। लूट बहुत ज्यादा थी और वे हम इंडियन को उस समय भी हिकारत से देखते थे। किंतु नेपाल के राष्ट्रपति राम बरन यादव मधेसी समुदाय से थे, इसलिए भारतीयों से वे सहज ही मिलते थे थे। मुझे भी राम बरन यादव अपने भाई प्रतीत हुए। अगले दिन वहां के प्रमुख मंदिर- पशुपति नाथ और स्वयंभू नाथ देखे।त्रिभुवन हवाई अड्डा देखा और फिर पोखरा के लिए निकल पड़े।
दोपहर ढलने लगी थी। हम फिर उसी मनोकामिनी घाट पहुंचे। मनोकामिनी के बाद रास्ता जंगली और बियाबान था। तथा गोरखा के इस जिÞले में भारतीयों के प्रति घृणा का भाव। पेट्रोल पम्पों में मुझे पेट्रोल नहीं दिया गया। सात बजे के आसपास पोखरा पहुंच गए। लगा, कि हम एक बहुत ही सुंदर स्थान पर आ गए हैं। चारों ओर आसमान में बर्फ़ से आच्छादित चोटियों पर डूबते सूर्य की रश्मियां अठखेलियां कर रही थीं। लग रहा था, जैसे ये स्वर्ण शिखर हों। हम मंत्र मुग्ध से देखते रहे। निर्धारित होटल पहुंचे। सामान रखा और फेवा झील घूमने निकले। बोटिंग बंद हो चुकी थी। बेटी-दामाद झील के किनारे-किनारे घूमने निकल गए। लौटे तो रात हो गई थी। यहां भी वेज खाना काफी ढूंढने के बाद मिला। एक जगह नेपाली वेज थाली मिली। गजब का टेस्ट था। अरहर की दाल, चावल और आलू का भर्ता। सुबह जल्दी उठे। खिड़की खोली तो देखा खिड़की के बाहर सामने बर्फ़ की चोटियां हमारे कमरों में प्रवेश को आतुर हैं। हम जल्दी-जल्दी तैयार होकर फेवा झील की तरफ गए और उसके बाद शांति स्तूप देखने चले गए। यह काफी ऊंचाई पर बना बौद्ध स्तूप है। डेढ़ सौ सीढ़ियां चढ़ कर हम इस तिब्बती शांति स्तूप पर पहुंचे। वहां हमारे अलावा एक अमेरिकन जोड़ा और था। एक मैगी की दूकान थी, जिसमें सॉफ़्ट ड्रिंक और चाय-काफी भी मिलती थी। नेपाल में रहने की हमारी अनुमति समाप्त हो चुकी थी, इसलिए हम फटाफट निकले। यहां से बुटवल 77 किमी था, और पूरा रास्ता चढ़ाई-उतराई का। हम आगे बढ़े। रास्ता जंगली और अंधे मोड़ों से भरा। उस समय नेपाल में समाजवादी रुझान वाले बाबूराम भट्टराई की सरकार थी। कम्युनिस्ट उन्हें दबाए थे। नेपाल के इस पश्चिमी इलाके की पहाड़ियों के गोरखा घनघोर भारत विरोधी। जगह-जगह नीले अक्षरों से भारत और भारतीय सेना को गालियां लिखी हुई थीं। हम सबको बुरा भी लग रहा था और भय भी। क्योंकि हमारी गाड़ी का नम्बर यूपी, इंडिया का था। अब मुझे लगा, कि बेहतर रहता हम नम्बर प्लेट वह लगा लेते जो नेपाल के परिवहन विभाग ने हमें देवनागिरी अक्षरों व अंकों वाली दी थी। पर अब क्या हो सकता था? रास्ते में जो भी गांव पड़ते, वहां के निवासी हमें घूरते। राम-राम करते हम दो-ढाई घंटे में बुटवल आ गए तब जान में जान आई। वहां चाय पी गई। शाम के पांच बज रहे थे और अभी बॉर्डर 60-70 किमी था, इसलिए मैंने गाड़ी भगाई। कृष्णा नगर बॉर्डर से थोड़ा पहले हाई वे पर पुलिस वाले कानवाई लगा रहे थे।
मैने जल्दबाजी में गाड़ी ओवरटेक कर बैरिकेडिंग के पास जा कर लगा दी। इंस्पेक्टर ने आकर रोक दिया और गाड़ी साइड करने को कहा। मैंने गाड़ी किनारे पर लगा दी। उसने कहा, चालान होगा। मैंने कहा, क्यों? बोला, आपने गलत तरीके से ओवरटेकिंग की। इंस्पेक्टर की वर्दी पर लगी नेम प्लेट में अरुण कुमार यादव लिखा था। मैंने कहा, यादव जी, अब बॉर्डर के पास काहे पंगा कर रहे हो? मुझे जाने दो। उसने कहा चालान तो कटेगा। वह भी दो हजार नेपाली रुपए। मैंने उससे कहा, कि यादव जी यह बहुत है। कुछ ले-देकर खत्म करो। बोला, यह इंडिया नहीं है। मैंने कहा, देखो हमारे इंडियन स्टेट का चीफ मिनिस्टर यादव और पूरा यूपी यादवों से भरा है। शादी-विवाह करने तो हमारे यहां ही आओगे। बोला, आपको रिश्वत देने में जेल हो सकती है। मैंने कहा- चलो भेज दो। 15-20 दिन पूरे परिवार को तुम्हारी सरकार खिलाये-पिलाएगी फिर छोड़ देगी। चलो जेल भेजो। अब वह मुस्कुराया और बोला- जाइए आप। आप जैसा इंडियन पहली बार मिला। तीर की तरह निकला। और कृष्णानगर बॉर्डर पार कर अपनी बढ़नी सीमा में प्रवेश किया। एसएसबी के मित्रों से मिला, उनका सिम कार्ड वापस किया। कुछ देर चाय वगैरह पी और फिर वही देवीपाटन, तुलसी पुर, बलराम पुर होते हुए गोंडा आ गया रात दस बजे। वहां दामाद का आवास सिविल लाइंस में था।
(लेखक वरिष्ठ संपादक हैं।यह इनके निजी विचार हैं।)

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