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Hindi market and Hindi market: हिंदी का बाजार और बाजार की हिंदी

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दुनिया में तीन भाषाएं सबसे ज्यादा तरक्की कर रही हैं। ये हैं अंग्रेजी, हिंदी और चीनी। इसमें कोई शक नहीं कि हिंदी पिछले दस वर्षों में बाजार पर कब्जा करती जा रही है। अब बाजार को नियंत्रित करने वाली शक्तियां भले ही अंग्रेजी को पसंद करती हों पर बाजार का दायरा इतना व्यापक होता है कि चाह कर भी वे भाषा को अपने काबू में नहीं रख पाते। आज बाजार हिंदी के पक्ष में है। जितना अधिक तकनीक का प्रयोग किया गया हिंदी का बाजार उतना ही बढ़ा। हिंदी आज दीन-हीन और समाज के निचले तबके की भाषा नहीं रह गई है वह आज एशियाई बाजारों में सबसे ज्यादा बरती जाने वाली भाषा बन गई है।अभिजात्य वर्ग हिंदी के नाम पर आंख-मुंह चाहे जितना सिकोड़े मगर हिंदी अपने सारे अपमान के बाजजूद तेजी से बाजार पर कब्जा करती रही। इसके लिए सोशल मीडिया को भी धन्यवाद देना चाहिए जिसने हिंदी को तेजी से पनपाया। दरअसल फेसबुक जैसे वर्चुअल डिजिटल मीडिया पर बैठकर चैटिंग का मजा तभी तक है जब उसमें आपके कमेंट पर लाइकिंग और कमेंट मिलें और पाया जाता है कि इस डिजिटल मीडिया मे हिंदी सबसे अधिक प्रवाहमान भाषा है। दरअसल हिंदी पारस्परिक बोलचाल और अपनी बात दूसरे तक समझाने में अन्य किसी भी भाषा की तुलना में अधिक सक्षम तो है ही दूसरे आज उसके पास एक विशाल मध्यवर्ग है। और इसकी खास वजह है हिंदी भाषी इलाकों से युवाओं का तेजी से बढ़ता पलायन।

शहरीकरण ने हिंदी इलाके के गांवों को भले ही निर्जन कर दिया हो लेकिन शहरों में यह आबादी एक बड़े खरीदार के रूप मेंउभरी है। गांवों से भागकर शहर आए लोग अपने कौशल से इतना तो कमा ही लेते हैं कि वे आधुनिक उत्पादों की तरफ आकर्षित हो सकें। आज हर सर्वे बताता है कि वाहन, इलेक्ट्रानिक गुड्स और कास्मेटिक की चीजें खरीदने में यह ग्रामीण वर्ग भी खूब दिलचस्पी लेता है। टीवी और प्रचार मीडिया ने उस पर ऐसा जादू चला दिया है कि वह अब गांवों की सादगी वाली जिंदगी से ऊब चुका है। उसे आज वह हर चीज चाहिए जो पहले सिर्फ और सिर्फ अभिजात्य वर्ग की पहुंच में समझी जाती है। दूसरे बाजार अब कुछ खास निर्माताओं की जागीर नहीं रहा है उसमें इतने उत्पादक आ गए हैं कि हर आदमी अपनी चीज को दूसरे से श्रेषठ और बेहतर तो बताता ही अपना माल बाजार मे खपाने की नियत से वह सस्त बेचता है। माल उत्पादकों की यह मजबूरी इन ग्रामीण मानसिकता वाले उपभोक्ताओं के लिए वरदान बन गया और वे अपने माल को इन उपभोक्ताओं तक पहुंचान के लिए हिंदी का सहारा लेते हैं इसके लिए विज्ञापन से लेकर हर प्रचार मीडिया पर हिंदी का बखूबी इस्तेमाल करते हैं। यानी सीधा सा फंडा यह है कि हिंदी अब बाजार को प्रभावित करने वाली ताकतवर भाषा बन गई है। भाषा तब ही विकसित हो पाती है जब एक तो भाषा का बाजार सक्षम हो दूसरे उसकी जरूरत महसूस की जाए। हिंदी आज बाजारोन्मुख भाषा है। भले बाजार को नियंत्रित करने वाली शक्तियां अभी भी हिंदी को दोयम दरजे की भाषा मानती हों मगर उसकी अनदेखी तो कतई नहीं कर सकतीं।

कबीर की एक बड़ी ही मशहूर उक्ति है- संसकीरत है कूप जल, भाषा बहता नीर। यानी संस्कृत भले ही शीतल जल हो और गर्मी में आराम दे पर वह प्रवाहमान नहीं है वह बस कुएं का पानी बनकर रह गया है। यही हाल आज भारत में अंग्रेजी का है। आज शोध और सारे विद्वतापूर्ण कामों में अंग्रेजी का दबदबा जरूर हो मगर आज अंग्रेजी के बूते ही आदमी बाजार में नहीं छा सकता। हिंदी बाजार में छाने के लिए सबसे अहम भाषा बनती जा रही है। जब किसी भाषा का बाजार बढ़ता है तो तकनीक को उसकी शरणागत होना ही पड़ता है। यही कारण है कि एंड्रायड मोबाइल बनें जिनमें हिंदी में भी आप अपने संदेशों का प्रसारण कर सकते हैं। व्हाट्स अप और फेसबुक में हिंदी छाती जा रही है। आप को अपनी बात जनसाधारण तक पहुंचानी है तो हिंदी में और वह भी देवनागरी लिपि में अपनी बात आपको रखनी होगी। क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि फेसबुक व व्हाट्सअप पर हिंदी में अपनी बात रखने वाले 70 प्रतिशत लोग अब देवनागरी का ही इस्तेमाल करते हैं। यहां तक ईमेल के जरिए अपने संदेश देने वाले भी हिंदी का ही प्रयोग करते हैं। इसमें यूनीकोड और गूगल ने एक बड़ी क्रांति की है। एंड्रायड फोनों में गूगल के जरिए हिंदी का फोंट इस्तेमाल किया जाना इतना आसान हो गया है कि अब लोग रोमन का इस्तेमाल कम ही करते हैं। पहले यह सोचा गया था कि हिंदी-उर्दू एशिया की सबसे ज्यादा बरती जाने वाली भाषाएं हैं और दोनों को बरतने वाले लोग एक-दूसरे की जुबान अच्छी तरह से समझते हैं क्योंकि हिंदी और उर्दू दोनों का व्याकरण एक है और बोलने का अंदाज भी बस दोनों में तत्सम शब्दों की भरमार उन्हें अलग कर देती है। हिंदी में संस्कृत के शब्द और उर्दू में अरबी-फारसी के तथा दोनों की भिन्न लिपियां उन्हें अलहदा करती हैं। इससे निपटने के लिए एक कारगर तरीका अपनाया गया कि इन दोनों ही भाषाओं के लिए एक कामन लिपि रोमन का प्रयोग किया जाए। मगर जल्दी ही रोमन यहां फेल हो गई। इसकी तीन वजहें थीं एक तो रोमन में शब्द को जस का तस न रख पाना दूसरे रोमन का मिजाज योरोपीय होना और तीसरा जो सबसे अहम कारण था वह यह कि देवनागरी का सहज और सामान्य तथा समान रूप से बरता जाना। हिंदी-उर्दू के बीच का सांप्रदायिक झगड़ा करवाने लोग नई पीढ़ी के बीच लिपि के विवाद को बहुत नहीं गरमा पाए और धीरे-धीरे हिंदी तथा उर्दू डिजिटल मीडिया में एक कामन भाषा नागरी में ही लिखे जाने लगे। नागरी ने बड़ी ही फुर्ती से यह नया रूप अपना लिया और डिजिटल मीडिया पर उसने अपना कब्जा और मजबूत कर लिया।

भाषा को युवा ही बढ़ा पाते हैं। युवाओं ने अपनी पढ़ाई के लिए भले अंग्रेजी माध्यम को चुना हो मगर तमाम दबावों के बीच भी वे हिंदी को ही अपनी बातचीत का माध्यम बनाए रहे। इसके अलावा हिंदी में अन्य भाषाओं के शब्द इतने सहज तरीके से प्रवेश पा गए कि आज लगता ही नहीं कि अंग्रेजी के तमाम शब्द हमारी मातृभाषा के शब्द नहीं हैं। जिंगल्स और हिंग्लिश के बढ़ते चलन ने भी हिंदी का बाजार बढ़ाया। आज मजबूरी यह है कि हिंदी हार्टलैंड के लगभग सारे अखबार अब शीर्षक तक में अंग्रेजी या अन्य भाषाओं के शब्द लिखने में हिचक नहीं दिखाते। मुझे याद है कि एक बार जब मैं अमर उजाला के कानपुर संस्करण का स्थानीय संपादक था तब लीड में ‘चक दित्ता इंडिया!’ लिखने पर कितना हंगामा मच गया था। मुझे अखबार के मुख्यालय से फोन आए और अखबार के प्रबंध निदेशक ने भी पूछा कि शुक्ला जी आपको यह शीर्षक अटपटा नहीं लगता। मैने दृढ़तापूर्वक कहा नहीं मुझे यह बाजार का सबसे प्रचलित शब्द लगता है। तब मेरी बात को न चाहते हुए लोगों ने गले उतारा। मगर आज ऐसा शब्द किसी को भी अटपटा नहीं लगेगा। आज महानगरों में ही नहीं छोटे शहरों से निकलने वाले अखबार भी ऐसे शब्दों का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। भाषा अपने तत्सम रूप से नहीं बल्कि पारस्परिक बोलचाल में अपने इस्तेमाल से मजबूत होती है। और हिंदी आज बाजार की सबसे सक्षम भाषा है।

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