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Government is proving incompetent in dealing with farmer movement: विमर्श – किसान आंदोलन से निपटने में सरकार अक्षम सिद्ध हो रही है

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सिंघू सीमा पर किसानों के बैठे हुए 47 दिन हो गए हैं और अब तक सरकार की किसानों से कुल 9 दौर की वार्ता हो चुकी है। जिंसमे 8 दौर की वार्ता विज्ञान भवन में औऱ 1 दौर की वार्ता पूसा इंस्टिट्यूट में अमित शाह गृहमंत्री के साथ  हुयी है। अब 15 जनवरी को फिर अगली बातचीत की तारीख तय है। इतने लंबे धरने और नौ दौर की बातचीत के बाद भी सरकार यह अंदाजा नहीं लगा सकी कि आखिर किसान चाहते क्या हैं। बार बार यह कहने के बाद भी यह तीनों कृषि कानून किसानों के हित मे हैं, सरकार किसानों को अब तक यह न समझा पाई कि यह कानून कैसे किसानों के हित मे हैं। कैसे इन कानूनो से किसानों की आय 2022 में दुगुनी हो जाएगी, कैसे उन्हें उनकी फसल की उचित कीमत मिलने लगेगी, और कैसे इन कानूनों से कृषि सुधार होगा। सरकार ने, जब उसकी समझ मे कुछ नही आया तो कह दिया कि सुप्रीम कोर्ट में जाकर चाराजोई करो। क्या सरकार ने यह मान लिया कि इस समस्या का समाधान उसके बस का अब नहीं है ? वैसे सुप्रीम कोर्ट में 11 जनवरी को इस मामले की सुनवाई हुयी भी है।
सुप्रीम कोर्ट ने 11 जनवरी को सुनवाई के बाद कहा है कि, सरकार इन कानूनो के क्रियान्वयन पर रोक लगाने के लिये विचार करे, जिससे आंदोलनकारियों और सरकार के बीच जो विवाद है वह सुलझ सके। सीजेआई एसए बोबड़े ने कहा कि, जिस तरह से सरकार ने इस मामले को हैंडल किया है उससे वे बहुत निराश हैं। अदालत ने यह भी कहा कि, जिस तरह से सरकार और किसान संगठनों के बीच वार्ता चल रही है उससे कोई हल नहीं निकल रहा है। अब इस मामले का समाधान कोई कमेटी ही करे।
सीजेआई ने कहा कि,
” हमे यह समझ मे आ रहा है कि सरकार क्लॉज दर क्लॉज बातचीत करना चाहती है और  किसान चाहते हैं कि पूरा कानून ही रद्द हो। हम इन कानूनों के क्रियान्वयन को तब तक के लिये स्थगित कर देंगे, जब तक एक सक्षम कमेटी, उभय पक्षो से बात कर के इसे हल न कर दे।”
सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी के गठन का प्रस्ताव दिया है। और दोनो पक्षो से कहा है कि वे अपने अपने प्रतिनिधियो के नाम सुझाये। अभी अदालत का अंतिम आदेश नहीं आया है।
यह तीनों कृषि कानून जून 2020 में एक अध्यादेश के रूप में अचानक कोरोना आपदा के दौरान लाये गए और बाद में संसद से पास करा लिए गए। जब कानून बनाए जा रहे थे, तब न तो, क्लॉज दर क्लॉज इन कानूनों पर कोई चर्चा हुयी, न संशोधनो की बात सरकार के दिमाग मे आयी जिन पर वह आज कह रही है कि, संशोधनो पर बात होगी, किसान संशोधन सुझाये और किसान हित मे यह कानून होंगे ऐसा बार बार कहने वाली सरकार, एक भी हित किसानों का क्या होगा, न तो यह किसानों को वह आज तक समझा पा रही है। अगर नौ राउंड की बातचीत में भी सरकार, इन कानूनों का लाभ किसानों के लिये क्या होगा, समझा नहीं पा रही है तो, इससे दो ही चीजें स्पष्ट है या तो सरकार को भी यह पता नहीं है कि किसानों का हित कैसे होगा या सरकार, किसानों से कम्युनिकेट नहीं कर पा रही है या सरकार कॉरपोरेट के भारी दबाव में है। दोनों ही स्थितियों में यह सरकार की विफलता का ही प्रमाण है ।
प्रधानमंत्री जी के इस कथन में एक भी शब्द झूठ नहीं है कि नए कृषि कानून बहुत सोच समझ कर लाये गए हैं। यह तीनों कृषि कानून सोच समझ कर और एक लंबी साज़िश की तरह लाये गए हैं बस इन कानूनों के साथ यही दिक्कत हो गयी कि सरकार के इस दांव को देश का किसान, जिसे आमतौर पर भोला भाला, नासमझ और अनपढ़ समझा जाता था, समझ गया और समझ ही नहीं गया बल्कि वह सरकार के कॉर्पोरेट फ्रेंडली इरादे के खिलाफ जम कर खड़ा भी हो गया।
अब इन कानूनों की पृष्ठभूमि का एक उदाहरण पढिये। 12 नवंबर 2019 की हिन्दू बिज़नेस लाइन में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के हवाले से एक खबर छपी थी, जिसका शीर्षक था, हम चाहते हैं कि राज्य एपीएमसी मंडियों को ख़त्म कर दें। यह वाक्य वित्तमंत्री द्वारा कहा गया है और वे दिल्ली में नाबार्ड के छठे ग्रामीण और कृषि वित्त के छठे विश्व कांग्रेस में अपनी बात कह रही थीं। अपने भाषण में वित्तमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में अपनी बात कही कि एपीएमसी की मंडियां ख़त्म हो जानी चाहिए इसके लिए सरकार राज्यों को समझा रही है। यानी सरकार ने यह इरादा 2019 के पहले ही कर लिया था कि एपीएमसी या मंडी सिस्टम खत्म कर दिया जाना चाहिए। यह बयान और उनका भाषण अब भी यूट्यूब पर उपलब्ध है। यह खबर और वीडियो ब्लूमवर्ग क्विंट ने प्रसारित भी किया था।
उन्होंने जो कहा है वह इस प्रकार है,
“मैं ई-नाम पर ज़ोर देना चाहती हूँ। केंद्र सरकार इसका प्रचार कर रही है और कई राज्यों ने इसे अपने स्तर पर शुरू करने के लिए रज़ामंदी दे दी है। इसके साथ ही हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि राज्यों को समझाया जाए कि एपीएमसी को रिजेक्ट कर दें। एक समय पर एपीएमसी ने अपना काम किया है इस बात में कोई शक नहीं है। मगर आज इसमें कई परेशानियाँ हैं। और राज्य के स्तर पर भी ये इतना कारगर नहीं है।इसमें और भी चीज़ें शामिल हैं मगर मैं बहुत ज़्यादा डिटेल में नहीं जाना चाहती हूँ। मगर मैं चाहती हूँ कि राज्य – और हम उनसे बात कर रहे हैं – इसे ख़त्म करें और किसानों के लिए ई-नाम को अपनाएँ।”
(निर्मला सीतारमन, 12 नवंबर 2019)
केंद्र सरकार ने हाल ही में जो तीन नए कृषि कानून बनाये हैं, में, समानांतर मंडी सिस्टम जो निजी क्षेत्र या कॉरपोरेट को फसल खरीद में लगभग एकाधिकार दे देता है, का भी एक कानून है। इस कानून के प्राविधान और किसानों की आशंका को वित्तमंत्री के 12 नवम्बर 2019 के उपरोक्त बयान को मिला कर देखें तो सरकार की असल मंशा आप को स्पष्ट हो जाएगी। इस कानून को लेकर किसानों के बीच कई तरह की आशंकाए और सवाल तैर रहे हैं। जिंसमे उनकी पहली आशंका यही है कि यह कानून सरकारी मंडी सिस्टम को ख़त्म कर देगा। हालांकि, सरकार और प्रधानमंत्री बार बार  कह रहे हैं कि, सरकारी मंडी सिस्टम खत्म नहीं होगा और इसे वे विपक्ष का दुष्प्रचार कहते हैं, पर इन आशंकाओं को दूर करने के लिये जब एमएसपी को कानूनी आधार देने की मांग की जाती है तो वे खामोश हो जाते हैं। क्या प्रधानमंत्री जी को अपने वित्तमंत्री के इस निर्मल वक्तव्य की जानकारी है ? हो सकता है न भी हो। लेकिन उन्हें यह ज़रूर पता करना चाहिए कि 12 नवम्बर 2019 को वित्त मंत्री पहले ही कह चुकी हैं कि राज्यों को समझाया जा रहा है कि वे एपीएमसी मंडी सिस्टम ख़त्म कर दिया जाय। तो क्या यह कथन, सरकार के कथन के विपरीत नहीं है ?
प्रधानमंत्री को वित्तमंत्री से यह महत्वपूर्ण नीतिगत घोषणा के बारे में पूरी जानकारी लेनी चाहिए। उन्हें अपने वित्त मंत्री से यह पूछना भी चाहिए कि यह बात उन्होंने कैसे कही है ? यह भी उन्हें सबको बताना चाहिए कि यह सरकार का फैसला है या नहीं। जब ऐसे विवाद उठ जाते हैं तो अक्सर यह कह कर पिंड छुड़ाया जाता है कि, यह वित्त मंत्री की निजी राय हो सकती है। पर जब बयान के साल भर के अंदर ही सरकार ऐसा कानून आनन फानन में बना दे तो, यह बात किसी मंत्री की निजी राय नहीं हो सकती है, बल्कि यह सरकार का एक नीतिगत निर्णय ही होता है जिसे तीन कृषि कानूनों में सरकार, कृषि सुधार के नाम पर पारित कर लागू करना चाहती है। वित्त मंत्री साफ साफ कह रही हैं कि
“एपीएमसी की उपयोगिता समाप्त हो चुकी है। राज्यों को समझाया जा रहा है कि वे इसे ख़त्म कर दें।”
अगर 12 नवंबर 2019 को वित्त मंत्री की यह राय थी तो उसके दस महीने बाद और आज भी प्रधानमंत्री किस आधार पर गारंटी दे रहे है कि, मंडियां ख़त्म नहीं होंगी। किसान कैसे उन पर आसानी से भरोसा कर लें ?
इसी लेख में यह लिखा है कि,
” 14 अप्रैल 2016 को मंडियों को एक प्लेटफार्म पर लाने के लिए ई-नाम की योजना लाई गई। चार साल में 1000 मंडियां ही जुड़ पाई हैं, जबकि देश में करीब 7000 मंडियां हैं। मंडियों के ख़त्म करने के वित्त मंत्री के बयान के एक महीना बाद 12 दिसंबर 2019 को हुकूमदेव नारायण की अध्यक्षता वाली कृषि मामलों की स्थायी समिति अपनी एक रिपोर्ट पेश करती है। हुकूमदेव नारायण बीजेपी के सांसद थे। इस रिपोर्ट के अनुसार इस वक्त 469 किलोमीटर के दायरे में कृषि बाज़ार है। जबकि हर पांच किलोमीटर की परिधि में एक मंडी होनी चाहिए। इस तरह भारत में कम से कम 41 हज़ार संयुक्त कृषि बाज़ार होने चाहिए, तभी किसानों को सही मूल्य मिलेगा। अगर इस ज़रूरत के चश्मे से देखेंगे तो पता चलेगा कि 2014 से लेकर 2020 तक मोदी सरकार ने किसानों के बाज़ार के लिए कितनी गंभीरता से काम किया है।”
इसी विषय पर 13 मई 2020 की विवेक मिश्रा की एक रिपोर्ट जो डाउन टू अर्थ के हिन्दी संस्करण में छपी है को भी देखिये। उक्त रिपोर्ट में विवेक मिश्र कहते हैं,
” मंडियों के विकास पर सरकार कितना खर्च कर रही है, इसे जानने और  समझने के लिए वर्ष 2018 और वर्ष  2019 के बजट का अध्ययन करना होगा। उपरोक्त दोनो साल के बजट में  एग्रीकल्चर मार्केटिंग में बीज ख़रीदने से लेकर फ़सल बेचने तक वो सब कृषि कार्य शामिल हैं जो फ़सल को खेतों से उपभोक्ता तक पहुँचाते हैं। इसमें मंडियों की व्यवस्था, स्टोरेज, वेयरहाउस, ट्रांसपोर्ट आदि सब शामिल होते हैं।
अब दोनो साल के बजट देखें,
● 2018 के बजट में एग्रीकल्चर मार्केटिंग के लिए 1050 करोड़ का प्रावधान किया गया था। संशोधित बजट में 500 करोड़ कर दिया गया। आख़िर में मिले 458 करोड़ ही।
● 2019 के बजट में 600 करोड़ का प्रावधान किया गया था। संशोधित बजट में यह राशि घटाकर 331 करोड़ कर दी। 50 प्रतिशत कम हो गई।”
अब यहां यह सवाल उठता है कि ज़रूरत के हिसाब से तो, ‘1050 करोड़ का बजट भी कम है, उसमें से भी 50 प्रतिशत कम हो जाता है।’ किसान नेताओं का कहना है कि नए कानून के अनुसार जो निजी क्षेत्र या कॉरपोरेट की मंडियां खुलेगी उनमें टैक्स का कोई प्राविधान नहीं होगा। सरकारी मंडी में 6% टैक्स का प्राविधान होता हैं और उस टैक्स के पैसे से मंडियों का विकास होता है। यानी मंडियों के विकास का पैसा भी किसान देता है। इस सिस्टम से तो दो तरह की मंडियां हो जाएंगी। एक सरकारी मंडी जिंसमे टैक्स होगा, दूसरी निजी मंडी, जो टैक्स फ्री नहीं होगी। ज़ाहिर है जिसमें टैक्स होगा वो मंडी खत्म हो जाएगी। टैक्स फ्री कर के कॉरपोरेट या निजी क्षेत्र का हित किया जा रहा है या किसान का ? सरकार इसे भी समझा दे।
तीन कानूनो, जो समानांतर मंडी व्यवस्था, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग और जमाखोरी को वैधता बनाने वाले कानून हैं, इन पर कृषि अर्थशास्त्री और अन्य विशेषज्ञों ने भी नियमित लेख लिखे है और सबने इन कानूनों के किसान हितैषी होने पर सन्देह जताया है। सरकार यह तो कह रही है कि, यह कानून हितकारी हैं, पर इन कानूनों से किसानों का हित कैसे होगा, यह उसे भी नहीं मालूम है !
जब सरकार एमएसपी पर फसल खरीद सकती है तो निजी क्षेत्रों को एमएसपी पर फसल खरीदने के लिये कानूनन बाध्य क्यों नही कर सकती ? जहां तक मंडी व्यवस्था की बात है, यह बात सच है कि एमएसपी के बावजूद देश भर के किसानों की फसल सरकार की मंडियां नहीं खरीद है। इस मामले में गठित शांता कुमार कमेटी की रिपोर्ट से यह तथ्य सामने आ चुका है कि  केवल 6 % किसान ही सरकारी मंडी सिस्टम का लाभ उठा पाते हैं। शेष किसान या तो बाजार में अपना उत्पाद बेचते हैं या स्थानीय आढ़तियों को। बाजार और आढ़तिये, जो फसल खरीदते हैं, उनकी कीमत, एमएसपी नहीं बाजार तय करता है जो अक्सर एमएसपी से कम ही होता है। ज़ाहिर है जब सरकार फसल नहीं खरीद पाती है तो किसान बाजार में जो भाव मिलता है,  उस पर ही अपनी फसल बेच देता है।
अब अगर सरकार, किसानों का उत्पाद, सरकारी खरीद दर यानी एमएसपी पर, नहीं खरीद पा रही है और मंडी सिस्टम प्रभावी नहीं है तो इसके लिये किसे दोषी माना जाना चाहिए ? निश्चित ही इसका दोषी सरकारी तंत्र है । और बजाय सरकार इस कुप्रबंधन को दूर करने के, नए कृषि कानून में, पूरा का पूरा बाजार ही निजी व्यापारियों और कॉरपोरेट के हवाले कर दे रही है ! एक प्रकार से यह बला टालना हुआ।
अक्सर यह कहा जाता है कि, नयी मंडी सिस्टम से किसानों को आढ़तियों औऱ बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी। पर किसान इन छोटे और स्थानीय व्यापारियों से मुक्त तो अवश्य हो जाएंगे पर वे मुक्त होकर, और खतरनाक शार्क के चक्कर मे फंस जाएंगे जहां उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं रहेगा। छोटे व्यापारियों और किसानों के बीच जो सहयोग और तालमेल परंपरागत रुप से चला आ रहा है, वह अचानक एक ऐसे तंत्र में बदल जायेगा, जहां किसानों की बात कोई नही सुनेगा और बाजार पर ऐसे
कॉरपोरेट का कब्ज़ा हो जाएगा जिसमें न तो प्रतिद्वंद्विता रहेगी और न ही प्रतियोगिता। प्रतिद्वंद्विता और प्रतियोगिता विहीन बाजार, एकाधिकार यानी मोनोपोली को जन्म देता है जो शोषण को एक सांस्थानिक स्वरूप प्रदान करता है।
अब होगा यह कि, सरकार का मंडी सिस्टम, धीरे धीरे निजी या कॉरपोरेट मंडियों के सामने जानबूझकर खत्म कर दिया जाएगा । न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी की घोषणा एक औपचारिकता बन कर जारी रहेगी। यह भी हो सकता है कि, एमएसपी, कल स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के अनुसार ही घोषित होने लग जाय। सरकार यह कह कर खुद को किसान हितैषी साबित भी कर दे कि उसने तो स्वामीनाथन कमेटी की सारी बातें स्वीकार कर ली हैं। पर जब सरकारी मंडी ही धीरे धीरे खत्म हो जायेगी तो फिर इस प्रकार से घोषित एमएसपी का मतलब भी क्या रह जायेगा ? सरकार जब खरीदेगी तो एमएसपी देगी और जब नहीं खरीदेगी तो एमएसपी नहीं देगी। पर जब सरकारी मण्डिया ही खत्म होने लगेगी तो सरकार खरीदेगी ही कहाँ से और खरीदेगी भी क्यों ?
यही संदेह और आशंका किसानों को है।  इसलिए वे सरकार से यह मांग कर रहे हैं कि सरकार एमएसपी पर एक कानून बना कर उससे कम कीमत की खरीद पर दंडात्मक कार्यवाही का प्राविधान कर दे। किसानों की यह मांग, सरकार के खिलाफ नहीं है बल्कि यह मांग उनके अपने आर्थिक संरक्षण और उनकी फसल की वाजिब कीमत को सुनिश्चित करने के लिये है। सरकार तो एमएसपी पर अनाज खरीद ही रही है, चाहे वह जितनी भी खरीदे। समस्या तो निजी क्षेत्र या व्यापारियों या कॉरपोरेट की है, जिनके बारे में किसान सशंकित हैं कि वे, एमएसपी के अनुरूप अनाज खरीदेंगे भी या नहीं। आज का अनुभव तो किसानों का यही बताता है कि निजी क्षेत्र सरकारी खरीद दर पर, फसल की खरीद नहीं कर रहा है। बल्कि वह एमएसपी की दर से बहुत कम मूल्य पर खरीदी कर रहा है। आज सरकार के पास किसानों का यह शोषण रोकने का क्या उपाय है ? क्या सरकार ने इस समस्या पर कोई संज्ञान लिया है या उसने किसानों को निजी क्षेत्र के ही रहमोकरम पर छोड़ दिया है ?
दुःखद तथ्य यह है कि सरकार ने इस शोषण को पूरी तरह से बाजार के ऊपर छोड़ दिया है और बाजार अपनी मर्जी से फसल की कीमत तय कर रहा है, फसल खरीद रहा है, असीमित और जब तक वह चाहे, तब तक के लिये अनियंत्रित रूप से जमाखोरी कर रहा है। उपभोक्ताओं के लिये भी बाजार का भाव वही निजी क्षेत्र तय कर रहा है और इस पूरे तंत्र में कुछ ही सालों बाद, सरकार धीरे धीरे अदृश्य हो जाएगी।  लेकिन एमएसपी का गजट नोटिफिकेशन छपता रहेगा और सरकार का यह दावा भी बरकरार रहेगा कि उसने तो एमएसपी तय कर दी है और जो वह खरीद कर रही है वह तो एमएसपी पर ही खरीद रही है !
यहां एक सवाल उठता है कि, अगर सरकार खुद किसानों के उत्पाद अपने द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद रही है तो, वह एक कानून बना कर निजी व्यापारियों या बिचौलियों या कॉरपोरेट को भी किसानों की फसल, एमएसपी पर खरीदने के लिये क़ानूनन बाध्य क्यों नहीं कर सकती है ? कम से कम किसानों को यह आश्वस्ति तो होगी ही कि जिस भाव पर सरकार उनसे फसल खरीद कर रही है, कम से कम उस भाव से नीचे तो उनसे कोई व्यापारी या कॉरपोरेट नहीं खरीद सकता है और अगर खरीदेगा तो उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही हो सकती है। सरकार को ऐसा कानून बनाने में दिक्कत क्या है ?
इसलिए किसानों को चाहिए कि वे मंडियों को लेकर सरकार से और सवाल करें और सरकार को चाहिए कि वे किसानों के सवालों के जवाब और स्पष्टता से दे लेकिन उसके पहले प्रधानमंत्री जी अपने वित्त मंत्री से पूछें  कि किसकी इजाज़त से उनकी सरकार के भीतर मंडियों को ख़त्म करने की कवायद चल रही थी ?
क्या यह सब बिना प्रधानमंत्री के जानकारी के हो रहा होगा ?
इस तरह के वीडियो सोशल मीडिया और परंपरागत मीडिया पर बहुत दिखते हैं जिनमे पत्रकार किसान नेताओ से पूछते हैं कि
● सरकार जब बिल वापस लेने से इनकार कर रही है तो, वे बार बार सरकार से बात क्या करने जा रहे हैं ?
● सरकार जब संशोधन करने को राजी है तो किसान संगठन क्यों सहमत नहीं है ?
● कब तक यह धरना प्रदर्शन चलता रहेगा।
पर आज तक किसी पत्रकार, चाहे वह सरकार सनर्थक पत्रकार हों या सरकार विरोधी, की इतनी हिम्मत नहीं हुयी कि, वह सरकार से ही, प्रधानमंत्री, कृषिमंत्री या उद्योग मंत्री, जो भी सरकारी वार्ताकार हों, से यह पूछ लें कि,
● जब किसान कानून वापस लेने पर और सरकार कानून वापस न लेने पर अड़े हैं तो फिर सरकार के पास इस समस्या के समाधान का और क्या उपाय है ?
● सरकार, जिन संशोधनो की बात कर रही है, वे संशोधन किस किस धाराओं में हैं और उन संशोधनो से किसानो को क्या लाभ होगा ?
● सरकार सनर्थक किसानों ने भी अपनी कुछ मांगे रखी हैं, तो वे कौन सी मांगे हैं?
● क्या सरकार वे मांगे जो सरकार समर्थक किसान संगठनों ने रखी हैं को सरकार मानने जा रही है ?
कम से कम जनता को यह तो पता चले कि गतिरोध कहाँ है। सरकार जो संशोधन सुझा रही है उन्हें वह एक प्रेस वक्तव्य के द्वारा कम से कम सार्वजनिक तो करे और सरकार समर्थक किसानों की ही मांगो को स्वीकार करने की कार्यवाही करे।
सरकार के जो मंत्री वार्ता में आते हैं वे तब तक इन किसान संगठनों और सरकार सनर्थक किसान संगठनों की भी मांगो पर कोई विचार करने वाले नहीं हैं और न ही वे कोई स्पष्ट वादा करने वाले हैं। इसका कारण है वे उतने सशक्त नही हैं कि प्रधानमंत्री की स्थापित पूंजीपति केंद्रित अर्थ नीति को बदल दें। जब तक प्रधानमंत्री की तरफ से कोई स्पष्ट आदेश या निर्देश नहीं मिलता है यह तमाशा चलता रहेगा। यह एक प्रकार की नीतिगत विकलांगता की स्थिति है। आज के संचार और परिवहन क्रांति के युग मे किसी भी जन आंदोलन को न तो अलग थलग किया जा सकता है और न ही उसे थका कर कुंठित किया जा सकता है।
अभी हरियाणा में करनाल में मुख्यमंत्री हरियाणा को आना था और वहां उनका विरोध हुआ, पुलिस ने आंसू गैस, वाटर कैनन और लाठी चार्ज किया। बल प्रयोग कितना भी औचित्यपूर्ण हो, उसकी सदैव विपरीत प्रतिक्रिया ही होती है, फिर यह तो एक व्यापक जन आंदोलन का एक भाग है। भाजपा आईटी सेल ने पहले ही इस आंदोलन को खालिस्तानी, विभाजनकारी आदि शब्दो से नवाज़ कर एक तरफ तो जनता और किसानों के प्रति अपनी शत्रुतापूर्ण  मनोवृत्ति उजागर कर दी है और दूसरी तरफ, सरकार के वादाखिलाफी, झूठ बोलने, और जुमलेबाजी के इतिहास को देखते हुए सरकार की विश्वसनीयता पहले से ही संकट में है। अब देखना है 15 जनवरी को सरकार किसान वार्ता में क्या होता है।
(लेखक यूपी कैडर के पूर्व वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं। यह इनके निजी विचार हैं।)
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