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Free joy: मुफ्त में खुशी

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aक्या खुश रहने के लिए मालदार होना जरूरी है? किसी से भी पूछ लीजिए। जवाब हां में मिलेगा। लोगों के दिमाग में ठूंस-ठूंस कर भरा है कि ताकत, पैसा और प्रसिद्धि में कम से कम एक तो चाहिए ही चाहिए। सोचते हैं कि अगर इनमें से एक भी हाथ लग गया तो बाकी दो तो वैसे ही खींच लेंगे। फिर निर्मल आनंद को प्राप्त होंगे। सारे इसी तीन-पांच में लगे रहते हैं।
अचम्भा तब होता है जब खाते-पीते, भरे-पूरे और जाने-माने भी डिप्रेशन की गोलियां खाते मिलते हैं। लोग सोच-सोच हैरान होते हैं कि इन्हें क्या दिक्कत है। ये तो परमपद को प्राप्त हैं। कोई मानने को तैयार नहीं है कि खुशी का माल-पानी से कुछ लेना-देना नहीं है। ऐसा बड़े देशों को देखकर और बड़े लोगों को सुनकर सहज समझा जा सकता है।
अमेरिका को ही लें। यहां का वीसा दुनियां की सबसे अनमोल चीज है। फिर भी यहां पर पांच में से एक को कोई ना कोई मानसिक बीमारी है ही। पच्चीस में एक को तो पागल ही गिन लीजिए। यहां आत्महत्या 10-34 साल की उम्र वालों में होने वाली मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है। मानसिक बीमारी शुरू होने के औसतन ग्यारह साल बाद लोग इलाज के लिए डाक्टर ढूंढ़ने निकलते हैं। इसकी वजह से अमेरिका को प्रति-वर्ष 193.2 बिलियन डॉलर का नुकसान होता है।
विश्वगुरु होने का भ्रम पाले हम पीछे क्यों रहें? सो, डिप्रेशन की राजधानी बने बैठे हैं। जहां तक इलाज की बात है, डाक्टर की संख्या लाख पर एक है। चीन, जिसकी तूफानी तरक़्की से दुनियां जलकर खाक हो रही है, में हालात बदतर है। सौ में से बयानवे इलाज कराते ही नहीं। करें भी क्या? एक तो उपहास का डर, ऊपर से डाक्टर इक्का-दुक्का। मजे की बात ये है कि इस पर किसी का ध्यान ही नहीं है। सरकारें जीडीपी बढ़ाने में लगी है। चतुर माल कूटने में भिड़े हैं। बेकाबू दिमाग लिए घूमते करोड़ों कभी अपना तो कभी दूसरों का नुकसान करते रहते हैं।
इसराइल के एक विचारक हैं युवाल नोआ हरारी। उनका कहना है कि आदमी में कल्पनाशीलता है। इसे कहानी बनाकर उसपर विश्वास करने की कला आती है। धर्म, राजनीति, राष्ट्र, परिवार सब इसी की उपज है। सभ्यता इसी तरह विकसित हुई है। अपने से ताकतवर प्राणियों और प्राकृतिक चुनौतियों पर आदमी इसी वजह से भारी पड़ा है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि आदमी के व्यवहार के दो आरम्भिक नियामक होते हैं – जीन जो उसे जन्म से मिलता है और वातावरण जिसमें वो पलता-बढ़ता है। कालांतर में एक तीसरा नियामक भी वजूद में आ जाता है – स्वयं का भाव। फिर ये तीनों मिलाकर हमारे व्यवहार को तय करते हैं। अगर हम रोजमर्रा की चुनौतियां को ठीक-ठाक निबटा लेते हैं, बदलते हालात में खुद को ढाल लेते हैं तो सबकुछ ठीक लगता है। ऐसा कर पाने की क्षमता के बिगड़ने का एकदम से पता नहीं चलता। सालों लग जाते हैं समझने में कि गाड़ी पटरी से उतर गई है। जीने का उत्साह चला गया है। हालात के मुताबिक व्यवहार नहीं है। पिछले जमाने में इसे भूत-प्रेत का साया बता देते थे। मध्यकालीन यूरोप में तो शैतान बताकर चौराहे पर जिंदा ही जला देते थे। पिछले कुछ दशकों से ही ये माना जाने लगा है कि ये एक बीमारी है। अंदर के विचारों का उलझाव है। रक्त की धमनियां का हार्मोंस में अनियंत्रित बहाव और दिमागी कोशिकाओं के बीच का बाधित संचार है। वो क्या कर रहा है या उसको क्या अनुभव हो रहा है, इसपर आदमी का कोई नियंत्रण नहीं रह जाता है। इलाज की जरूरत होती है जो आसानी से उपलब्ध नहीं होता। लम्बा चलता है। उसपर भी कोई गारंटी नहीं है कि बीमारी दोबारा वापस नहीं आ जाएगी।
इससे तो बचाव में ही बचाव है। पहले तो मानसिक बीमारियों के बारे में अपना नजरिया बदलिए। मान लीजिए कि ये एक बीमारी है। कोई भी इसके चपेट में आ सकता है। समय पर इलाज ही इसका समाधान है। दूसरे, अपने अपने मानसिक स्वास्थ्य के बारे में सचेत रहिए। वारेन बफेट दुनियां के तीसरे सबसे धनी आदमी हैं। कहते हैं कि हमें अपना शरीर और दिमाग का ख्याल रहना चाहिए। कल्पना करें कि पूरी उम्र आपको एक ही कार मिलने वाली है। फिर आप क्या करेंगे? निश्चित तौर पर आप उसे ध्यान से चलाएंगे। उसकी नियमित सर्विस कराएंगे। टूट-फूट की फौरन मरम्मत कराएंगे। शरीर के साथ भी कुछ ऐसा ही है। ये दूसरी मिलने वाली नहीं है। इसको ठीक-ठाक रखने में ही बुद्धिमानी है।
दुनियां के दूसरे सबसे धनी आदमी बिल गेट्स का कहना है कि पैसे बटोरने और ज्ञान बघारने मात्र से आप खुश नहीं रह सकते। चार उपाय करें। एक, कोई संकल्प लें और उसे पूरा करने में लगे रहें। जैसे कि शुरूआती दिनों में उनका सपना था कि हर डेस्क पर एक कम्प्यूटर हो। आजकल बीमारी-उन्मूलन और शिक्षा-प्रसार में जुटे हैं। यही इनको व्यस्त-व्यवस्थित रखता है। दो, देने की प्रवृति रखें। बात सिर्फ – पैसे की नहीं है। आप किसी को रास्ता दिखा सकते हैं। समय दे सकते हैं। वैज्ञानिक शोध में भी पाया गया है कि इससे शरीर में रोग-निरोधी क्षमता बढ़ती है। तीन, शरीर को एक मंदिर की तरह देखें। इसे साफ-सुथरा, चुस्त-दुरुस्त रखें। चौथे, कामकाजी और पारिवारिक जीवन में स्पष्ट भेद रखें। परिवार को समय दें।
गेट्स और बफेट की बात गौर करने लायक है। अगर आप खुश रहना चाहते हैं तो संकल्प-सिद्धी में जुटें। उदार-हृदयी बनें। स्वास्थ्य का खयाल रखें। घर-परिवार से जुड़ाव रखें। ये एक जीवनशैली है जिसे आप आसानी से चुन सकते हैं। खुश रह सकते हैं। फिर देर किस बात की है?
ओपी सिंह
(लेखक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं।)

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