कोरोना बीमारी से जहां पूरा देश जूझ रहा है, वहीं श्रमिक अपने घरों को लौटने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं, लेकिन इस बीमारी ने मानवीय रिश्तों में दरारें डाल दी हैं। हर किसी को डर है कि कहीं उसे कोरोना न हो जाए।  भाई अपने भाई से मिलने के लिए तैयार नहीं है,  बेटा अपनी बुज़ुर्ग माँ को गांव से लाने को राज़ी नहीं है। पति मुंबई से बनारस लौटना चाहता है लेकिन बीवी उसे घर में लेने के लिए तैयार नहीं है।
मुंबई में ऑटो चलाने वाले ४५ साल के रामप्रकाश तिवारी के बीवी-बच्चे बनारस में रहते हैं।लॉक डाउन के कारण पिछले २ महीने से वे बेकार हैं। रोजी-रोटी है नहीं। ऐसे में वे अपने घर लौटना चाहते हैं। उनके सभी दोस्त अपने-अपने गांवों को चले गए हैं। ऐसे में वे मुंबई में रहकर क्या करेंगे। रामप्रकाश बताते हैं-  “मैंने बीवी को फोन किया कि ट्रेन से मै गांव लौट रहा हूं तो बीवी का कहना है कि कुछ समय मुंबई में ही रहो। गांव वाले बाहर से आये हुए किसी व्यक्ति को गांव में प्रवेश नहीं दे रहे हैं। १४ दिन सरकारी अस्पताल में क्वारंटाईन करने के बाद ही गांव में प्रवेश मिल रहा है। ऐसे में बीवी डरी हुई है और घर में मुझे लेने को को तैयार नहीं। उसे डर है कि मेरे जाने से बुजुर्ग माँ और बच्चे को कोरोना हो जाएगा। अब उसे कौन समझाये।”
रामप्रकाश जैसी ही हालात बबलू मिश्रा की है। बिहार के नालंदा के बबलू पिछले ३ साल से मुंबई में हैं। जून में उनकी शादी होने वाली थी लेकिन गाव वालों ने उनको गांव में प्रवेश देने से इंकार कर दिया। इसके कारण शादी रद्द कर दी गयी। अब वे गांव लौटना चाहते हैं लेकिन घर वाले डरे हुए हैं। घरवालों का कहना है कि पिछले दिनों जो लोग मुंबई से लौटे हैं, उनमें कोरोना पाया गया है। इसलिए गांव वाले ऐसे परिवारों को तंग कर रहे हैं।
जो दोस्त हफ्ते में तीन बार मिलते थे, वे आज एक दूसरे को मिलने के लिए तैयार नहीं हैं। मुंबई में कोरोना के बढ़ते हुए आतंक को  देखते हुए सोसायटी में दूध वालों  को भी अंदर आने की इजाजत नहीं है। कई सोसायटियों में पिछले दो महीनों से बिल्डिंग के कम्पाऊंड या टेरेस पर जाने की भी इजाजत नहीं है। बंद कमरों  में कैद हर किसी को डर है कि कहीं उन्हें कोरोना न हो जाए।
मुंबई के मलबार हिल में वसुमती त्रिवेदी अपनी बेटी के घर कुछ दिन रहने के लिए गयी थीं। लॉकडाउन होने से वे बेटी के घर में ही रह रही हैं। पिछले दो महीनोे  से वह अपने बेटे को उन्हें अपने घर ले जाने के लिए कह रही हैं लेकिन वर्ली स्थित उसका बेटा  माँ को ले जाने के लिए तैयार नहीं है। अब उसकी सोसायटी वालों  का फरमान है कि अगर उसकी माँ घर में आयी तो पूरे परिवार को १४ दिन घर में ही रहना होगा।  सोसायटी के सदस्यों को कोरोना से खतरा लग रहा है।
      मुंबई से भिवंडी के रास्ते पर मुलाकात हुई हरिप्रसाद से जो  अपने दो छोटे बच्चे और पत्नी को लेकर वे ऑटो से जौनपुर की ओर  निकले हैं। हरिप्रसाद का कहना है कि माँ को फोन करके हम मुंबई से  निकल तो गए हैं लेकिन पता नहीं गांव में हमें प्रवेश मिलेगा भी या नहीं।  गांव में जो भी मुंबई से जाता है, उससे लोग ठीक तरह से बात भी नहीं करते। मानो हम दूसरी दुनिया से आये हों। हम १४ दिन अस्पताल में रहकर ही गांव में जाएंगे जब पूरी तरह से कोरोना की टेस्टिंग हो जाए, पर गांव वालों ने भेदभाव करना शुरू कर दिया है
   हरिप्रसाद जैसी स्थिति बलिया जा रहे चिंटू यादव की है। ट्रक वाले को ४००० रुपये देकर वे गांव जाने के लिए तो निकले हैं लेकिन परिवारजनो ने साफ़ कह दिया है कि १४ दिनों के बाद ही घर में एंट्री मिलेगी।जो माँ रोज  अपने बेटे से बात कर रही थी,  वह अब अपने बेटे को घर में लेने के लिए तैयार नहीं है
  हर घर की आज यही कहानी है।  एक पड़ोसी दूसरे से मिलने के लिए तैयार नहीं है। वहीं मुंबई की सोसायटी में तो बाहरी व्यक्ति की एंट्री पर पाबंदी लगा दी है। मुंबई के कल्याण इलाके में तो यहाँ की म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने एक फरमान जारी कर दिया था,  जिसमें कहा गया था कि जो भी मुंबई में काम करता है उसे अब कल्याण में रहने की इजाजत नहीं दी जाएगी। इस पर विवाद होने के बाद यह फरमान वापिस लिया गया।
   मुंबई की कुछ कम्पनियों ने तो वसई-विरार, कल्याण-डोम्बिवली में रहने वाले अपने कर्मचारियों को उसी इलाके में नौकरी ढूंढ़ने के लिए कह दिया है क्योंकि ज्यादातर ये लोग ट्रेन से यात्रा करते हैं। मुंबई की लोकल ट्रेनें  कब शुरू होंगी इसका कोई अतापता नहीं है ऐसे में कम्पनियां अपने कर्मचारियों को स्थानीय इलाके में नौकरी करने की सलाह दे रही है
मुंबई की कुछ सोसायटी में तो जिस घर में कोरोना के मरीज पाए गए हैं, उनसे बात तक करना छोड़ दिया है। यहाँ तक कि कई सोसायटियों में तो जो डॉक्टर-नर्स अस्पतालों में १० दिन की सेवा कर लौटे हैं,  उनका स्वागत करने की बजाय डर के कारण उनको अपने ही घर में एंट्री नहीं दी जा रही.
मुंबई के एक निजी अस्पताल में काम कर रहीं निधि सिंह का कहना है कि यहां रोज अपस्ताल के लिए जाती है तब उसे अपनी ही सोसायटी वालों से लड़-झगड़कर अंदर जाना पड़ता है। इन सबका कहना है कि मैं एक अस्पताल में काम करती हूं इसलिए कोरोना के संक्रमण का खतरा मुझे ज्यादा है। ऐसे में अगर मुझे कोरोना हुआ तो पूरी सोसायटियो को कोरोना होगा।
यहो  हालत बैंक में काम कर रहीं रूही डिसूजा का है। नबक शुरू होने से रोज उसे ५ घंटे के लिए बैंक में जाना पड़ता है। ऐसे में बिल्डिंग वाले उसे काम पर जाने के लिए मना करते हैं। लॉकडाउन के शुरुआत में तो वे कम्पनी के गेस्ट हाउस में रहीं लेकिन जब वे १५ दिन वहां रहने के बाद घर लौटीं तो बिल्डिंग वालो ने एंट्री नहीं दी। आखिर पुलिस को बुलाना पड़ा और पुलिस की मध्यस्थता के बाद उसे अपने घर में एंट्री मिली। अभी जब वे बैंक के लिए निकलती हैं तो लोगो की नजरों से बचकर जाना पड़ता है लोग उससे लड़ते है
कोरोना ने मानवीय स्वभाव को उजागर कर दिया है जिसमें हर मनुष्य सिर्फ और सिर्फ अपनी रक्षा करना चाहता है। रिश्ते-नातों  का कोरोना काल में कोई मोल नहीं रह गया है।