उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी और विश्वस्त नौकरशाह रहे अरविंद शर्मा की एंट्री ने हलचल मचा दी है। अरसे से बतौर मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री रहते केंद्र में मोदी के साथ साये की तरह बने रहे आईएएस अधिकारी अरविंद शर्मा ने इसी साल की शुरुआत में सेवा से वीआरएस लेकर भाजपा ज्वाइन की और आननफानन में यूपी में हो रहे विधानपरिषद के चुनावों में सदस्य बन गए। अरविंद शर्मा के उच्च सदन में पहुंचने के साथ ही प्रदेश की राजनीति में भी उच्च पद उनकी प्रतीक्षा कर रहा है।
अपने शांत स्वभाव के अनुसार शर्मा ने अभी तक शांतचित्त आचरण ही दर्शाया है। माना जा रहा है कि वे अपने इसी शांत और गंभीर आचरण के साथ अपने गृह राज्य में प्रधानमंत्री मोदी के विजन को पक्के तौर पर अमल में लाने के सूत्रधार बनेंगे ।
 विधान परिषद का सदस्य चुने जाने के बाद सोशल मीडिया पर उनकी टिप्पणी भी उनके स्वभाव को दर्शाती है।
उन्होंने ट्वीट किया है-
करहु प्रणाम जोरि जुग पानी !
राष्ट्र मेरी जान है |
भाजपा ही शान है |
कमल अब पहचान है ||
भाजपा के राष्ट्रीय एवं राज्य नेतृत्व तथा कार्यकर्ताओं का भाजपा  का एमएलसी बनाने के लिए धन्यवाद |
मान. मोदी जी को शत शत नमन !
माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश मंत्रिपरिषद के बहुप्रतीक्षित विस्तार में अरविंद शर्मा का आना तय है और उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी दी जा सकती है। मोदी के करीबी अरविंद के यूपी राजनीति में पदार्पण के साथ ही वो भी सत्ता के केंद्र बन गए हैं। भाजपा के नेताओं से लेकर कार्यकर्त्ताओं का जमावड़ा उनके ईर्दगिर्द दिख रहा है और अंतर्मुखी पर सीधे स्वभाव के अरविंद शर्मा सबसे विनयावनत होकर मुलाकात भी कर रहे हैं। राजनैतिक गलियारों में अरविंद शर्मा को उप मुख्यमंत्री से लेकर कैबिनेट मंत्री बने जाने की चर्चाएं तैर रही हैं और कुछ जगहों पर उन्हें गृह व नियुक्ति विभाग जैसी अहम जिम्मेदारियां दिए जाने की बात भी कही जा रही है। हालांकि ये सब कयास ही हैं पर इतना तय है कि केंद्र में एमएसएमई जैसा विभाग संभाल रहे अरविंद शर्मा कम से कम यूपी की राजनीति में नेपथ्य में रहने या महज विधानपरिषद का सदस्य बनने के लिए तो नहीं ही आए हैं।
उत्तर प्रदेश में अरविंद शर्मा को भेजे जाने के पीछे पार्टी संगठन से ज्यादा प्रधानमंत्री मोदी की इच्छा व उन पर कुछ कर डालने का भरोसा है। अगले एक साल में उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने हैं और चुनावों से पहले भाजपा वादों से इतर धरातल पर ठोस काम कर मैदान में उतरना चाहती है। अरविंद शर्मा को यूपी भेजे जाने के पीछे बहुत बड़ा कारण प्रधानमंत्री की पसंदीदा परियोजनाओं व कल्याणकारी कार्यक्रमों को यहां ढंग से लागू करवाना भी कहा जा रहा है। चर्चा तो यह भी है कि प्रदेश में राजनीति, नौकरशाही और पार्टी संगठन के बीच बेहतर सामंजस्य बैठाने जैसा अहम काम भी अरविंद शर्मा के बूते किया जा सकता है। वित्त से लेकर औद्योगिक नीतियों की बेहतर समझ और प्रदेश में निवेश लाने के साथ रोजगार बढ़ाने जैसे कामों में योगी के लिए भरोसेमंद साथी साबित हो सकते हैं अरविंद शर्मा। इसके अलावा शर्मा का उपयोग प्रशासनिक कील कांटे दुरुस्त करने और अधिकारियों से बेहतर काम लेने में भी किया जा सकता है। अरविंद शर्मा आईएएस कैडर में जिस बैच के हैं वहीं इन दिनों यूपी में सबसे ज्यादा महत्व के पदों पर आसीन है। इन हालात में उनसे बेहतर काम लेने में अरविंद शर्मा ज्यादा मुफीद साबित होंगे।
अरविंद शर्मा 1988 बैच के गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी रहे हैं और लंबे समय से मोदी के साथ रहे हैं। गुजरात में उद्योगों के जमने, वाइब्रैंट गुजरात जैसे कार्यक्रमों के साथ देश भर के सामने एक माडल पेश करने के पीछे बहुत कुच परिश्रम व कौशल अरविंद शर्मा का ही माना जाता है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अरविंद शर्मा पीएमओ में पहुंचे और लंबे समय तक यहां काम किया। केंद्र में सचिव पद पर प्रोन्नत होने के बाद उन्हें प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पसंदीदा एमएसएमई विभाग का काम सौंपा जहां वो वीआरएस लेने तक काम कर रहे थे। अपने लंबे प्रशासनिक कैरियर में अरविंद शर्मा विवादों में न पड़ चुपचाप अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए जाने जाते रहे हैं। यूपी की राजनीति में प्रवेश के पहले सप्ताह में ही उन्होंने यहां भी दिखा दिया है कि वो किसी तरह की गुटबाजी, चाटुकारिता या वाहवाही से परे रह कर विनम्रता से केवल काम करने आए हैं।
उधर उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की 12 सीटों के लिए हो रहे चुनावों में अब सभी प्रत्याशियों का निर्विरोध जीत  गए है। समाजवादी पार्टी ने पर्याप्त विधायक न होने के बाद भी एक अतिरिक्त प्रत्याशी उतारा और भाजपा को चुनाव कराने की चुनौती दी। भाजपा ने किसी तरह का जोखिम न लेते हुए सपा को एक अतिरिक्त सीट जीतने का रास्ता दे दिया। अपने विधायकों में और भी फूट के अंदेशे से हलकान बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने विधानपरिषद में एक सीट के लिए किसी तरह का गठजोड़ भी नहीं किया। उत्तर प्रदेश विधान परिषद के 12 सीटों के लिए हो रहे चुनावों में नामांकन का आखिरी दिन सोमवार था और उम्मीद की जा रही थी कि सपा को एक अतिरिक्त सीट जीतने से रोकने के लिए भाजपा किसी निर्दलीय या फिर बसपा के प्रत्याशी को समर्थन दे सकती है पर किसी भी तरह की किरकिरी से बचने का रास्ता ही निकाला गया। हालांकि थोड़ी देर की सनसनी पैदा करने के लिए निर्दलीय के तौर पर संघ से जुड़े कानपुर के महेशचंद्र शर्मा ने नामांकन जरुर किया पर पर्याप्त प्रस्तावक विधायक न होने के चलते उनका पर्चा खारिज हो गया।
उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायकों की संख्या के बूते भाजपा अपने 10 तो सपा केवल एक प्रत्याशी को विधानपरिषद में भेज सकती थी। विधानपरिषद में निर्वाचन के लिए 32 विधायकों के मतों की जरुरत है। भाजपा के पास अपने 309 व गठबंधन के साथियों अपना दल, निर्दलीय न निषाद पार्टी को मिलाकर दस सीट निकालने की आसानी थी। वहीं सपा के पास 48 विधायक हैं और 32 मतों के साथ एक एमएलसी की जीत तय करने के बाद उसके पास 16 अतिरिक्त मत बचते थे। इन हालात में सपा पर 16 अतिरिक्त मतों का जुगाड़ कर अपना दूसरा प्रत्याशी जितवाने की चुनौती थी। जोखिम लेते हुए सपा ने दो प्रत्याशी उतार दिए और उलटा भाजपा को चुनाव लड़ने की चुनौती दे डाली। पहले माना जा रहा था कि बसपा , अन्य छोटे दलों के साथ निर्दलीय प्रत्याशी उतार कर सपा के दूसरे प्रत्याशी की राह मुश्किल कर सकती है। हालांकि आखिरी दिन तक भाजपा ने इस तरह का कोई कदम नही उठाया और सपा की झोली में आसानी से दो सीटें डाल दीं।
यूपी विधान परिषद चुनाव में नामांकन के आखिरी दिन संघ से जुड़े रहे कानपुर के महेशचंद्र शर्मा ने अपना पर्चा भर कर जरुर कुछ सनसनी पैदा की पर वो भी ज्यादा देर तक नहीं टिकी। महेशचंद्र शर्मा ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर पर्चा दाखिल किया पर उनके पास कोई  भी विधायक प्रस्तावक के तौर पर नहीं था। नामांकन पत्र की वैधता के लिए 10 विधायक प्रस्तावकों का होना आवश्यक होते है।
कुछ ही महीनों पहले राज्यसभा के चुनाव में अपने आधा दर्जन विधायकों के सपा के पाले में जाने पर खपा बसपा सुप्रीमों मायावती ने एलान किया था कि वह विधानपरिषद के चुनाव में भाजपा की भी मदद ले सकती हैं या कर सकती हैं। माना जा रहा था कि भाजपा की मदद से बसपा किसी निर्दलीय को समर्थन देकर सपा का खेल बिगाड़ सकी है। विधानपरिषद चुनाव की प्रक्रिया शुरु होने पर बसपा ने दो नामांकन पत्र खरीदे भी पर भाजपा से किसी तरह की मदद न मिलने पर उसे खाली हाथ बैठना पड़ा।