Editorial Aaj Samaaj: खामेनेई के खिलाफ बगावत का पूरा सच

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Editorial Aaj Samaaj: खामेनेई के खिलाफ बगावत का पूरा सच
Editorial Aaj Samaaj: खामेनेई के खिलाफ बगावत का पूरा सच

Editorial Aaj Samaaj | राकेश सिंह | दुनिया की नजरें इन दिनों ईरान पर टिकी हुई हैं। वहां की सड़कें जल रही हैं, लोग चीख रहे हैं और हवा में मौत की गंध फैली हुई है। दिसंबर 2025 के आखिरी दिनों में शुरू हुई यह बगावत पूरे देश में फैल चुकी है। लोग सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के खिलाफ नारे लगा रहे हैं। खामेनेई को मौत और तानाशाह को मौत जैसे नारे।

ये प्रदर्शन सिर्फ गुस्से की वजह से नहीं, बल्कि वर्षों की आर्थिक तबाही, महंगाई और सरकार की ज्यादतियों का नतीजा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने धमकी दी है कि अगर ईरानी सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों को मारना जारी रखा, तो अमेरिका हमला कर सकता है। क्या यह सब तीसरे विश्व युद्ध की ओर इशारा कर रहा है? क्या इजराइल भी इसमें कूदेगा?

आर्थिक संकट ने लोगों को सड़कों पर ला दिया

ईरान में यह सब दिसंबर 2025 के अंत में शुरू हुआ, जब तेहरान के बाजारों में व्यापारी और दुकानदार सड़कों पर उतर आए। वजह थी देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था। खाने-पीने की चीजें 70-80 प्रतिशत महंगी हो गईं। पानी और बिजली की किल्लत बढ़ी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने कमर तोड़ दी। ये प्रतिबंध सितंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र के जरिए फिर से लगे, जब इजराइल के साथ 12 दिनों की जंग हुई थी। लोग कह रहे हैं कि सरकार की गलत नीतियां, भ्रष्टाचार और विदेशी युद्धों में पैसा बहाना, जैसे यमन, सीरिया और लेबनान में, ने देश को कंगाल बना दिया।

शुरू में प्रदर्शन सिर्फ आर्थिक मांगों तक थे, मुद्रा को स्थिर करो, महंगाई रोको, रोजगार दो। लेकिन जल्दी ही ये राजनीतिक हो गए। लोग खामेनेई और इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ नारे लगाने लगे। तेहरान, इस्फहान, शिराज, केरमानशाह, मशहद जैसी दर्जनों शहरों में लाखों लोग सड़कों पर। यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स, मजदूर, महिलाएं, सब शामिल। विपक्षी ग्रुप्स जैसे नेशनल काउंसिल ऑफ रेसिस्टेंस ऑफ ईरान और कुर्द संगठनों ने हड़तालों का समर्थन किया। यहां तक कि निर्वासित क्राउन प्रिंस रेजा पहलवी ने लोगों से कहा कि शाम को छतों से नारे लगाओ, आंदोलन को जिंदा रखो।

जनवरी 2026 तक प्रदर्शन 31 प्रांतों के 111 शहरों में फैल चुके थे, 348 जगहों पर हो रहे थे। वीडियोज में दिख रहा है कि लोग गवर्नर ऑफिस पर हमला कर रहे हैं, सुरक्षा बलों से भिड़ रहे हैं। लेकिन सरकार ने जवाब में क्या किया? इंटरनेट बंद कर दिया, फोन लाइंस काट दीं, और 21 प्रांतों में दुकानें-स्कूल बंद करवा दिए, ठंड का बहाना बनाकर। सुरक्षा बल-आईआरजीसी, बसिज और पुलिस ने आंसू गैस, लाइव अम्युनिशन का इस्तेमाल किया।

अस्पतालों में घुसकर घायलों को गिरफ्तार किया। कम से कम 45 लोग मारे गए, सैकड़ों घायल, और 2000 से ज्यादा गिरफ्तार। कुछ रिपोर्ट्स की मानें तो ईरान ने इराकी मिलिशिया जैसे कताइब हिजबुल्लाह से 800 लड़ाके बुलाए मदद के लिए। सरकारी मीडिया ने मौतों को झुठलाया या कहा कि मारे गए बसिज सदस्य थे, लेकिन राइट्स ग्रुप्स ने साबित किया कि ज्यादातर प्रदर्शनकारी थे।

अमेरिका क्यों बीच में कूद रहा है

अब बात अमेरिका की। डोनाल्ड ट्रम्प, जो 2024 चुनाव जीतकर फिर राष्ट्रपति बने, ने जनवरी 2026 की शुरुआत में साफ कहा कि अगर ईरान ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को गोली मारी या मारा, तो अमेरिका उनकी रक्षा के लिए आएगा और बहुत जोर से हमला करेगा। उन्होंने अपने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट किया कि ईरान अगर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हिंसक तरीके से मारता है, तो अमेरिका लॉक एंड लोडेड है। यह धमकी 2-3 जनवरी के आसपास आई, जब मौतों की संख्या बढ़ रही थी।

ट्रम्प ने प्रदर्शनकारियों को बहादुर लोग कहा और कहा कि वे मदद मांग रहे हैं। ट्रम्प का ईरान से पुराना बैर है। उनके पहले टर्म में उन्होंने ईरान न्यूक्लियर डील से बाहर निकला, जनरल सुलेमानी को मरवाया, और सख्त प्रतिबंध लगाए। अब 2025 की इजराइल-ईरान जंग के बाद संयुक्त राष्ट्र के स्नैपबैक सैंक्शन्स से ईरान और कमजोर हुआ। ट्रम्प को लगता है कि यह मौका है रिजीम को दबाने का। प्रदर्शनकारियों ने खुद ट्रम्प से मदद मांगी, इसलिए वह इसे ह्यूमन राइट्स का मुद्दा बना रहे हैं।

लेकिन असल में, अमेरिका को डर है कि अगर ईरान का रिजीम गिरा, तो मिडिल ईस्ट में बैलेंस बदल सकता है या अगर नहीं गिरा, तो न्यूक्लियर प्रोग्राम और मिसाइल्स फिर शुरू हो सकते हैं। ट्रम्प ने कहा कि अगर ईरान ने मिसाइल्स या न्यूक्लियर बनाए तो उन्हें मिटा देंगे। ईरान ने जवाब में कहा कि ट्रम्प रेड लाइन न पार करें और उनके आर्मी चीफ ने प्री-एम्प्टिव अटैक की धमकी दी। यह सब वेनेजुएला ऑपरेशन के बाद आया, जहां अमेरिका ने हस्तक्षेप किया था। ट्रम्प को लगता है कि ईरान में भी वैसा ही कर सकते हैं। लेकिन क्या अमेरिका सच में हमला करेगा?  क्योंकि यह सिर्फ दबाव बनाने की रणनीति है। फिर भी, मौतों की संख्या 36-45 पहुंच गई है, और ट्रम्प की धमकियां जारी हैं।

इजराइल की भूमिका : क्या वे भी शामिल होंगे?

इजराइल हमेशा ईरान का दुश्मन रहा है। 2025 की 12-डे वॉर में इजराइल ने ईरान के कई ठिकानों पर हमला किया था। अब प्रदर्शनों में इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि ईरानी लोग अपना भाग्य खुद संभालें और वे उनके संघर्ष से सहानुभूति रखते हैं।  ईरान ने आरोप लगाया कि मोसाद के एजेंट्स प्रदर्शनों में घुसे हुए हैं, और 5 जनवरी को एक को गिरफ्तार करने का दावा किया।

क्या इजराइल शामिल होगा? सीधे तौर पर शायद नहीं, क्योंकि वे पहले से ही गाजा, लेबनान और सीरिया में उलझे हैं। लेकिन वे चुपके से मदद कर सकते हैं, जैसे साइबर हमला या इंटेलिजेंस शेयरिंग। इजराइल को फायदा है अगर ईरान का रिजीम कमजोर हो, क्योंकि ईरान हिजबुल्लाह और हमास को सपोर्ट करता है। ट्रम्प के साथ इजराइल का गठबंधन मजबूत है, तो अगर अमेरिका ने कुछ किया, इजराइल साथ दे सकता है। लेकिन अभी तक कोई डायरेक्ट इन्वॉल्वमेंट नहीं दिख रहा।

क्या तीसरा विश्व युद्ध होगा?

क्या यह विश्व युद्ध-3 की ओर ले जाएगा? तनाव काफ़ी हैं। ईरान ने अमेरिका को धमकी दी, ट्रम्प ने जवाब दिया। ईरान के पास रूस और चीन का सपोर्ट है, अमेरिका के पास इजराइल और अरब देश। अगर अमेरिका ने हमला किया, तो ईरान होर्मुज स्ट्रेट बंद कर सकता है, तेल की कीमतें आसमान छूएंगी, और ग्लोबल इकोनॉमी डगमगा सकती है। ट्रम्प की धमकियां  हैं, असल हमले से पहले डिप्लोमेसी चलेगी।

ईरान भी कमजोर है, आर्मी चीफ की धमकियां सिर्फ घरेलू मोराल के लिए। इंटरनेशनल कम्युनिटी, यूरोप, यूएन दबाव डाल रही है कि हिंसा रुके। अगर रिजीम गिरा, तो नया ईरान आ सकता है, लेकिन अगर नहीं, तो और दमन। अभी तक 45 मौतें हो चुकीं, लेकिन बड़े युद्ध की नौबत नहीं आई।

ईरान के लोग मौजूदा शासन से बहादुरी से लड़ रहे हैं। यह सिर्फ एक देश की कहानी नहीं, बल्कि आजादी की जंग है। अगर ट्रम्प की धमकियां काम आईं और हिंसा रुकी, तो अच्छा। वरना, मिडिल ईस्ट फिर जल सकता है। कुल मिलाकर, यह मामला अभी गर्म है, लेकिन उम्मीद है कि बातचीत से सुलझे।

राकेश सिंह

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रबंध संपादक हैं।)

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