Supreme Court: सिर्फ तर्क के आधार पर आम लोगों को परेशान नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

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Supreme Court: सिर्फ तर्क के आधार पर आम लोगों को परेशान नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
Supreme Court: सिर्फ तर्क के आधार पर आम लोगों को परेशान नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

पश्चिम बंगाल में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई
कहा- जिन लोगों को लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के आधार पर नोटिस भेजे गए हैं, उनकी लिस्ट पंचायत और ब्लॉक आॅफिस में सार्वजनिक की जाए
गलत नाम और उम्र वाले वोटर्स की जांच निष्पक्षता से की जाए
Supreme Court, (आज समाज), नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को पश्चिम बंगाल में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई। चुनाव आयोग ने कोर्ट को बताया कि एसआईआर के तहत 1.25 करोड़ लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी नोटिस जारी किए गए हैं। जो पिता-पुत्र की उम्र, नामों की स्पेलिंग (खासतौर पर बंगाली नामों) में अंतर होने पर भेजे जाते हैं। याचिकाकर्ताओं के वकील कपिल सिब्बल ने प्रक्रिया पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा- उम्र के अंतर, नामों की स्पेलिंग पर सवाल हैं।

इसलिए लिस्ट सार्वजनिक की जाए। साथ ही बीएलओ को सुधार प्रक्रिया में मदद की जाए। इस पर कोर्ट ने चुनाव आयोग को सख्त निर्देश में कहा, सिर्फ तर्क के आधार पर आम लोगों को परेशान नहीं किया जा सकता। जिन लोगों को लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के आधार पर नोटिस भेजे गए हैं, उनकी लिस्ट पंचायत और ब्लॉक आॅफिस में सार्वजनिक की जाए। कोर्ट ने कहा कि वोटर लिस्ट में सुधार की प्रक्रिया जरूरी हो सकती है, लेकिन यह पारदर्शी, समयबद्ध और आम लोगों के लिए असुविधाजनक नहीं होनी चाहिए।

15 जनवरी को चुनाव आयोग ने कहा था, ये सिर्फ नागरिकता का वेरिफिकेशन, हम देश निकाला नहीं दे रहे

इससे पहले 15 जानवरी को चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था, एसआईआर के तहत आयोग सिर्फ यह तय करता है कि कोई व्यक्ति वोटर लिस्ट में रहने के योग्य है या नहीं। इससे सिर्फ नागरिकता वेरिफाई की जाती है। एसआईआर से किसी का डिपोर्टेशन (देश से बाहर निकालना) नहीं होता, क्योंकि देश से बाहर निकालने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।