फिर डाल पर बैताल

SATIRE: बैताल फिर डाल पर

अरे विक्रम आज तूं ये गरीब जैसा क्यों नजर आ रहा है। तूं जो राजा है, फिर ये गरीबों वाला स्वांग क्यों रच रहा है। क्या हो गया है तुझे?....

SATIRE: गाल पर हाथ रखकर क्या सोच रहा है बैताल?

गाल पर हाथ रखकर क्या सोच रहा है बैताल? अब क्या बताऊं विक्रम, बड़ा कंफ्यूज हूं। क्यों क्या हो गया, चुनाव का मौसम है तो कंफ्यूजन तो नेताओं में होनी....

SATIRE: अरे बैताल आज तूं लठ्ठ लेकर क्यों तैयार है?

अरे बैताल आज तूं लठ्ठ लेकर क्यों तैयार है? देख न विक्रम । इन नेताओं ने हम बैतालों का मरने के बाद भी जीना दुश्वार कर रखा है। जब जिंदा....

SATIRE: बैताल फिर डाल पर

ओ बैताल तूं क्यों परेशान है रे? अब क्या बताऊं विक्रम, परेशान होना तो लाजिमी ही है। क्यों क्या हुआ? अरे मैं समझता था रात के अंधेरों पर हम बैतालों....

SATIRE: फिर डाल पर बैताल

 विक्रम तूं नादान है। तुझे पता है आज की आभासी दुनिया में क्या हो रहा है। चल तुझे सैर करा लाऊं। कहां लेकर चलेगा बैताल पहले ये बता। चल आज....