Ajay Shukla

धर्मांधता हमारे भविष्य को जहरीला बना रही!

विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भीड़तंत्र में तब्दील हो गया है? इस वक्त यह सवाल मौजूं है। जुलाई 2017 में सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी और तहसीन पूनावाला की याचिका....Read More

Royalty, corruption and starvation! शाहखर्ची, भ्रष्टाचार और भुखमरी!

यूपी के शाहजहांपुर निवासी अखिलेश गुप्ता ने व्यवसायिक कर्ज न चुका पाने के कारण परिवार सहित आत्महत्या कर ली। लखनऊ की एक फ्लोर मिल में काम करने वाले महेश अग्रवाल ने नौकरी चले जाने के अवसाद में खुदकुशी कर ली।....Read More

Adityanath is the ideology of BJP! भाजपा की विचारधारा हैं आदित्यनाथ!

यह किसी से छिपा नहीं है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ही भाजपा का नीति नियंता है। वह अपनी हिंदुत्व की परिभाषा खुद गढ़ता और क्रियान्वित करता है। इस कड़ी में जो चेहरा सामने है, वह देश के सबसे बड़े सूबे....Read More

Statesman builds the nation! स्टेट्समैन राष्ट्र बनाता है!

राष्ट्रीय सांख्यकी मंत्रालय के मुताबिक 2020-21 के वित्तीय वर्ष में जीडीपी 135 लाख करोड़ रही, जो पिछले साल 145 लाख करोड़ थी। इस वक्त हमारे देश की जीडीपी -7.3 फीसदी पर है, जो 1947 के बाद पहली बार इतनी बदतर....Read More

Nehru’s ideology is the need of the hour! समय की जरूरत है नेहरू की विचारधारा!  

“आज एक सपना खत्म हो गया है। एक गीत खामोश हो गया है। एक लौ हमेशा के लिए बुझ गई है। यह एक ऐसा सपना था, जिसमें भुखमरी, भय-डर नहीं था। यह ऐसा गीत था, जिसमें गीता की गूंज थी तो गुलाब की....Read More

Religion teaches humanity not opportunism! मौकापरस्ती नहीं, मानवता सिखाता है धर्म! 

“अगर मुमकिन हुआ होता, बुझाकर रख लिया होता, अमीरों ने कहीं सूरज छुपाकर रख लिया होता”। हमारे मित्र अशोक रावत की गजल की ये पंक्तियां और डॉ रूपचंद्र शास्त्री की गजल, “ये गद्दार मेरा वतन बेच देंगे, ये गुस्साल ऐसे कफन बेच देंगे”। इस वक्त युक्तिसंगत....Read More

Raktacharitr ko vikaas charitr banaana hoga! रक्तचरित्र को विकास चरित्र बनाना होगा! 

अपनी 66 साल की जिंदगी में उसने सबसे महंगी साड़ी (तंत) 495 रुपये की और चप्पल 55 रुपये की पहनी। उसने न कभी गले में चेन डाली और न कोई जेवर। कान में छोटे टॉप्स, दायें हाथ में एक चूड़ी और....Read More

We cry, shame or curse! But whom? हम रोएं, शर्म करें या लानत दें! मगर किसे?

भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी रहे पूर्व राजदूत अशोक अमरोही गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल की पार्किंग में पांच घंटे इलाज का इंतजार करते दम तोड़ गये। पिछले दो सप्ताह में कुछ इसी तरह हमने भी अपने 40 प्रियजनों को खो दिया। कुछ रिश्तेदार थे, कुछ मित्र और सहकर्मी। पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में मददगार रहे आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष दीपक त्रिवेदी का कोरोना से निधन, उस वक्त हुआ, जब हम उन्हें सफल और बेदाग सेवा पूरी करने की बधाई देने के लिए फोन मिला रहे थे। यूपी में जिला जज के पद पर तैनात एक मित्र का लखनऊ के अस्पताल में कोरोना से लड़ रहे एक अन्य जज की मदद के लिए फोन आया। आक्सीजन के संकट से परिवार परेशान था। उन्हें बड़े अस्पताल में आक्सीजन वाला बेड चाहिए था, काफी कोशिशों के बाद जब अस्पताल के निदेशक से बात हुई और सरकारी प्रक्रिया पूरी कराई, तब तक देर हो चुकी थी। उनकी सांसें थम गई थीं। इतना बेवश तो हम कभी नहीं रहे। हमें याद है कि साल के शुरुआती दिनों में भाजपा ने प्रस्ताव पास करके कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कारण देश करोना से जीत गया। इस जश्न में हम सब भूल गये। हमने वह सब किया, जो नहीं करना था। यूपी में पंचायत चुनाव की ड्यूटी करते 700 से अधिक शिक्षक-कर्मचारी मौत के मुंह में चले गये हैं। नतीजतन, कोरोना की दूसरी लहर यूं चली, कि सिर्फ अप्रैल महीने में 45 हजार लोग मौत के मुंह में समा गये। आजकल, रोज सुबह से ही हम सरकारी और निजी अस्पतालों में बेड, आक्सीजन और दवायें उपलब्ध कराने में उलझ जाते हैं। इस दौरान तमाम लोग दम तोड़ देते हैं। कई बार, हमारे पास अफसोस करने के सिवाय कुछ नहीं होता। शब्दों में बात करना आसान है मगर जिस परिवार का कोई सदस्य जाता है, उसकी पीड़ा वही समझ सकता है। जो सत्ता और उनके नायकों का गुणगान करते नहीं थकते थे, आज वो भी बेवश, उन्हें कोस रहे हैं। यूपी, मध्य प्रदेश और दिल्ली के हमारे तमाम डॉक्टर मित्रों ने बताया कि उच्च स्तर से उन्हें निर्देश मिल रहे हैं कि वायरस से लड़ने वाले इंजेक्शन रेमडीसीवर को न लिखें। आक्सीजन और वेंटीलेटर पर मरीज को तब रखें, जब कोई साधन न बचे। इसका नतीजा यह है कि आखिरी वक्त में यह सब उपलब्ध कराने तक कई मरीज दम तोड़ देते हैं। सरकार की नाकामी का ठीकरा डॉक्टरों पर फूटता है। कई जगह लुटा-पिटा तीमारदार अपना मानसिक संतुलन खो देता है। जिससे हिंसक घटनाएं बढ़ी हैं। वायरस और संसाधनों के अभाव से लड़ते अब तक 791 डॉक्टरों ने दम तोड़ दिया। औसतन हर अस्पताल के 30 फीसदी डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ भी कोरोना संक्रमित हैं। सरकार कोरोना से जंग लड़ने के बजाय आंकड़ों का प्रबंधन करने में जुटी है। जब दो लाख से अधिक लोग मर गये, तब सरकार आक्सीजन प्लांट, रेमडीसीवर और कोविड बेड-अस्पताल बनाने की बात करती है। जब तक इनकी व्यवस्था बनेगी, तब तक लाखों लोग मर जाएंगे। हम जैसे खबर लिखने वाले खुद खबर बन रहे हैं। सच लिखने पर मुकदमा और जेल सरकारी बोनस है। हमारी चिकित्सा का इतिहास पांच हजार साल पुराना है। देश में पहला अस्पताल 16वीं सदी में पुर्तगालियों ने गोवा में रॉयल हास्पिटल के नाम से बनाया था। उन्होंने बैसिन, दमन और दीव में भी अस्पताल बनाये। उनके बाद ब्रितानियों ने पहला अस्पताल मद्रास में बनाया था। यहीं से भारत में आधुनिक चिकित्सा की शुरुआत हुई। 1857 में ब्रितानी राज के सत्ता संभालने पर लोक स्वास्थ पर सोचा गया। 1897 में भारतीय स्वास्थ सेवा का शुभारंभ हुआ। स्वराज की लड़ाई जब तेज हुई, तब 1935 में ब्रितानी सरकार ने भारत के लिए हेल्थकेयर एक्ट पास किया। इसके तहत कमेटियां बनाकर स्वास्थ सेवाओं की जरूरतों पर रिपोर्ट मांगी गई। 1946 में पब्लिक हेल्थ सिस्टम बनाने के लिए सर्वे कमेटी बनी। आजादी के बाद प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सार्वजनिक स्वास्थ सेवाओं पर प्राथमिकता से काम शुरू किया। 1951 की जनगणना बताती है कि 1950 में देश में सिर्फ 50 हजार डॉक्टर और छोटे बड़े 725 अस्पताल थे। देश की कुल 18.33 फीसदी आबादी ही साक्षर थी। हमारी पिछली सरकारों के प्रयासों का नतीजा है कि 70 साल में हमारे देश की 74 फीसदी आबादी साक्षर है। 1947 में भारत की जीडीपी 2.7 लाख करोड़ रुपये थी, जो विश्व का तीन फीसदी थी। सांख्यकी मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2018 में भारत की जीडीपी 147.79 लाख करोड़ रुपये पहुंच चुकी थी, जो विश्व का 7.74 फीसदी है। भारत में अधिकृत डॉक्टरों की संख्या करीब 12 लाख 56 हजार है। सरकारी क्षेत्र के प्राथमिक स्वास्थ केंद्र से लेकर बड़े अस्पतालों, जिनमें सेना और रेलवे के अस्पताल भी शामिल हैं, कुल 32 हजार हैं। निजी क्षेत्र में 70 हजार अस्पताल हैं। देश की आजादी के 70 सालों में जो अस्पताल बने, आज वही हमारी जान बचा रहे हैं। कोविड-19 महामारी को हमारे देश की सरकार ने पहले न गंभीरता से लिया और न ही जरूरी इंतजाम किये। नतीजतन, आज विश्व में हम रोजाना बढ़ते मामलों में 4 लाख केसेज के साथ सबसे ऊपर हैं। हमारे अपने हर रोज बेड, आक्सीजन और दवाओं के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। उधर, वैक्सीनेशन के धंधे में कमाई का काम चल रहा है। अस्पतालों से लेकर सड़कों तक कालाबाजारी का हाल यह है कि परिजनों की जान बचाने के लिए लखनऊ में आक्सीजन सिलेंडर 35 से 50 हजार का मिल रहा है। सरकार ने आत्मनिर्भर बनाने के नाम पर हमें “राम” भरोसे छोड़ दिया है। एक वक्त था, जब हमारा देश संकट के समय तमाम देशों की मदद करता था। आज हम उन्हीं के आगे झोली फैलाकर मदद मांग रहे हैं। मदद देने वाले देशों में भूटान जैसे सबसे गरीब देश भी शामिल हैं। हमारी सरकार ने इस महामारी के सवा साल में न अपनी गलतियां सुधारीं और न प्राथमिकताएं तय कीं। वह आपदा में अवसर खोजते हुए ऐश ओ आराम के मेगा प्रोजेक्ट पास करती रही। सैन्य हथियार खरीदने की होड़ लग गई। सार्वजनिक स्वास्थ सेवाओं को मजबूत नहीं बनाया। किसान अपने हक के लिए पिछले छह माह से आंदोलनरत हैं मगर आपदा में अवसर देखते पूंजीपतियों के हित में कृषि कानूनों में बदलाव कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट सहित दूसरी अदालतें महामारी के डर से पिछले एक साल से न्याय को अपने घरों में कैद किये हैं। वो संविधान में मिले, नागरिक अधिकारों की संरक्षक हैं मगर उसके लिए सरकार से बोलने को तैयार नहीं। वह मेडिकल इमरजेंसी की बात करती है, लेकिन हक दिलाने में डरती हैं। सत्ता के हक में फैसले देने को तत्काल प्रकट हो जाती हैं मगर नागरिकों के लिए नहीं। दूसरी संवैधानिक संस्थायें भी अपने कर्तव्य नहीं निभातीं। वो सरकार की ढाल बनकर नागरिकों के ही सामने खड़ी हो जाती हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञों की रिपोर्ट के विपरीत हरिद्वार और मथुरा कुंभ आयोजित होता है। देश को चुनाव के नाम पर महामारी के जाल में झोंक दिया जाता है। चुनाव जीतना प्राथमिकता है, वोट देने वाला नागरिक नहीं। कोविड संक्रमण का यह बड़ा कारण बना है। देश की स्वास्थ सेवाओं और व्यवस्थाओं पर सरकार के स्तर पर कोरा झूठ बोला जा रहा है। नतीजतन, लाखों परिवारों में मातम छाया है। करोड़ों परिवार अस्पतालों के धक्के खा रहे हैं। आज करीब 40 लाख एक्टिव केसेज हैं। करीब इतने ही लोग अपनी जांच रिपोर्ट के इंतजार में हैं। हमारे देश में निजी और सरकारी अस्पतालों में सिर्फ 19 लाख बेड हैं। जम्मू कश्मीर, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा को छोड़कर बाकी किसी राज्य में सरकारी अस्पतालों की तुलना में निजी अस्पताल अधिक हैं। मरते मरीजों के कारण अंतिम संस्कार के लिए भी 10 से 20 घंटे की वेटिंग है। यहां भी आपदा में अवसर तलाशते लोग 20 हजार से 50 हजार सुविधा शुल्क लेकर अंतिम संस्कार कर रहे हैं। दवाओं से लेकर जीवनरक्षक सामान तक की कालाबाजारी हो रही है। हालात और हकीकत देखने से, यही लगता है कि जिस सरकार को हमने बड़ी उम्मीदों से चुना था, उसे नागरिकों के जीवन से कोई सरोकार नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारों के स्वास्थ बजट इसका प्रमाण हैं। राज्य और केंद्र का स्वास्थ बजट मिलाकर करीब ढाई लाख करोड़ का है। इसमें डेढ़ लाख करोड़ रुपये पेंशन, वेतन, भत्तों और अन्य खर्चे में खप जाता है। सेहत के लिए सिर्फ एक लाख करोड़ रुपये बचता है। यह सब देखकर भी हम मौन हैं। केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल के भतीजे ने प्रधानमंत्री को कड़ी चिट्ठी लिखी, तो बरेली के मृत भाजपा विधायक के पुत्र ने यूपी के सीएम को पत्र लिख हकीकत बयां की। लोग दलीय भक्ति में अपनों को मरते देख रो रहे हैं। अगर यही नया भारत है, तो निश्चित रूप से देश का भविष्य अंधकारमय है। ऐसे में हम रोएं, शर्म करें या लानत दें, मगर किसे? सरकार को, आपको या खुद को! क्योंकि यह व्यवस्था और सरकार हमने ही तो बनाई है। जय हिंद! (लेखक प्रधान संपादक हैं।) ajay.shukla@itvnetwork.comRead More

Finish the question and collapse the system! सवाल खत्म और व्यवस्था ध्वस्त!

सुप्रीम कोर्ट परिसर में 7 जनवरी 2020 को वहां के वकीलों के एक समूह ने सामूहिक रूप से संविधान की प्रस्तावना पढ़कर देश की सर्वोच्च अदालत को संविधान की याद दिलाई थी। आखिर ऐसे हालात क्यों आ गये कि अधिवक्ताओं....Read More

religion! Humanity is there, not poison! धर्म! मानवता है, जहर नहीं!

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा। बचपन के दिनों में स्कूल से लेकर घर तक, हम अल्लामा इकबाल का यह गीत मस्ती के साथ गुनगुनाते थे। राजनेता, शिक्षक और परिवार सभी यही सिखाते थे कि सबसे....Read More

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