Home विचार मंच You are above all, the law is above you: आप कितने भी ऊपर हैं, कानून आप के ऊपर है

You are above all, the law is above you: आप कितने भी ऊपर हैं, कानून आप के ऊपर है

5 second read
0
0
292

आप कितने भी ऊपर हैं, कानून आप के ऊपर है। यह एक बेहद लोकप्रिय कहावत है और हम अक्सर ठंडे कमरे में अपने अफसरों से यह सुभाषित सुनते रहते हैं और मातहतों को भी सुनाते रहते हैं। अब यह रोचक टिप्पणी पढें, ‘बदमुजन्ना बसिलसिले वजारत लखनऊ मे मुकीम है। सरेदस्त सरका मवेशी मे कमी आई है। मुश्तवा लोगों का आना जाना बदस्तूर जारी है, निगरानी की सख्त जरुरत है।’ (बदमुजन्ना – हिस्ट्रीशीटर, वजारत-मंत्री, मुकीम-निवास करता है, सरका मवेशी-पशु चोरी, मुश्तवा – संदेहास्पद)।
यह टिप्पणी, 70 के दशक में उत्तर प्रदेश के एक पुलिस थाने के एक रजिस्टर में एक हिस्ट्रीशीटर के ऊपर टिप्पणी करते हुए तत्कालीन एसओ ने लिखा था। वह हिस्ट्रीशीटर, पशु चोरी में लिप्त था, बाद में वह राजनीति में चला गया, और मंत्री बन गया। थाने के अभिलेखों में, तब अधिकतर टिप्पणियां उर्दू में ही होती थी और बाद में देवनागरी में लिखी जाने लगी। यह टिप्पणी उर्दू में तो है पर देवनागरी में लिखी गई थी। पहले तो सारी लिखावट ही उर्दू में होती थी। पुलिस अभिलेखों में, हिस्ट्रीशीट कभी भी खत्म न होने वाला रिकॉर्ड है। जब हिस्ट्रीशीटर मर जाता है और उसकी पुष्टि हो जाती है कि, वह वास्तव में जिंदा नहीं है तो उसकी हिस्ट्री शीट नष्ट कर दी जाती है।
उस एसओ के साहस और कर्तव्यनिष्ठता की तारीफ की जानी चाहिए कि उसने अपने ही थाने के एक राजनीतिक व्यक्ति, जो हिस्ट्रीशीटर है, पर बाद में मंत्री बन जाता है की गतिविधियों पर सालाना टिप्पणी करते हुए अपनी राय बेबाकी से लिखा है। पुलिस में अब भी ऐसे लोग हैं। पर कहीं खोए हुए। उन्हें उभारा जाना चाहिए।
‘जिन चिरागों को हवाओं का कोई खौफ नहीं, उन चिरागों को हवाओं से बचाया जाए’ !!
केरल हाईकोर्ट ने पुलिस और सरकार के सामंजस्य पर एक अलग तरह की टिप्पणी की है जो आज के राजनीतिक संस्कृति में जब पुलिस, सुरक्षा बल और सेना को राजनीतिक जमात अपने नेता की सेना, पुलिस कहकर सम्बोधित करती है तो उसे पढ़ा जाना चाहिए।
केरल के एक डीजीपी श्रीकुमार ने जब, सरकार बदलने पर हुए अपने तबादले के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया तो सरकार ने उनके तबादले को यह कहकर के उचित ठहराने की कोशिश की, कि नई सरकार, नई नीतियां लागू करेगी तो उसे अपने दृष्टिकोण से डीजीपी और मुख्य सचिव बदलने का अधिकार है। यह तबादला उसी क्रम में है। अदालत ने मुख्य सचिव और डीजीपी की भूमिका को अलग-अलग तरह से परिभाषित किया है। अदालत के अनुसार, पुलिस का काम और दायित्व कानून व्यवस्था और अपराध नियंत्रण, अन्वेषण आदि है। इन सब दायित्व का निर्वहन करने के लिए उसे आपराधिक कानूनों, आईपीसी, सीआरपीसी, साक्ष्य अधिनियम, और समय-समय पर संसद और विधानसभा द्वारा पारित कानूनों द्वारा अधिकार और शक्तियां दी जाती है।
सरकार का पुलिस पर प्रशासनिक नियंत्रण तो है, पर किसी कानून को लागू करने के लिए सरकार दिन प्रतिदिन ऐसा कोई निर्देश नहीं दे सकती जो विधायिका द्वारा पारित कानूनों के विपरीत हो। पुलिस सरकार के अधीन तो है पर अपने दायित्वों के निर्वहन में वह कानून को कानूनी तरह से ही लागू करने के लिए बाध्य है। अक्सर सत्तारूढ़ दल के छुटभैये नेता इस गलतफहमी के शिकार होते हैं कि सरकार उनकी तो थाना भी उनका हो गया। हम पुलिसजन भी कोई अनावश्यक विवाद न हो व्यवहारिक राह अपनाते हुए ऐसे छुटभैये नेताओं को तरजीह दे भी देते हैं। पर राजनीतिक जमात को यह बात समझनी चाहिए कि पुलिस अपने दायित्वों के निर्वहन में कानून के प्रति प्रतिबद्ध और शपथबद्ध है न कि किसी खास राजनीतिक दल जो जब सत्तारूढ़ हो उसके प्रति।
एक ऐसे समय में जब धर्म राजनीति की धुरी बन बैठा है यह मसनवी राहते-रूह है। मसनवी में मिर्जा गालिब ने बनारस कयाम के दौरान अपने दिली जज्बात को काव्य रूप में अभिव्यक्ति दी है। वह लगभग दो महीनों तक बनारस में रहे थे। उस दौरान वह बीमार चल रहे थे। चूंकि वह सफर में थे इसलिए ठहर-ठहर कर अपने सफर को जारी रखे हुए थे। पांच महीने लखनऊ प्रवास और छ: महीने बांदा प्रवास के बाद उन्होंने बनारस का रुख किया था। बनारस पहुंचकर उनकी तबीयत सम्भल गई। बीमारी से निजात पा कर वह बेहद खुश हुए। उनकी खुशी का अंदाजा उनके अशआरों से लगाया जा सकता है। दिल्ली में अपने दोस्तों को खैरियत का खत लिखते हुए वह कहते हैं-‘लोग कहते हैं वह जा पहुंचा बनारस जिंदा। हमको उस घास के तिनके से ये उम्मीद न थी’।
बनारस पर उनके लिखे गए अशआरों में जो गौरतलब बात है वह यह कि गालिब ने बनारस में शव या मौत को दर्ज करने के बजाए वहां की आबोहवा में रवां जिंदगी को तरजीह दी है। मणिकर्णिका मसनवी के परिदृश्य से गायब है। गालिब बनारस की रूहानी और रूमानी फजाओं से इतने अधिक प्रभावित थे कि उन्होंने अपने दोस्त मौलवी मोहम्मद अली खान को यह बात खत में भी लिखी कि, ‘बनारस आने, शहर देखने और कुछ समय यहां रहने के बाद इस मुकाम से उनकी अजनबियत खत्म हो गई है।
इस बुतखाने में बजाए जाने वाले शंखों की आवाजें सुनकर वे खुशी महसूस करते हैं। बनारस ने उनका दिल मोह लिया है। अब उन्हें दिल्ली की याद भी नहीं आती।’ गालिब वह मुकाम हासिल कर चुके हैं एक आम पाठक का उनके लिखे का विश्लेषण आफताब को चिराग दिखाना होगा। फिर भी अपने अशआरों में वह उस मुकाम पर खड़े दिखते हैं जहां विभिन्न धर्म और उनसे जुड़ी आस्थाएं एक दूसरे से घुलमिल जाती हैं।
विजय शंकर सिंह
(लेखक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी हैं)

Load More Related Articles
Load More By VijayShanker Singh
Load More In विचार मंच

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

Need for professional approach to improve the economy: अर्थव्यवस्था के सुधार को प्रोफेशनल दृष्टिकोण की आवश्यकता

जैसे जैसे समय बीतता जा रहा है वैसे वैसे देश की आर्थिक स्थिति गंभीर होती जा रही है। रिजर्व …