Home संपादकीय When will you understand that terror does not have any particular religion?:कब समझेंगे कि आतंक का कोई खास धर्म नहीं होता

When will you understand that terror does not have any particular religion?:कब समझेंगे कि आतंक का कोई खास धर्म नहीं होता

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न्यूजीलैंड में हुई घटना ने एक बात तो स्पष्ट कर दी है कि आतंक हर धर्म, हर मजहब और हर देश में है। पर फिर भी विभिन्न देशों में इसको लेकर अलग-अलग मत है। याद करिए जब अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ था तो पूरे विश्व में क्या संदेश गया था। हर देश इसकी निंदा कर रहा था। आतंकवाद के खिलाफ सभी देशों ने एकजुटता की कसमें खाई थी। हर वो कदम उठाने की प्रतिबद्धता दोहराई गई थी जिससे आतंक से निपटा जा सके। पर हुआ क्या? क्या आतंक के मुद्दे पर सभी देशों ने वह रवैया अपनाया जो अपनाने की जरूरत थी। मंथन करने की जरूरत है।
आज भी आतंक के मुद्दे सभी देशों के लिए अलग-अलग ही है। पूरे विश्व को पता है कि पाकिस्तान में बैठा आतंकी सरगना अजहर मसूद सभी कौम के लिए खतरा है। पर सिर्फ पाकिस्तान और चीन इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता है। यह दोनों देश इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि अजहर मसूद एक आतंकवादी है और इस पर अंतरराष्टÑीय प्रतिबंध लगाया जाना जरूरी है। उधर जब चीन और पाकिस्तान से हजारों मील दूर न्यूजीलैंड में एक आतंकवादी इतने गहरे जख्म दे जाता है तब प्रधानमंत्री इमरान को इस्लामोफोबिया की याद आ जाती है। जब पुलवामा हमले में भारत के चालीस जवान शहीद हो जाते हैं तब इमरान खान को इस्लामोफोबिया की याद नहीं आती है। मंथन का वक्त है कि क्यों हम आतंक के खिलाफ दोहरे मापदंडों को अपना रहे हैं।
न्यूजीलैंड के दिल पर इतने गहरे जख्म दे गया शख्स किस विचारधारा से प्रभावित था या फिर उसकी असली मंशा क्या थी इस पर लंबे समय तक बहस चलती रहेगी। पर यह बात आसानी से समझा जा सकता है कि आखिर क्यों उसने मस्जिद जैसी पवित्र जगह को ही अपने गंदे मंसूबे के लिए चुना। क्यों उसने बेहद निर्दयता के साथ अंधाधुन गोलियां बरसाकर 49 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। उस हत्यारे के बारे में तमाम खबरें सामने आई हैं। बताया जा रहा है कि उसने पाकिस्तान सहित कई अन्य इस्लामिक देशों की यात्रा भी की थी। अपने ब्लॉग में उसने इन देशों की तारीफ भी की थी। पर साथ ही कुछ कड़वे अनुभवों का भी जिक्र किया था। वह कड़वे अनुभव क्या थे यह अभी राज ही है। पर इतना स्पष्ट है कि इस हत्यारे का मुख्य टारगेट एक समुदाय विशेष ही था।
उस शख्स ने इस तरह के हमले के बारे में पहले ही आगाह कर दिया था। यहां तक कि एक दिन पहले अपनी फेसबुक पोस्ट में इस बात का खुला एलान भी कर दिया था। उसने खुद लिखा है कि पिछले दो-तीन महीने से इस तरह की प्लानिंग कर रहा था। ऐसे में इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि उसका मुख्य निशाना बांग्लादेश की अंतरराष्टÑीय क्रिकेट टीम ही थी। जो व्यक्ति दो से तीन महीने से प्लानिंग कर रहा था। उस व्यक्ति को कैसे नहीं पता होगा कि बांग्लादेश की टीम शुक्रवार को स्टेडियम के नजदीक के मस्जिद में जुमे की नमाज पढ़ने आएगी। उसने इस वारदात को अंजाम देने के लिए पूरी प्लानिंग की। हथियार एकत्र किए। रोड मैप तैयार किया होगा।
बताया जा रहा है कि बांगलादेश टीम के कप्तान के प्रेस कॉन्फें्रस के कारण टीम करीब नौ मिनट देरी से रवाना हुई। अगर तय समय पर टीम रवाना हो गई होती तो निश्चित तौर पर सारे खिलाड़ी उसी मस्जिद में मौजूद होते जहां सबसे अधिक लोग मारे गए हैं। बांगलादेश टीम की एक वीडियो वायरल है जिसमें देखा जा सकता है कि कैसे टीम दहशत में है। टीम को तत्काल अपने देश वापस बुला लिया गया है। न्यूजीलैंड के साथ सभी मुकाबले रद कर दिए गए हैं। यहां तक की न्यूजीलैंड में हाई अलर्ट जारी करते हुए मुस्लिम समुदाय के लोगों को घरों से बाहर निकलने से भी मना कर दिया गया है।
न्यूजीलैंड का इतिहास महज सात सौ साल पुराना है। इसे बेहद शांत देशों में रखा जाता है। हालांकि यहां माफियाओं का भी राज है, बावजूद इसके यहां क्राइम ग्राफ इतना कम है कि इसे शांत देश माना जाता है। यहां करीब 70 गैंग हैं जिनमें 4000 लोग हैं और ये भी सिर्फ 44 लाख की आबादी में। पर क्राइम रेट सबसे कम है। एक और सच्चाई यह है कि इस देश में हत्या का आंकड़ा भी सबसे कम स्तर पर है। जबकि दूसरी तरह बंदूकों के मामले में यह आंकड़ा सबसे अधिक है। यहां बंदूकों या हथियारों के लिए नियम बेहद आसान हैं और 44 लाख की आबादी में 12 लाख लाइसेंसी बंदूक लोगों के पास हैं। इस हिसाब से न्यूजीलैंड में जुर्म सबसे ज्यादा होना चाहिए था। पर सच्चाई इसके उलट है।
न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट बताती है कि यहां साल में 35 हत्याओं से ज्यादा का आंकड़ा कभी नहीं रहा। 2017 में सबसे अधिक 35 हत्याएं हुई थीं। 2009 में यह आंकड़ा सिर्फ 11 था। पर 15 मार्च की घटना ने न्यूजीलैंड को इतना गहरा जख्म दिया है जो सालों तक सालता रहेगा। फिर ऐसा क्या हुआ कि एक शख्स एक खास समुदाय को निशाना बनाने पर उतारू हो जाता है। न्यूजीलैंड में मुस्लिम जनसंख्या एक प्रतिशत से भी कम है। ये प्रवासी भी न्यूजीलैंड के सुदूर इलाकों में बसे हुए हैं। ऐसे में कोई व्यक्ति इनका दुश्मन कैसे हो सकता है। क्या सोंचकर उसने इस समुदाय को सीधा निशाना बनाया। क्या वह शख्स बांग्लादेशी क्रिकेटर्स को खत्म कर पूरे विश्व को एक बड़ा संदेश देना चाह रहा था। सवाल तमाम हैं जिसका जवाब लंबे समय बाद ही मिलेगा।
पर मंथन का वक्त है आखिर ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई है। क्या सिर्फ इस्लामोफोबिया का नाम लेकर उन सच्चाईयों से मुंह मोड़ा जा सकता है जिस सच्चाई की आग में इस वक्त पूरा विश्व झुलस रहा है। क्यों नहीं हम सच्चाई को स्वीकार कर रहे हैं कि आतंकवाद को कई धर्म या मजहब नहीं है। क्यों नहीं चीन इस बात स्वीकार कर रहा है कि किसी आतंकी को बचाना मानव सभ्यता के साथ धोखा है। आज चीन को खुद को सुरक्षित समझ रहा है। पर क्या जब इसी चीन को आतंकवादियों द्वारा निशाना बनाया जाएगा तब वह इस बात को समझेगा कि आतंक किसी का सगा नहीं होता है। चाहे वह किसी भी विचारधारा से प्रभावित क्यों न हो। आज हम इस्लामोफोबिया पर बात कर रहे हैं हो सकता है कल कोई नई शब्दावली इसमें जुड़ जाए। संभलने और समझने का वक्त है।

कुणाल वर्मा

kunal@aajsamaaj.com
(लेखक आज समाज के संपादक हैं)

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