Home विचार मंच Time has passed…गुजरा हुआ जमाना

Time has passed…गुजरा हुआ जमाना

26 second read
0
0
193

चंद्रा की गेंद आई, बाकुस ने बल्ला घुमाया, पीछे गिल्लियां गिर गई। वो रेडियो कमेंटेरी वाला क्रिकेट था। सुनकर कल्पना करना और खेल के उतार-चढ़ाव के साथ हिचकोले खाना आज के सझे-धजे टेलीकास्ट को देखें तो लगता है कि वो कुछ और ही था। शादी में उन दिनों दहेज में एचएमटी जनता की घड़ी, फिलिप्स या बुश का रेडियो, हर्क्युलस या ऐट्लस की साइकिल और कुछ हजार रुपए मिला करते थे। हाई-स्कूल पहुंचते-पहुंचते लड़कियों के हाथ पीले करने और लड़कों को घोड़ी चढ़ाने की जल्दी होती थी। लड़के वाले इस फिराक में रहते थे कि जल्दी से भुना लिया जाय, लाड़ले से कुछ खास उखड़ना तो है नहीं। जाल बिछाना शुरू कर देते। अचानक किसी दिन से लड़के के नाम के आगे जी लगाकर बात करना शुरू कर देते। ये उसके होनहार होने और बड़े आदमी बनने की सम्भावना की और इशारा होता था।
जिसके साथ ऐसी कोई गुंजाइश नहीं थी, उसके कुल-खानदान, जमीन-जायदाद की दुहाई दी जाने लगती। लड़की वाले भी अक्सर फंस ही जाते। अभी सस्ते में हाथ लग रहा है। कल को सचमुच में कहीं का कहीं पहुंच गया तो पकड़ से दूर हो जाएगा। दान-दहेज की मात्रा बिचौलिये की निष्ठा और व्यवहारकुशलता पर निर्भर करता था। शादी में सारा गांव इकट्ठा हो जाता। कुछ दिनों के सब-कुछ थम जाता। स्कूल दो-चार दिनों के लिए बारात-घर बन जाता। शादी के निमंत्रण पत्र की एक विशिष्ट भाषा शैली होती थी। अभी भी है। भेज रहा हूं नेह-निमंत्रण, प्रियवर तुझे बुलाने को, हे मानस के राजहंस, तुम भूल न जाना आने को! अवसर का बखान कुछ इस तरह से होता ‘दो सुमन खिले, दो हृदय मिले दो सपनों ने श्रृंगार किया, दो दूर देश के पथिकों ने संग-संग चलना स्वीकार किया।’
लड़के के शादी का पहला साल राजकुमारों जैसा कटता था। हल्दी का ऊबटन, नाखून की पालिश, ईत्र की महक, आंखों का काजल, पैरों में आलते का रंग इन्हें उतरने में महीनों लग जाते। जो सांवले होते थे गोरे होने के चक्कर में फेयर एंड लवली लगाने लग जाते। शादी तो हो जाती लेकिन लड़की के विदा होते-होते एक से तीन साल लग जाते। लड़का दशहरे में ससुराल जाता तो दिवाली के बाद लौटता। फुर्सत से तर-माल उड़ाता। घर लौटते-लौटते पांच-दस किलो मोटा हो चुका होता। मुश्किल से पहचान में आता। वैसे, साल दो-साल में लाली उतर जाती। लड़का खेती-बाड़ी में रम जाता और लड़की चूल्हे-चौके में।
दहेज में ताजे-ताजे पाए रेडियो वालों का क्रिकेट के दिनों में अपना ही रुआब होता। रेडियो के ऊपर चमड़े का कवर और उसके ऊपर सफेद कपड़े का लिहाफ होता, वो इसे किसी को छूने तक नहीं देता। स्पीकर के सामने छोटे-छोटे छेद होते। एंटेने की मूठ बाहर निकली होती। वॉल्यूम और मीटर का घुमाने वाले बटन को घूंघट देना सम्भव नहीं था। उन दिनों एफएम तो होता नहीं था। बारिश के दिनों में मीडियम वेव में आवाज कड़कड़ाती रहती। शॉर्ट-वेव में ये कभी ऊंची, कभी नीची तो कभी गायब हो जाती। श्रीलंका ब्रॉड्कैस्टिंग कॉरपरेशन से अमीन सयानी का बिनाका गीत माला बुधवार की शाम में जान भर देता। नाजिया हसन का आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए रे तो बात बन जाए काफी दिन पहले पायदान पर बजा। धुन और आवाज कुछ ऐसी थी कि गाने के बोल बाप बन जाए सुनाई पड़ता था। आश्चर्य होता कि ऐसा क्यों कह रही है। बीबीसी रेडियो के कहे को ब्रह्मवाक्य माना जाता। सच्चाई की शत-प्रतिशत गैरंटी। जब भी कोई सनसनीखेज घटना घटती तो लोग कहते बीबीसी लगाओ। इंदिरा गांधी की मौत की खबर भी पक्की तभी मानी गई जब बीबीसी ने बात पर मुहर लगा दी।
जब क्रिकेट मैच होता तो लोग जाति-पाती, ऊंच-नीच भूल रेडियो के इर्द-गिर्द जम जाते। कमेंट्री पंद्रह मिनट अंग्रेजी में और पंद्रह मिनट हिंदी में चलती। अनंत सेतलवाड अंग्रेजी और सुशील दोषी और जसदेव सिंह हिंदी में अपनी विशिष्ट शैली में मैच का बखान करते। लोग बड़ी मुश्किल से अंग्रेजी को झेलते। बेसब्री से हिंदी की बारी का इंतजार करते। कोई विकेट गिरा तो उछल पड़ते। कोई शतक लगा तो अगले मैच तक उसका जिक्र करते। जिम्मेवार लोग इसे समय की बबार्दी बताते लेकिन तसल्ली करते कि चलो ताश-शतरंज से तो बचा हुआ है।
सड़कें तो थी लेकिन गाड़ी इक्का-दुक्का ही चलती थी। घोड़े के टमटम में सवारियां ढोई जाती। दुर्गा और सरस्वती पूजा में चंदा इकट्ठा करने वाले सक्रिय हो जाते। उनके लिए ये अपना हाथ दिखाने का समय होता। ज्यादा उत्साही तो सड़क पर नाका लगाकर आने-जाने वाले की पर्ची काटना शुरू कर देते। ना-नुकर करने वाले से जोर-जबरदस्ती पर भी उतर आते। इस अवसर पर चम्बल के डाकुओं पर नाटक खेला जाता। उन्हें अमीरों को लूटकर गरीबों में बांटने वाला रॉबिन हुड समझा जाता। अपनी जाति का रक्षक माना जाता। जातियों में बंटे समाज में ऐसे चरित्र प्रेरणा का काम करते। पाकिस्तान से अदावत की तो तब सोचते जब बगलगीरों से महफूज होते। झगड़े की स्थिति में पिटने के लिए कुछ खास करने की जरूरत नहीं थी। बस किसी जाति का होना काफी था। नाटक खेला जाता तो अभिनय करने वाले मूल प्रवृति और शोहरत के हिसाब से अपनी भूमिका चुनते।
सब-कुछ बड़ा जीवंत लगता। लोग पुलिस-मुकदमे से डरते थे। लड़ाई-झगड़े में लाठी का ही इस्तेमाल करते। दो-चार जो गांव को छोड़ शहर जा बसते, उनका अलग ही टोर होता। साल में एकबार छठ पूजा में गांव आते। साफ-धुले कपड़े में दूर से पहचाने जाते। खड़ी हिंदी में बात करते। लोगों को देहाती समझ कटे-कटे ही रहते। जो भी था, लोग जी लेते थे। आजकल की तरह शहर के इर्द-गिर्द झोपड़-पट्टी बसाने की हद तक की मजबूरी नहीं थी। जिंदगी में पिछड़ जाने की आज की सर्वव्यापी कुंठा नहीं थी।
(लेखक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं।)

Load More Related Articles
  • Where has customer gone? कहां गए कस्टमर?

    अखबारों का रंग आजकल कुछ बदला-बदला सा है। विशेष कर अंग्रेजी भाषियों का। देश-विदेश के आर्थिक…
  • Dil Jo kahe: दिल जो कहे

    क्या करना ठीक है और क्या नहीं इस बात पर बहस होती ही रहती है। वाद-प्रतिवाद होता रहता है। लो…
  • ‘Base’less Social media: ‘आधार’हीन सोशल मीडिया

    इसमें कोई दो राय नहीं है कि सोशल मीडिया की समस्या गंभीर है। लोग तो आमने-सामने भिड़ जाते हैं…
Load More By OmPrakash Singh
Load More In विचार मंच

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

Where has customer gone? कहां गए कस्टमर?

अखबारों का रंग आजकल कुछ बदला-बदला सा है। विशेष कर अंग्रेजी भाषियों का। देश-विदेश के आर्थिक…