Home संपादकीय पल्स Think! Which history are you making?: सोचिये! कौन सा इतिहास रच रहे हैं आप..

Think! Which history are you making?: सोचिये! कौन सा इतिहास रच रहे हैं आप..

5 second read
0
0
364

17वीं लोकसभा के पहले सत्र में जनता के तमाम नुमाइंदों ने अपनी बातें रखीं। जिन सदस्यों ने ऐतिहासिक शब्दों के साथ शुरूआत की, उनमें पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर से पहली बार सांसद बनीं टीएमसी की महुआ मोइत्रा रहीं। वह जब बोलीं तो सत्तापक्ष नि:शब्द हो गया। उन्होंने सदन में कहा कि राष्ट्रवाद का ढोंग नहीं बल्कि उसके लिए वास्तव में काम करने की जरूरत है। देश डर के साये में है और नागरिक होने की परिभाषा बदल दी गई है। बुद्धजीवियों और कलाकारों को बोलने और सवाल उठाने पर राष्ट्रद्रोही साबित किया जाता है। उन्होंने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता और राहत इंदौरी का एक शेर सुनाकर आगाह किया कि देश को हम सब ने मिलकर बनाया है। यह देश किसी के बाप का नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव धनबल का गुलाम बना दिया गया, जो लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। लोकतंत्र की खूबी के कारण सत्ता पाने वाले ही लोकतंत्र के हत्यारे बन रहे हैं, यह स्वीकार्य नहीं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग हमें विश्व में र्शमिंदा करने वाला इतिहास रच रहे हैं।
हमेशा विवादों में रहने वाले सपा सांसद मोहम्मद आजम खां पहली बार लोकसभा पहुंचे हैं, उन्होंने अपने संबोधन में सदन को याद दिलाया कि 1901 में जब पहला आजादी का क्रांतिकारी आंदोलन तहरीक-ए-रेशमी रुमाल मौलाना शेखुल हिंद ने दारुल देवबंद (सहारानपुर) ने शुरू किया था, तो उसमें लाखों मुसलमानों ने आहुति दी थी। जब देश का बंटवारा हुआ तब हिंदुओं को तो नहीं मगर मुसलमानों को पाकिस्तान में बसने का मौका था, मगर जो नहीं गए, उन्हें हिंदुस्तान से मोहब्बत थी। अब उनको ही मारा और दबाया जा रहा है। लोकतंत्र के पर्व पर सरकार के पैसे से सरकार की जमीन पर बने उर्दू गेट को तोड़ा जा रहा है जबकि उर्दू मुसलमानों की नहीं हिंदुस्तान की भाषा है। राज्यसभा में कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद ने उस घटना का जिक्र किया, जो राष्ट्रपिता महत्मा गांधी को लांछित करने वाली भाषा बोलकर सांसद बनी प्रज्ञा ठाकुर को लेकर था। उन्होंने बताया कि किस तरह 1952 में जब एक चुनावी रैली को संबोधित करने गए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को किसी ने बताया कि जिसे टिकट दिया गया है, उसका आचरण और भाषा ठीक नहीं है, तो उन्होंने मंच से ही एलान कर दिया कि लोग एक चरित्रवान निर्दलीय को वोट दें न कि कांग्रेस प्रत्याशी को। हमारा चयन गलत हो गया है। जब कांग्रेस में सिर्फ चार महासचिव होते थे, उस वक्त एक महासचिव ने एक संप्रदाय के बारे में टिप्पणी की तो राजीव गांधी ने उन्हें पार्टी से यह कहते हुए बाहर कर दिया था कि हम सिद्धांतों से समझौता नहीं करते। प्रज्ञा ठाकुर और उनके जैसे तमाम नेताओं ने घिनौने शब्दों का इस्तेमाल किया मगर मोदी ने ऐसा कोई आदर्श प्रस्तुत क्यों नहीं किया?
भारी जनमत के साथ लोकसभा में दोबारा पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उम्मीद की जाती है कि वह अपने काम पर बात करेंगे। सुशासन स्थापित करने के लिए कैसे सभी दलों के साथ मिलकर काम करेंगे, मगर तब दुख हुआ, जब उन्होंने सदन में भी उसी सियासत को दोहराया जो चुनावी सभाओं में होती थी। शायद नेहरू और इंदिरा गांधी के भूत से उन्हें डर लगता है। उन्होंने नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक के कार्यकाल को घेरा। उन्होंने राज्यसभा में सदन की परंपराओं के पालन से चलने (अपने मुताबिक न चलने) पर दुख जताया। विडंबना यही है कि मोदी और उनके सांसद पांच साल की सरकार चलाने के बाद भी अपने काम पर चर्चा के बजाय नेहरू और इंदिरा के खौफ में जी रहे हैं। पिछले पांच सालों में जो खौफ भगवाधारियों ने देश में उत्पन्न किया है, उसके कारण अमेरिका (स्वंभू विश्व का थानेदार) ने अपनी रिपोर्ट में भारत को और दागदार बना दिया। जरूरत यह थी कि प्रधानमंत्री संविधान और कानून को सर्वोपरि मानते हुए सख्त कदम उठाने की बात करते। वह चुनावी मोड में ही बोलने में लगे रहे। उनके भाषण में धन्यवाद से अधिक कमजोर विपक्ष को घेरने और कांग्रेस के उठ खड़े होने का खौफ दिखाई दिया। गृह मंत्री अमित शाह ने कश्मीर यात्रा से लौटने के बाद संसद में पंडित जवाहर लाल नेहरू को कश्मीर समस्या के लिए दोषी बताने में देरी नहीं की जबकि सत्य यह है कि कश्मीर अगर भारत के साथ है तो वह सिर्फ नेहरू के कारण।
निश्चित रूप से हम नरेंद्र मोदी सरकार को 2014 में नए भारत के निर्माण के लिए लेकर आए थे। हमें लगा, सिर्फ पांच साल में वह सुशासित भारत नहीं बना सकते तो उनको दोबारा मौका दिया। इस बार उनका बहुमत बढ़ा और उच्च सदन में सदस्यों की संख्या भी। नए भारत में लोग उम्मीद करते हैं कि इतिहास की पुरानी गलतियों का दोहराव न हो। नई योजनाओं के जरिए देश को दिशा दी जाए। दुख तब होता है, जब इतिहास के पन्नों को फाड़ने या बदलने की बात होती है। सच यह है कि इतिहास किसी के बदलने से नहीं बदलता बल्कि उससे बेहतर वर्तमान और भविष्य बनाने से बदलता है। वंदे मातरम बोलने से कोई राष्ट्रभक्त नहीं हो जाता और न बोलने से कोई राष्ट्रद्रोही नहीं। राष्ट्रवाद, अपनी सोच दूसरे पर थोपना नहीं बल्कि लोगों के साथ मिलकर देश को हर क्षेत्र में आगे ले जाना होता है। जरूरत है कि हम सही दिशा में कदम बढ़ाएं जो हमारे युवाओं को ज्ञानवान शिक्षा, हमारी संस्कृति-संस्कारों से युक्त करे। उन्हें रोजगार के सुयोग्य अवसर उपलब्ध कराएं, जिससे वे राष्ट्र के निर्माण में भूमिका अदा करें। जब ऐसा होगा तभी नया भारत बनेगा, सिर्फ कहने से नया भारत नहीं बन सकता।
इस वक्त देश में भ्रष्टाचार चरम पर है। पिछली सरकारों के वक्त में भी था। कुछ साल पहले तक जिस काम के लिए सरकारी मुलाजिम 100 रुपए रिश्वत लेता था, उस काम के नए भारत में 500 रुपए लेता है। अब एक हजार का तो नोट ही नहीं है, तो सीधे दो हजार लेता है। हमें याद आता है कि कभी किसी छोटी दुकान से कुछ खरीदते थे और एक हजार का नोट देते, तो दुकानदार कहता था कि मजाक मत करिये, छोटा नोट दीजिए। आज वह दो हजार का नोट देखकर अचंभित नहीं होता। साफ है कि महंगाई सिर चढ़कर बोल रही है। बेरोजगारी चरम पर है। शिक्षा की दुकानों से मिलने वाली डिग्रियां लेकर ज्ञानहीन युवा धक्के खाते घूम रहे हैं। जय श्रीराम का नारा लगवाने के लिए कई राज्यों में दूसरे धर्म के लोगों को पीटा जा रहा है। हालात तो ये हैं कि कहीं भाजपा सांसद जूते चला रहे हैं, तो कहीं विधायक राजकीय कर्मचारियों को पीट और धमका रहे हैं। कई जगह उनके रिश्तेदारों की गुंडई कायम है। सरेआम हत्याएं हो रही हैं। बच्चियां तक कलुषित मानसिकता का शिकार हो रही हैं। उनकी आबरू कहीं सुरक्षित नहीं है। सत्ता उन्हें रोकने के बजाय अपने मनमुआफिक परिभाषित कर रही है। जनप्रतिनिधि जनता के साथ सही बर्ताव नहीं कर रहे। विपक्ष अभी हार के सदमें से बाहर नहीं निकल पाया है। मीडिया रीढ़विहीन बन गया है। न्यू इंडिया की यह तस्वीर भयावह है।
नए भारत में अगर इसी तरह की घटनाएं होनी हैं, तो हमें ऐसे भारत की जरूरत नहीं है। जो देश के नागरिकों की हत्याएं करवाए या उन्हें अपमानित करवाएं ऐसे वंदेमातरम या जय श्रीराम के उद्घोष हमें नहीं चाहिए। हमें तो देश को समर्पित लोग चाहिए, जो मानवता पर यकीन करते हों। जो अपने कर्तव्यों की पूर्ति करके समाज और देश को आगे बढ़ाने में मददगार हों। हमें वह सरकार चाहिए जो बगैर किसी भेदभाव के सभी के हित को देखती हो न कि तुष्टीकरण और सत्ता के लिए दूसरों की हत्याएं कराने पर यकीन करती हो। सिद्धांतों-नैतिकता की तितांजलि देकर सत्ता हासिल करने वालों की नहीं बल्कि त्याग करने वालों की देश को जरूरत है। यह देश ऋषि दधीच और भारद्वाज का देश है। जो त्याग और ज्ञान के जरिए विश्व गुरु बना था, न कि किसी की हत्या करके। अभी वक्त है, संभल जाइए। प्रचार तंत्र से खुद को खुदा बनाने की कोशिश करने के बजाय वास्तविकता में मानवता, ज्ञान और सर्वजनहिताय पर काम कीजिए, तभी नए भारत का निर्माण संभव है।
जयहिंद!

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं )

Ajay.shukla@itvnetwork.com

Load More Related Articles
Load More By Ajay Shukla
Load More In पल्स

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

“No one can say that we have sold conscience!” “कोई यह न कह सके कि हमने जमीर बेच दिया!”

पिछले साल जनवरी के दूसरे सप्ताह देश की सर्वोच्च अदालत के चार न्यायमूर्तियों ने इतिहास में …