Home देश तीसरा मोर्चा कभी नहीं रहा सफल , इस बार भी असफल होगा

तीसरा मोर्चा कभी नहीं रहा सफल , इस बार भी असफल होगा

यूपी और बिहार की तीन लोकसभा सीटों पर मिली विपक्षी पार्टियों की जीत से एक बार फिर तीसरे मोर्चे के गठन की सुगबुगाहट तेज हो गई है। ऐसा इसलिए क्योंकि क्या वाकई कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा जोड़कर तीसरे मोर्चे की तैयारी में जुटा विपक्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार के सामने कोई बड़ा मोर्चा खड़ा कर पाएगा? इसी के साथ एक सवाल यह भी है कि कांग्रेस की इसमें कोई भूमिका रहेगी भी या नहीं। यह सवाल इसलिए भी कि तीसरे मोर्चे के गठन के लिए तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की कोलकाता में ममता बनर्जी के साथ मुलाकात का संकेत है कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के लिए एकजुट होना कितना मुश्किल होने जा रहा है।

विपक्षी गठबंधन के धरातल पर आने से पहले इसके ढांचे को लेकर मतभेद सबके सामने है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री राव एक गैर भाजपाई और गैर कांग्रेसी दलों का गठजोड़ चाहते हैं, जबकि ममता बनर्जी ने कांग्रेस सहित अन्य दलों से तालमेल के विकल्पों को खुला रखा है। लेकिन अगर तीसरा मोर्चा बनता है तो क्या वह मजबूत और स्थिर विकल्प बन पाएगा? इसी के साथ यह सवाल भी मौजूं है कि इसका नेतृत्व कौन करेगा? नेताओं का व्यक्तिगत अहंकार भी एक समस्या है, इनमें से कोई भी नेता दूसरे नेता के नेतृत्व को स्वीकारने में सहज नहीं है। इन दलों में से प्रायः हरेक दल का नेता खुद को प्रधानमंत्री मटेरियल से कम नहीं मानता है। ऐसे में इन दलों को एक मंच पर लाना और एकजुट रखना कछुआ तौलने के बराबर है। मौजूदा समय में गैर भाजपाई धड़े में ऐसा कौन सा नेता है, जिसे चुनौती नहीं मिलेगी? निःसंदेह कई नेता अपने प्रांतों में प्रभावशाली हैं, मगर इनमें से कोई भी प्रधानमंत्री मोदी की छवि की बराबरी कर सकता है क्या?

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