Home संपादकीय The question of fairness of the Election Commission: चुनाव आयोग की निष्पक्षता का सवाल

The question of fairness of the Election Commission: चुनाव आयोग की निष्पक्षता का सवाल

2 second read
0
0
122

सीबीआई, न्यायालय, सीवीसी, आदि संवैधानिक संस्थाओं की अंदरूनी लड़ाई सड़क पर आने के बाद अब बारी चुनाव आयोग की है। शायद यह पहली बार है कि चुनाव आयोग जैसी संस्था का विवाद मीडिया के जरिए आम लोगों के बीच चर्चा बटोर रहा है। चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की चिट्ठी ने एक ऐसा सियासी तूफान खड़ा कर दिया है जिसकी वेग अधिक है। वेग भी अधिक इसलिए है क्योंकि चुनाव का अंतिम चरण अपने चरम पर है। ऐसे में मंथन जरूरी है कि क्या यह चुनाव भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक अलग चुनाव होने जा रहा है, जहां आयोग के अंदर ही अधिकारी किसी मुद्दे पर एक मत नहीं हैं।
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। पर यह पहला चुनाव जब चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर इतनी विस्तृत चर्चा हो रही है। 2014 में मोदी सरकार आने के बाद चुनाव आयोग पर चर्चा अधिक हो रही है। सबसे अधिक बातें ईवीएम को लेकर हुर्इं। तमाम विपक्षी पार्टियों ने सवाल उठाया कि ईवीएम की विश्वसनियता खतरे में है। तमाम तर्कों के आधार पर चुनाव आयोग ने सभी आपत्तियों को खारिज किया। चुनाव आयोग ने विश्वास दिलाया कि हर एक कदम पर आयोग सतर्कता बरत रहा है जिससे ईवीएम पर सवाल पैदा करना बेमानी है। यह सही भी है। क्योंकि जिस तरह कई यूरोपियन देशों ने भारतीय निर्वाचन आयोग से ईवीएम के सफल संचालन के लिए कई बार राय ली है उसने भारतीय ईवीएम प्रणाली को और अधिक विश्वसनिय ही बनाया है। तमाम पूर्व चुनाव आयुक्तों ने भी ईवीएम को सबसे सुरक्षित और विश्वसनिय जरीया बताया है। ऐसे में ईवीएम पर बातें बनाना और करना बेकार है।
पर अब नया सवाल चुनाव आयोग की अंदरूनी लड़ाई को लेकर पैदा हो गया है। चुनाव आयुक्त अशोक लवासा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को आचार संहिता उल्लंघन के मामलों में चुनाव आयोग की तरफ से मिले क्लीन चिट को लेकर खासे नाराज बताए जा रहे हैं। इस मसले पर उन्होंने अपनी असहमति जताई है। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो उन्होंने 4 मई से चुनाव आयोग की बैठकों में जाना तक छोड़ दिया है। लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त को बकायदा चिट्ठी लिखकर अपना विरोध दर्ज करवाया है। इसमें उनका कहना था कि जब तक उनके असहमति वाले मत को आॅन रिकॉर्ड नहीं लिया जाएगा तब तक वह आयोग की किसी भी बैठक में हिस्सा नहीं लेंगे।
दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ मिली शिकायतों की जांच के लिए गठित की गई समिति में मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा, अशोक लवासा और सुशील चंद्रा शामिल थे। इन मामलों में चुनाव आयुक्त लवासा का मत अन्य दोनों सदस्यों से अलग था। वह नरेंद्र मोदी और अमित शाह के भाषणों को आचार संहिता के उल्लंघन के दायरे में मान रहे थे। लेकिन बहुमत की वजह से मोदी और शाह को आचार संहिता उल्लंघन के मामले में क्लीन चिट मिल गई। इस पर लवासा चाहते थे कि उनका विरोध का मत रिकॉर्ड किया जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
यह कोई साधारण बात नहीं है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संरचना से जुड़ा कोई वरिष्ठ अधिकारी इस तरह की आपत्ति जता रहा हो। चुनाव आयोग के काम करने का तरीका भले ही अपना हो सकता है। आम व्यक्ति को इससे कोई खास मतलब भी नहीं होता है, लेकिन जिस तरह की आपत्ति लवासा ने उठाई है वह बेहद गंभीर है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहुमत को सदा ऊपर रखा जाता है, लेकिन अल्पमत को भी जगह देने का प्रावधान है। लवासा ने आयोग के निर्णय पर सवाल नहीं उठाया है, बल्कि अपनी असहमति को आॅन रिकॉर्ड करने की बात कही है। यह कोई गलत भी नहीं है। अगर किसी बात से किसी व्यक्ति की असहमति है तो उसे आॅन रिकॉर्ड करने में भी किसी को झिझक नहीं होनी चाहिए।
अपनी विश्वसनियता को लेकर इस वक्त गंभीर संकट का सामना कर रहे चुनाव आयोग के सामने यह विवाद किसी आफत से कम नहीं है। पांच दिन बाद चुनाव परिणाम भी आएंगे। ऐसे में इस विवाद को अनायास ही नहीं कहा जा सकता है। जिस तरह से लवासा की गोपनीय चिट्ठी मीडिया के जरिए सामने आई है और जिस तरह प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने इस मुद्दे को कैच कर लिया है उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। पहले से ही ईवीएम में धांधली को लेकर माहौल तैयार है। तमाम सुरक्षा प्रबंधों के बीच भी बीच बीच में ईवीएम को लेकर विवाद खड़े हो रहे हैं। ऐसे में यह स्वीकारने में कोई हर्ज नहीं कि अगर चुनाव परिणाम बीजेपी के पक्ष में आए तो ईवीएम पर अच्छा खासा विवाद तय है।
ऐसे में अब चुनाव आयुक्त लावास की असहमति भी प्रमुख मुद्दा रहेगा, इसमें दो राय नहीं। हालांकि विवाद बढ़ने पर मुख्य चुनाव आयुक्त सामने आए हैं। चुनाव आयोग के भीतर अंदरूनी मतभेद को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की चिट्ठी पर जवाब दिया है। सुनील अरोड़ा ने कहा है कि मैं कभी भी बहस से नहीं भागा। तीनों आयुक्तों की अलग-अलग राय हो सकती है। हर बात का कोई वक्त होता है। चुनाव के दौरान सामने आए मुद्दों पर समिति बनाई जाएगी। चुनाव आयोग के तीनों सदस्यों के एक दूसरे की नकल करने की उम्मीद नहीं की जा सकती। पहले भी कई बार चुनाव आयोग के सदस्यों के विचारों में काफी विविधता रही है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि ऐसा होना भी चाहिए, लेकिन ऐसे में किसी सदस्य की अलग राय का मामला उसके सेवामुक्त होने तक आयोग के भीतर ही रहता है।
सुनील अरोड़ा के इस बयान के भी मायने भी काफी गहरे हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि इस तरह के मामले कोई पहली बार नहीं उठे हैं। पर यह पहली बार है कि इसे सार्वजनिक मंच पर बहस का विषय बना दिया गया है। ऐसे में इस बात पर भी मंथन जरूरी है कि कहीं यह विवाद जानबूझकर सामने तो नहीं लाया गया है, ताकि आने वाले दिनों में नए विवादों की आधारशीला रखी जा सके।
अब बात चाहे जो कुछ भी है, बात निकली है तो दूर तलक जाएगी ही। ऐसे में चुनाव आयोग को निश्चित तौर पर आने वाले दिनों में पड़ने वाले सवालों के बाउंसर के लिए तैयार रहना होगा। खासकर 23 मई के बाद तमाम तरह के सवाल चुनाव आयोग से पूछे जाएंगे। यह सवाल पूछना इसलिए भी जरूरी होगा क्योंकि यह किसी लोकतांत्रिक देश के भविष्य का प्रश्न है। चुनाव आयोग हमेशा से ही अपनी निष्पक्षता के लिए जाना जाता है। शायद उसी निष्पक्षता के बुनियाद पर हमारा भारतीय लोकतंत्र मजबूती से खड़ा है। इसीलिए अगर इस बुनियाद को कमजोर होने पर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है तो यह बेहद चिंताजनक है। चुनाव आयोग को भी गंभीर मंथन करने की जरूरत है कि आने वाले दिनों में अपनी निष्पक्षता और विश्वसनियता को मजबूत करने के लिए वह क्या करे?

कुणाल वर्मा

kunal@aajsamaaj.com

(लेखक आज समाज के संपादक हैं)

Load More Related Articles
Load More By Kunal Verma
Load More In संपादकीय

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

Do talk On this ‘Planned Murder’: इस ‘प्लांड मर्डर’ पर भी करें मन की बात

एक बार फिर मजदूरों और सफाईकर्मियों को सीवरेज टैंक में भेज कर उनका प्लांड मर्डर हुआ है। वह …