Home संपादकीय पल्स The need for effective treatment of sickness: मर्ज के कारगर इलाज की जरूरत

The need for effective treatment of sickness: मर्ज के कारगर इलाज की जरूरत

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सीआरपीएफ काफिले पर पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले में हमने अपने 40 जवान खो दिए। हमारे देश की सीमाओं के साथ ही आंतरिक सुरक्षा में सबसे बड़ी भूमिका अर्ध सैन्य बलों की है। यह अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला है, जिसमें हमने एक साथ इतनी अधिक संख्या में अपने जवान खोये हैं। आखिर ऐसा क्या हो गया कि आतंकियों ने इतना बड़ा फिदायीन हमला किया। हम जब इस सवाल के जवाब को खोजते हैं तब जो उत्तर सामने आता है, वो और भी दुखद है। पिछले दिनों हमारे सियासी लोगों ने राजनीतिक लाभ के लिए जिस तरह से कश्मीर में आतंकवाद की रीढ़ तोड़ने के दावे और प्रचार किए, उन्होंने आतंकियों को भड़काने का काम किया। हमारी खुफिया एजेंसियों को इसकी सूचना मिली मगर वो लाचार थे, क्योंकि सरकार के खिलाफ बोलने की इजाजत नहीं होती। सियासी समर्थकों ने सोशल मीडिया पर अपने दल के महिमा मंडन में उसको भुनाने की कोशिश की। इससे भड़के आतंकी संगठनों ने हमला करने की साजिश रची। इस साजिश की भी सूचना 10 दिन पहले पहुंच चुकी थी मगर कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया। आतंक के खिलाफ लड़ाई जरूरी है। आतंकियों का मनोबल तोड़ने के काम भी किए जाने आवश्यक हैं मगर उनके सियासी फायदे की सोच सदैव संकटकारक होती है।
इस विषय पर चर्चा से पहले कश्मीर के इतिहास पर गौर करना जरूरी है। कश्मीरियत ऋषि परंपरा के त्रिखा शास्त्र और सूफी इस्लाम का संगम है। यहां की संस्कृति में कट्टरता का कोई स्थान नहीं था। 1589 में यहां मुगल शासन स्थापित हुआ और फिर 1814 में राजा रणजीत सिंह ने कश्मीर को सिख शासन का हिस्सा बना लिया। 1846 में कश्मीर ईस्ट इंडिया कंपनी का हिस्सा हो गया। अंग्रेजों ने गुलाब सिंह को यहां का राजा बनाकर स्वतंत्र सत्ता सौंप दी। भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत कश्मीर को मित्र राज्य की तरह शामिल करने का प्रस्ताव पारित हुआ। राजा हरि सिंह ने लगातार पठानों के संघर्ष से जूझते हुए कश्मीर को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत भारतीय संघ में शामिल होने का प्रस्ताव किया, जिसे लार्ड माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर 1947 को मंजूरी दे दी। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पठानों को खदेड़ने के लिए भारतीय सेना कश्मीर भेजी। जनवरी 1948 में कश्मीर विवाद संयुक्त राष्ट्र संघ पहुंचा तो भारत ने वचन दिया कि वह भारतीय संघ में विलय के लिए जनमत कराएगा, जो नहीं हुआ। नेहरू ने शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में सरकार बनवाकर दावा किया कि कश्मीर का जनमत भारत के पक्ष में है। संयुक्त राष्ट्र आयोग ने अगस्त 1948 में विवाद खत्म होने की रिपोर्ट पारित की। 1950 में शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर के भारत में विलय का प्रस्ताव को पास किया। पाकिस्तान के उकसाने के बाद भी आवाम शेख के साथ थी जिससे शांति बरकरार रही। 1965 में लाल बहादुर शास्त्री ने पठानों से सख्ती से निपटाने की कोशिश की तब कश्मीरी बंट गए और पाकिस्तान की साजिश सफल हुई। ताशकंद समझौते से पनपी बीमारी ने हमारे देश का जान-माल के साथ ही बहुत नुकसान किया है।
कश्मीर एक ऐसी बीमारी बन गया है, जिसका इलाज कभी बंदूक और बारूद नहीं हो सकता है। इसके लिए हमें गांधीवादी तरीका अपनाना होगा। कश्मीरी पंडित पहले ही दरबदर हो चुके हैं और मौजूदा आवाम भारत को अपना नहीं मानती। आवश्यकता यह है कि उनके साथ समस्याओं पर चर्चा हो। उनके समाधान निकाले जाएं। वहां रोजगार के अच्छे अवसर उपलब्ध कराने के साथ ही ज्यादती का शिकार हुए परिवारों को मुख्य धारा से जोड़ा जाए। जो कश्मीर हमारे कब्जे में है, उसको सुलभ बनाया जाए, फिर जो हिस्सा हमसे निकल गया है उस पर ध्यान दिया जाए। सामुदायिक कार्यक्रम चलाकर देश के विभिन्न हिस्सों से इसे जोड़ा जाए। सख्त निगरानी के साथ ही सुरक्षा कार्यकलापों की पारदर्शी समीक्षा की जाए। समस्या यह है कि हमारी सरकारें बातचीत के लिए कुछ लोगों को भेजकर इतिश्री कर लेती हैं, जो कभी समाधान नहीं निकाल पाए। वहां की आवाम को मुख्यधारा में जोड़े बिना किसी बड़ी उम्मीद की आस लगाना बेमानी है।
गुरुवार को पुलवामा में जो हुआ उसके लिए हमारी सियासत जिम्मेदार है। पहले अलगाववादी सोच रखने वाले दल के साथ सत्ता सुख हासिल किया और फिरकापस्तों को पनपने का मौका दिया। जब पानी सिर के ऊपर निकल गया तब वह कदम उठाया जो पहले करना चाहिए था। राष्ट्रपति शासन लगने के बाद फिरकापरस्तों से निपटने के लिए सही दिशा में कदम बढ़ाए गए मगर आवाम को विश्वास में लेने की कोशिश नहीं की गई। सियासी फायदे के लिए बढ़-चढ़कर बयानबाजी की गई। यही बयानबाजी आग में घी का काम कर गई। नतीजतन हताशा का शिकार आतंकी संगठनों ने सत्ता को चुनौती देने के लिए बड़ी घटना करने की तैयारी की। जिसकी खबर खुफिया एजेंसीज ने समय रहते सरकार को दी। सरकार ने खुफिया तथ्यों पर गंभीरता से काम नहीं किया गया और देश को अपने 40 जवान खोने पड़े। हमारे सामने 1959 का उदाहरण है जब पंडित नेहरू ने बड़े सलीके से कश्मीर में भारतीय सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग बाध्यकारी बनवा लिया था क्योंकि आवाम विश्वास में था। 1963 में भी हजरतबल में हुई घटना को संभाल लिया गया था मगर 1965 में पाकिस्तानी घुसपैठ करने में कारगर रहे। यही स्थिति आज भी बन रही है। हमें जरूरत यह है कि हम तीन मोर्चों पर काम करें। पहला घुसपैठ रोकें, दूसरा आंतरिक सुरक्षा चौकसी पारदर्शी और मजबूत बनाएं। तीसरा स्थानीय नागरिकों से खुली चर्चा शुरू करें। उनकी समस्याओं के समाधान निकालें। उनके बीच सामुदायिक भावना उत्पन्न करें।
देश के सभी सियासी दलों को खुले दिल से कश्मीर में शांति बहाली और विश्वास के लिए काम करने की जरूरत है। जिस दिन कश्मीरियों में भारतीय और सरकार के प्रति विश्वास कायम होगा पाकिस्तानी साजिशें कभी सफल नहीं हो पाएंगी। पाकिस्तान के साथ सख्ती से इस विषय पर निपटें और वैश्विक मंच पर भारतीय पक्ष को स्पष्ट करें। सियासी फायदे के लिए सेना या अर्धसैन्य बलों का इस्तेमाल करने के बजाय शांति बहाली के सार्थक उपाय करें। पारदर्शी न्याय प्रणाली और कानून व्यवस्था जब तक कायम नहीं होगी, तब तक हम न कश्मीर समस्या का समाधान नहीं निकाल पाएंगे और हमारे जवान मरते रहेंगे। विश्व का इतिहास बताता है कि कभी, कहीं भी बंदूक से शांति स्थापित नहीं हुई है। जहां भी इसका इस्तेमाल हुआ, वहां आस्थायी शांति ही मिली और बाद में बद से बदतर हालात हुए हैं। देश को कश्मीर के स्थाई इलाज की दरकार है क्योंकि हम बजट और सेना एवं अर्धसैन्य बल का बड़ा हिस्सा यहां स्वाहा कर रहे हैं फिर भी नतीजा सिफर है। खुले दिल दिमाग से देश के लिए सोचिये और करिये।
जय हिंद।

अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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