Home संपादकीय The end of an era of familyism politics: परिवारवाद की राजनीति के एक युग का अवसान

The end of an era of familyism politics: परिवारवाद की राजनीति के एक युग का अवसान

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2019 का लोकसभा चुनाव कई मायनों में सबसे अलग रहा है। तमाम कयासों, आशंकाओं और संभावनाओं के तर्क और कुतर्क के बीच देश ने एक स्थिर सरकार की राजनीति पर विश्वास जताया है। किसी भी लोकतांत्रिक देश की प्रगति के लिए स्थिर और बिना किसी सहारे की सरकार बेहद जरूरी होती है। देश की जनता ने इस बात को समझा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दोबारा मौका दिया है कि वो देश की दशा और दिशा को एक नई ऊंचाई दे। साथ ही देश ने परिवारवाद की राजनीति को सिरे से नकाराते हुए एक नया संदेश भी दिया है। इस संदेश के कई मायने हैं। राजनीति के इस नए अध्याय पर मंथन जरूरी है, क्योंकि यह राजनीति के एक युग का अवसान है।
लोकसभा चुनाव के परिणामों ने इस बात को स्थापित कर दिया है कि जातिवाद और वंशवाद की जड़ें तब तक मजबूत रहती हैं जबतक आप खुद को मसीहा न समझ बैठें। जैसे ही आपने खुद को मसीहा की श्रेणी में ला दिया और यह सोच लिया कि जो पेड़ हमारे पूर्वजों ने लगाया उसके केवल हम फल ही खाते रहें तो आपका पतन निश्चित होता है। कोई भी फलदार पेड़ भी तब तक छाया देता है, सुकून देता है, फल देता है जबतक की आप उसकी सेवा करें। पर बिना सेवा किए आप सिर्फ नाम का सहारा लेकर मेवा नहीं खा सकते हैं। कुछ ऐसा ही इस बार के चुनाव में हुआ है। क्या बिहार और क्या हरियाणा, क्या यूपी और क्या उत्तरप्रदेश और क्या मध्यप्रदेश। हर तरफ से देश की जनता ने उन पेड़ोंं की छांव में बैठने से इनकार कर दिया है जिसके नीचे बैठने के लिए लोग ललायित रहते थे। जनता को भी अहसास हो गया है कि ये परिवारवादी और वंशवादी पेड़ न तो छाया दे सकते हैं और फल।
वंशवादी राजनीति को इससे बड़ा देश व्यापी झटका इससे पहले कभी नहीं लगा। पंजाब के बादल परिवार सहित कुछ अपवादों को छोड़ दें तो राजनीतिक परिवार से आने वाले अधिकांश उम्मीदवारों को इस बार हार का सामना करना पड़ा है। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह का परिवार हो, बिहार में लालू प्रसाद का परिवार हो, हरियाणा में हुड्डा और चौटाला परिवार हो या फिर महाराष्ट्र का पवार परिवार। सभी परिवारों के उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा है। बिहार में करीब तीन दशक बाद ऐसा हाल हुआ है कि लालू कुनबे को एक-एक वोट के लिए तरसना पड़ा है। पार्टी का हाल तो इससे भी बुरा हुआ। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का खाता तक नहीं खुला। लालू की बेटी और समधी मैदान में थे, जिन्हें जनता ने सिरे से नकार दिया। यही हाल उत्तरप्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल के नेता अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी का रहा। हर वक्त जीत का दंभ भरने वाले मुलायम सिंह के कुनबे की राजनीति को भी जनता ने अस्वीकार कर दिया है। मुलायम सिंह यादव की बहू डिंपल यादव, भतीजे धर्मेंद्र यादव, अक्षय यादव को जबर्दस्त हार का सामना करना पड़ा। यूपी में ही कांग्रेस के दिवंगत नेता जितेंद्र प्रसाद के पुत्र जितिन प्रसाद सहित कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को भी जनता ने स्वीकार नहीं किया है। हरियाणा की राजनीति में जिस तरह लाल और हुड्डा परिवार का वर्चस्व रहा है उसका वर्चस्व भी ध्वस्त हो गया है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा खुद तो हारे ही उनके बेटे दीपेंद्र सिंह हुड्डा को भी हार का स्वाद चखना पड़ गया है। पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला के पौत्र दुष्यंत चौटाला, अर्जुन चौटाला और पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल के परिवार की तीसरी पीढ़ी के भव्य बिश्नोई को भी जनता ने नकारा दिया है।
मध्यप्रदेश में सबसे बड़ी हार सिंधिया परिवार की हुई है। अपने पूर्वजों की बपौती मानकर जिस दंभ के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना सीट पर जीत मानकर चल रहे थे। उस सीट की जनता ने सिंधिया को करारा झटका दिया है। जो हाल अमेठी का रहा, वही हाल गुना सीट का रहा। महाराष्ट्र में मुरली देवड़ा के पुत्र मिलिंद देवड़ा, शरद पवार के भतीजे और पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार के पुत्र पार्थ मावल अपनी जीत सुनिश्चित नहीं कर सके। कुछ ऐसा ही हाल राजस्थान में गहलौत फैमिली का रहा है। यहां मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने बेटे वैभव गहलोत को जीत नहीं दिला सके। तेलंगाना में मुख्यमंत्री केसी राव अपनी बेटी कविता कलवाकुंतला को नहीं जितवा पाए। कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी अपने बेटे निखिल को हार से बचा नहीं पाए। देवगौड़ा खुद मैदान में थे, लेकिन जनता ने उन्हें भी नकार दिया। देवगौड़ा के बेटे, पोते सबके सब मैदान में थे।
इन सबके बीच परिवारवाद की राजनीति के एक और स्वरूप पर भी मंथन जरूरी है। हरियाणा में चौधरी बिरेंद्र सिंह ने अपने बेटे के लिए लड़ाई लड़ी। उन्होंने अपने आईएएस बेटे को टिकट दिलवाया। पर साथ ही यह भी घोषणा कर दी कि अब वो राजनीति से सन्यास ले रहे हैं। चौधरी बिरेंद्र सिंह की इस साफगोई को जनता ने स्वीकार किया। पर पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में सुखराम के पोते को जनता ने नकार दिया। कश्मीर में भी महबूबा मुफ्ती की वंशवादी राजनीति को जनता ने पीछे छोड़ दिया। 2019 के लोकसभा चुनाव को भारतीय राजनीति और लोकतंत्र के इतिहास में एक उदाहरण के तौर पर देखा जाएगा। राजनीति विज्ञान के छात्र इस चुनाव पर रिसर्च कर सकते हैं। क्योंकि इस चुनाव ने भारतीय राजनीति में बहुत कुछ बदल दिया है। धर्म जाति और संप्रदाय से ऊपर उठकर लोगों ने अपने नेताओं को चुना है। खासकर प्रधानमंत्री को चुना है। ऐसे में जनता के मूड और राजनीति पर विस्तार से मंथन जरूरी है। यह मंथन इसलिए भी जरूरी है ताकि आने वाले भारत की तस्वीर को बेहतर किया जा सके। इस बार करीब 90 से अधिक सांसद ऐसे हैं जिन्हें पहली बार जनता ने संसद में भेजा है। जनता की उम्मीद इन सांसदों से अधिक रहेगी कि वो बिना किसी जातिगत और क्षेत्रवाद संरचना में फंसे अपने देश के विकास में अपना योगदान दें। ये नए सांसद किसी वंशवाद या परिवार वाद की बेल पकड़कर संसद नहीं पहुंचे हैं। किसी भी लोकतंत्र में परिवारवाद या वंशवाद की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। पर भारतीय राजनीति की यही विडंबना रही है कि इतने बड़े लोकतंत्र का आधार ही परिवारवाद बन गया था।
पर इस बार के चुनाव में राजनीति के एक युग का अवसान कर दिया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि तमाम राजनीतिक घराने और राजनीतिक पार्टियां इसपर जरूर गंभीरता से मंथन करेगी कि परिवारवाद की राजनीति करनी है तो हमें कुछ करना भी होगा। सिर्फ फलदार पेड़ से फल तोड़कर खाना ही राजनीति नहीं है। इस पेड़ को संरक्षित और सुरक्षित करना भी जरूरी है। तभी जनता आपको स्वीकार करेगी, नहीं तो जो हश्र आज हुआ है वह कल भी होगा।
कुणाल वर्मा
(लेखक आज समाज के संपादक हैं)

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