Home विचार मंच The Congress can walk with everyone! सबको लेकर चलने की कूवत कांग्रेस में है!

The Congress can walk with everyone! सबको लेकर चलने की कूवत कांग्रेस में है!

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2019 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी सरकार के और ताकत से लौटने से एक बात तो साफ ही हो गई है कि बिखरा हुआ विपक्ष कभी भी सत्ता पक्ष के लिए चुनौती नहीं बन सकता। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा और रालोद का गठबंधन बुरी तरह पराजित हुआ। बंगाल की शेरनी ममता बनर्जी को अब समझ नहीं आ रहा, कि वे क्या करें। बिहार में लालू पुत्रों की रार सबको ले डूबी। तेलुगु बिड्डा एन चंद्रबाबू नायडू, तो विधानसभा तक में अपनी सरकार न बचा सके। कांग्रेस कुछ भी हो, कम से कम पिछली बार से तो बेहतर ही रही।
लेकिन उसके अंदर आत्म-मंथन का दौर जारी है। किंतु शेष विपक्षी दल तो मिथ्याभिमान में धंसे हैं। बजाय, इसके कि वे सोचते, कि यह हार आखिर क्यों हुई? बसपा सुप्रीमो मायावती छिटक कर दूर खड़ी हो गर्इं, तथा एलान कर दिया, कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव अपना ही बेस-वोट नहीं बचा सके, तो उनसे गठबंधन कैसा! उधर अखिलेश भी पलटवार कर रहे हैं। सवाल यह उठता है, कि नतीजा आने के पहले तक तो सपा-बसपा उत्तर प्रदेश में गठबंधन की 60 से 65 सीटें आने का दावा कर रहे थे, और कांग्रेस को वोटकटवा पार्टी कह रहे थे, लेकिन हो गया उल्टा। अब अपने पुराने आरोपों पर माफी मांगें।
सच तो यह है, कि अगर उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-रालोद अपने गठबंधन को कांग्रेस से जोड़ते, तो शायद सभी को फायदा मिलता। इन सभी दलों को अलग-अलग मिले मतों का प्रतिशत देखा जाए, तो पता चलता है, कि स्वयं यह गठबंधन वोटकटवा साबित हुआ। यह जरूर हुआ, कि इस वोटकटवा खेल में बसपा को लाभ मिला। बसपा का मत-प्रतिशत भी बढ़ा और सीटें शून्य से बढ़कर दस हो गर्इं। सपा को कुल 5 सीटें तो मिलीं लेकिन उनके परिवार में सिवाय राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बाकी सभी लोगों को पराजय का मुंह देखना पड़ा। अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव कन्नौज से हारीं तो दोनों चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव तथा अक्षय यादव क्रमश: बदायूं और फिरोजाबाद से। तीनों जगह से भाजपा जीती। बदायूं से जीतीं संघमित्रा मौर्य तो बाहरी हैं। इसी तरह फिरोजाबाद से भाजपा के विजयी प्रत्याशी जादौन बहुत ही बुजुर्ग और लगभग रिटायर हो चुके एक भाजपा कार्यकर्त्ता हैं। सपा के जो तीन और लोग जीते हैं, उनमें से एक तो बड़बोले आजम खान हैं। वे अखिलेश यादव को नेता ही नहीं मानते। इसी तरह संभल के शफीकुर्रहमान विर्क विवादास्पद रह चुके हैं, तथा मुरादाबाद के एसटी हसन की बहुत पैठ नहीं है। इस तरह लोकसभा में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की कितनी चलेगी, यह किसी को नहीं पता।
रालोद यानी राष्ट्रीय लोक दल अब करीब-करीब समाप्तप्राय है। यह बस पिता-पुत्रों की पार्टी है, और वेस्टर्न यूपी के मेरठ एवं आगरा मंडल के आगे उसका कोई वजूद नहीं बचा। ऐसे में वह कैसे आगे बढ़ सकती है। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है, कि यह गठबंधन चाहे लाख दावा कर ले, कि वह भाजपा एवं मोदी सरकार को हराने के लिए बना था, किंतु सत्य यह कि यह गठबंधन यूपी से कांग्रेस को हराने के लिए बना एक मोर्चा था। इस मोर्चे ने मुसलमानों को जरूर भरमा लिया। उन्हें सोचना था, कि केंद्र में सरकार बनाने का बूता किसी राष्ट्रीय पार्टी के पास ही होता है। क्षेत्रीय दल लाख मोर्चा बना लें, लेकिन उनके अलग-अलग हित उन्हें कभी भी एकमत नहीं होने दे सकते। भाजपा को नई लोकसभा में जिस तरह से विशाल बहुमत मिला है, उससे यह तो साबित होता है कि अलग-अलग क्षेत्रीय दल भाजपा के लिए कांग्रेस के विरुद्ध बैटिंग करते रहे। यही हाल पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का रहा।
वहां उन्होंने माकपा और कांग्रेस के विरुद्ध ऐसा जहर बो दिया, कि वह जहर भाजपा के लिए तो अमृत हो गया और जहर की जद में वे खुद आ गर्इं। इसी तरह बिहार के क्षत्रप लालू यादव बिहार को ही देश समझ बैठे थे। उन्होंने अपने गठबंधन से कांग्रेस को सिर्फ नौ सीटें दीं। इसके बावजूद इस गठबंधन को 39 में से सिर्फ एक ही सीट मिली। मजे की बात वह सीट भी कांग्रेस ने जीती। आंध्र में चन्द्र बाबू नायडू का भी यही हाल रहा। क्योंकि इतने चेहरे और मोर्चे देखकर मतदाता यह नहीं तय कर पा रहा था, कि मोदी के खिलाफ जितने भी चेहरे हैं, उनमें प्रधानमंत्री का चेहरा कौन सा है। अगर कांग्रेस को आगे कर राहुल गांधी की अगुआई में इन क्षेत्रीय दलों ने मोर्चा बनाया होता तो बहुत संभव था, कि मोदी सरकार को इस बार करारा झटका लगता। विपक्षी दलों के महत्वाकांक्षी नेताओं को समझना चाहिए, कि देश में अब दो ही दल अपनी राष्ट्र-व्यापी हैसियत रखते हैं।
भाजपा अगर सत्तारूढ़ है, तो इसका विकल्प कांग्रेस ही बन सकती है और कांग्रेस के समक्ष भाजपा। मतदाता इसे बखूबी समझता है। मगर छोटे-छोटे स्वार्थों वाले राजनेता यह बात नहीं समझ पा रहे। दक्षिण भारत के तमिलनाडु, और केरल में कांग्रेस प्लस गठबंधन ने ठीक प्रदर्शन किया है। क्योंकि वहां का मतदाता वास्तविकता से रूबरू था। आने वाले दिनों में उत्तर और मध्य भारत के छोटे दलों के नेताओं को भी यह बात स्वीकार करनी ही पड़ेगी। ये दल या तो क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के चलते बने हैं या अपनी परिवारी जनों व सजातीय लोगों के बूते खड़े हैं। लेकिन केंद्र इन सब महत्वकांक्षाओं को खारिज करता है। वहां की सत्ता तक पहुंचने का बूता किसी भी एक जाति या बिरादरी के राजनीतिक दल के वश का नहीं है, न ही किसी खास क्षेत्रीय हित की ताकत पर केंद्र तक पहुंचा जा सकता है। केंद्र के लिए एक समावेशी चरित्र की जरूरत है, क्योंकि वहां वही दल पहुंच सकता है, जो सबको साथ लेकर चले। हमारा देश विविधताओं से भरा हुआ है, इसलिए विविधता में एकता की बात करने वाला दल ही दिल्ली की सत्ता के लिए सबसे उपयुक्त है। संयोग है, कि कांग्रेस शुरू से ही मध्य-मार्गी चरित्र वाला दल रहा है। वह सभी जातियों, संस्कृतियों और धार्मिक पहचान वाले लोगों को लेकर चलने वाला दल है, इसलिए उसके लिए केंद्र तक पहुंचना शुरू से ही सुगम रहा है।
आज भले ही लगे, कि कांग्रेस बहुत पीछे हो गई है, उसे लगातार दो लोकसभाओं में मुख्य विपक्षी दल तक बनने का मौका नहीं मिल पा रहा है। लेकिन राजनीति की लड़ाई लम्बी होती है। आज नहीं, तो कल किसी न किसी रोज तो कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचने का अवसर मिलेगा ही। और इसकी मुख्य वजह है, उसका समावेशी चरित्र। यह बात सभी दलों के नेताओं को समझ लेनी चाहिए। कांग्रेस एक दल से अधिक संस्कृति है। एक ऐसी संस्कृति, जो विशाल राष्ट्र को एकता के धागे से पिरोती है। इसलिए अकेली कांग्रेस ही वह राजनीतिक पार्टी है, जिसकी छतरी के नीचे सभी लोकतंत्र के हामी राजनीतिक दल खप सकते हैं।
शंभूनाथ शुक्ल
लेखक वरिष्ठ संपादक रहे हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।

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