Home विचार मंच The common man finds himself in political abuse?: सियासी गालियों में खुद को तलाशता आम आदमी?

The common man finds himself in political abuse?: सियासी गालियों में खुद को तलाशता आम आदमी?

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दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में आम चुनाव जमींन पर नहीं जुबान से लड़े जा रहे हैं। राजनैतिक दल और राजनेता चुनावी सभाओं में एक दूसरे पर जमकर हमला बोल रहे हैं। सियासी गर्द में आम आदमी की समस्याएं धूल बन कर उड़ रही हैं। चुनाव अपनी उपलब्धियों के बजाय गंदी गालियों से लड़ा जा रहा है। पांच चरणों के चुनाव खत्म होने के बाद जुबानी जंग और तेज हो चली है। गड़े मुर्दे भी उखाड़े जा रहे हैं। दुर्योंधन, पापी, औरगंजेब, चोर, चैकीदा, अत: वस्त्र में खाकी, जाति जैसे मसले खास बन चुके हैं। पूर्वांचल में हमने कई चुनावी रैलियों को कवर किया, लेकिन किसी भी रैली में संसदीय क्षेत्र की समस्याएं मुद्दा बनती नहीं दिखी।
राष्टÑवाद, जातिवाद, धर्मवाद और गालीवाद के भरोसे मतदाओं की भावनाओं को भड़कर वोट लेने की साजिश रची जा रही है। राजनैतिक दल एक मूल एजेंडे पर काम कर रहे हैं। वह मतदातओं की भावनाओं को भड़काकर वोट लेना चाहते हैं। प्रधानमंत्री अपने चुनावी रैलियों में यह कहते हुए फिर रहे हैं कि आप कमल की बनट दबाएंगे तो सीधे हमारे खाते में वोट जाएगी। यूपी के भदोही में उन्होंने अपने उम्मीदवार तक का नाम नहीं लिया। बोले आपका वोट सीधे हमारे खाते में आएगा। फिर जनता सांसद क्यों चुनती है। उसे वोट क्यों देती है। चुनाव मैदान में उतरे राजनैतिक दलों का स्थानीय विकास का कोई एजेंड़ा नहीं है। 2019 की पूरी लड़ाई मोदी बनाम विपक्ष बन गया है। चुनाव मैदान में उतरे उम्मीदवार जनता को यह बताने में नाकाम हैं कि हमारे पास क्षेत्रिय विकास का अमुक एजेंड़ा है। अगर आप हमें जीत दिलाते हैं तो आपकी किन-किन समस्याओं का हम समाधान करेंगे। स्थानीय विकास की बात कोई करने को तैयार नहीं दिखता है। बस राजनैतिक दलों के स्टार प्रचारकों के भरोसे चुनावी वैतरणी जीतने की कोशिश की जा रही है। देश का पैसा चुनावों में पानी की तरह बहाया जा रहा है। हाईटेक मंच और पंड़ाल बनाए जा रहे हैं। उसमें कूलर और पंखे फिट किए जा रहे हैं। आधुनिक दौर की राजनेताओं के लिए सारी सुविधाएं मुहैया करायी जा रही है। आम आदमी अपने नेताओं के समर्थन में तपती दोपहरी में बदन झुलसा रहा है। पारा 40 से 42 तक पहुंच गया है। पछुवां हवाएं कहर बरपा रही है। लेकिन समर्थक सूखे गले को फाड़ जिंदाबाद के नारे लगा रहे हैं। कई-कई घंटों अपने नेताओं को सुनने के लिए भीड़ इंतजार कर रही है। पार्टी के झंडे-वैनर के साथ गला फोड़ जिंदाबाद के नारे लगाए जा रहे हैं। लेकिन विकास गायब है। पूरा चुनाव चोर, चैकीदार, पकौड़ा, दुर्योंधन, औरंजेब, कुर्तें, रसगुल्ले के आसपास घूम रहा है। देश की सबसे बड़ी पार्टी के नेता राहुल गांधी प्रधानमंत्री को चोर से संबोधित कर रहे हैं। जरा सोचिए देश की राजनीति को हम कैसा संस्कार दे रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतिम दो चरणों में बोफोर्स का मसला जिंदा कर दिया है। अब पूरी भाजपा जहां इसे लेकर हमलावर है वहीं कांग्रेस खुद को आत्मरक्षा के मोड़ पर खड़ी है। प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को भी घसीट लिया है। जिस पर राहुल और प्रियंका ने जमकर हमला बोला। बोफोर्स में 64 करोड़ की दलाली का आरोप लगा था। लेकिन आज तक वह दलाली साबित नहीं हो पायी। पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह इसी को मसला बना प्रधानमंत्री बने लेकिन कोई परिणाम नहीं निकल पाया। जबकि रक्षा सौदे में दलाली के आरोपों में राजीवा गांधी को सत्ता गंवानी पड़ी थी। सवाल उठता है इस दौरान कई गैर कांग्रेसी सरकारें भी आयीं फिर उन्होंने इस पर जांच क्यों नहीं बिठायी। गांधी परिवार को सजा क्यों नहीं दिलायी गयी। पांच साल मोदी की सरकार भी केंद्र में रही फिर उन्होंने इस पर चुप्पी क्यों साध रखी थी। पांच चरण का चुनाव बीत गया तब उन्हें बाफोर्स और दिवंगत प्रधानमंत्री की याद क्यों नहीं आयी। अंतिम दो चरणों के चुनाव में गांधी परिवार को घेरने के लिए उन्हें बोफोर्स जैसे बेदम मसले को उठाना पड़ा। अगर राहुल गांधी के वार राफेल का जबाब बोफोर्स थी तो अब तक पीएम मोदी ने चुप्पी क्यों साध रखी थी। बोफोर्स का मुद्दा बना अब कांग्रेस को चुनौती क्यों दी जा रही है। इससे यह साबित होता है कि भाजपा की जमींन खींसक रही है। 2014 के मुकाबले वह कमजोर दिखती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र अपनी पांच साल के विकास उपलब्यिों को बताने के शिवाय बोफोर्स की माला क्यों जपने लगे। हिंदुत्व, राष्टवाद, सेना और उसका शौर्य जब भजपा को बोफोर्स पर क्यों उतरना पड़ा। कांग्रेस की नाकामियों के एवज में आपके पास 60 साल बनाम 60 माह की उपलबिधयां हैं। आप जनता के सामने उस उपलब्धि को क्यों नहीं रखते। संभवत: 2019 का चुनाव ऐसा हैं जहां प्रधानमंत्री को खुद अपनी जाति बतानी पड़ी। इससे यह साफ जाहिर हो गया कि यूपी में सपा-बसपा का गठबंधन उन्हें बेहद कड़ी चुनौती दे रहा है। क्योंकि यह गठबंधन जातिय समीकरण पर तैयार हुआ है। यूपी में अगर यह राजनैतिक प्रयोग सफल रहा तो भाजपा के लिए यह कठिन चुनौती होगी। क्योंकि फिर 2022 में राज्य विधानसभा के चुनाव में भाजपा की राह उतनी आसान नहीं होगी। हालांकि इसके पूर्व भी सपा-बसपा का गठबंधन हो चुका है। लेकिन बाद में वह टूट गया। बदले सियासी हालात में फिलहाल अब ऐसा नहीं दिखता है।
भाजपा ने 2014 में यहां की 80 सीटों में से 73 पर जीत हासिल किया था। लेकिन 2019 में सपा-बसपा और राष्टÑीय लोकदल का एक मंच पर आना भाजपा के साथ कांग्रेस की बड़ी चुनौती बन गया है। यूपी में अभी तक लड़ाई मोदी बनाम विपक्ष थी, लेकिन गठबंधन ने नया पैतरा बदला है। अब मायावती और अखिलेश चुनावी सभाओं में भाजपा-कांग्रेस पर सीधा हमला बोल रहे हैं। दोनों दलों को एक बताया जा रहा है। चैनल जमीनी मसले उठाने के बजाय नेताओं की गंदी जुबान पर टीवी डिबेट आयोजित करते हैं। जबकि उनका दायित्व बनता है कि वह स्वस्थ बहस को बढ़ावा दें। पांच साल के बाद चुनाव आते हैं। सत्ता पक्ष ने इस दौरान जनता से किए गए वादों को कितना पूरा कियाफ। कितने वायदे अधूरे हैं इस पर डिबेट होनी चाहिए। खुद सवाल जबाब पूछने के बजाय सवाल पूछने का अधिकार सीधे जनता को दिया जाना चाहिए। क्योंकि चुनावों में राजनेता और राजनीति सपने बेंचती हैं। वोट लेने के लिए चुनावी सभाओं में जनता से गलत वादे किए जाते हैं। फिर सवाल पूछने का हक भी जनता का बनता है। राजनेताओं की गंदी जुबान पर डिबेट दिखा कर चैनल क्या हासिल करना चाहते हैं। मीडिया देश में कौन सी विचारधारा पैदा करना चाहती है। अच्छा होता ग्राउंड रिपोर्ट कर राजनेताओं के झूठ का पर्दाफांस कर उस पर डिबेट आयोजित की जाती। कैमरे के सामने संबंधित इलाकों की बदहाली पर नेताओं का जबाब मांगा जाता। किसान आत्महत्या कर रहा है। महिलाएं असुरक्षित हैं। बेराजगारी चरम पर है। अभी तक तमाम इलाके स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, बिजली, पानी जैसी सुविधाओं से बदहाल हैं फिर उन पर बहस होनी चाहिए। अब वक्त आ गया है जब राजनीति, मीडिया और समाज को अपनी नीतियों में परिवर्तन लाना चाहिए।
हमें लोकतंत्र में एक स्वस्थ विचारधारा का प्रवाह पैदा करना चाहिए। हम जाति, धर्म, भाषा, प्रांतवाद के साथ गालियां देकर हम सत्ता तो हासिल कर सकते हैैं, लेकिन एक बेहतर देश का निर्माण नहीं कर सकते हैं। क्योंकि हमारी विचारधाराएं ही हमारी सोच होती हैं। हम खुद गिरे हैं तो फिर हम उठने की बात कहां से कर सकते हैं। जतना को भी नेताओं की जुबान पर आवाज उठानी चाहिए। क्योंकि अगर इस बात को हमने गंभीरता से नहीं लिया तो इसकी सजा हमारी कौंमें भुगतेंगी। हमें इस पर विचार करना होगा, वरना गालियों से चुनाव जीतने की रणनीति भविष्य के लिए घातक होगी और आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।

 प्रभुनाथ शुक्ल

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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