Home विचार मंच Ten Ways to Be Happy: खुश रहने के दस तरीके

Ten Ways to Be Happy: खुश रहने के दस तरीके

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विज्ञान एक तरीका है। ये प्रयोग और अवलोकन के जरिए प्रकृति में निहित नियमों को परखता है। फिर उसका इस्तेमाल कर समस्याएं सुलझाता है। इस क्रम में कभी-कभी ये नई समस्याएं खड़ी भी कर देता है। इसी का जादू है कि दुनिया सिमटकर एक छोटे-से गांव जैसी हो गई है। चांद पर तो कब का हो आएं हैं। मंगल पर भी यान भेज दिया है। आदमी उतारने की तैयारी चल रही है। अगर पचास साल से कोमा में पड़ा कोई आदमी होश में आ जाए तो चक्कर खा जाएगा कि वो कहां आ गया है।
विज्ञान आदमी के दिमाग को भी समझने में लगा हुआ है। शुरू में तो ये खराबी ही ठीक करता रहा। असामान्य व्यवहार वाले लोग शैतान से बीमार की श्रेणी में आ गए। प्रताड़ना की जगह उनका इलाज होने लगा। 1998 में पॉजिटिव सायकॉलोजी मूवमेंट शुरू हुआ। तब से ध्यान इस बात पर भी है कि क्या करने से खुशी मिलती, रहती और बढ़ती है। न्यूरोसाइन्स दिमाग के उन इलाकों की गतिविधियों का अध्ययन कर रहा है जिसका सम्बंध खुशी की अनुभूति से है।
खुश रहने के विज्ञान-सम्मत तरीकों की बात करें तो निम्न दस को आजमाया जा सकता है:
अव्वल तो व्यायाम करें। इससे रक्त में एंडोर्फिन का संचार होता है। मूड अच्छा रहता है। यूनिवर्सिटी आॅफ टोरोंटो ने कम से कम 25 अध्ययन के आधार पर ये निष्कर्ष निकाला है कि शारीरिक गतिविधियों से डिप्रेशन जैसी बीमारी भी मिट सकती है। एक प्रयोग में इससे ग्रसित लोगों के तीन समूहों में एक को सिर्फ दवाई दी गई, दूसरे को दवाई और कसरत दोनों और तीसरे को सिर्फ कसरत कराया गया। छ: महीने बाद दोबारा डिप्रेशन में जाने वाले का प्रतिशत क्रमश: 38%, 31% और 9% था। शारीरिक सक्रियता की उपयोगिता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है? दूसरा, सकारात्मक सोच रखें।
इससे आपकी प्रभावशीलता और उत्पादकता दोनों बढ़ेगी। मनोवैज्ञानिक शान एंकर का कहना है कि कष्टकारी स्थितियां, झगड़े, कामयाबी, आर्थिक स्थिति, संबंध इत्यादि से आपकी खुशी के दीर्घकालीन स्तर के बारे में 10% ही अंदाजा लगाया जा सकता है। शेष 90% दुनिया के प्रति आपके नजरिए पर निर्भर है। आपकी सकारात्मक सोच आपके ऊर्जा के स्तर, रचनात्मकता और उत्पादकता को 30% तक बढ़ा देती है। बुद्धिमानी इसी में है कि इसका इस्तेमाल सफल होने के लिए किया जाए। सफलता उपरांत खुशी के चक्कर में न
रहा जाय।
तीसरा, नकारात्मक सोच की होली जलाएं। यूनिवर्सिटी आॅफ मैड्रिड के एक अध्ययन में पाया गया है कि अगर आप अपने नकारात्मक सोच को एक वस्तु की तरह देखें और एक कागज पर लिखकर इसे जला या फाड़ दें तो आप इससे सचमुच में निजात पा सकते हैं। चौथा, अपने अनुभवों को साजो-समान से ज्यादा तवज्जो दें। कॉर्नल यूनिवर्सिटी के टाम्स गिल्विच ने अपने शोध में पाया है कि किसी चीज को हासिल करने की खुशी थोड़े समय की ही होती है। दूसरों से तुलना और किसी अन्य चीज का आकर्षण जल्दी ही इसे हवा कर देता है। अनुभव पर जोर देना चाहिए। ये निजी और खास होती है। लम्बे समय तक खुशी देती है। अच्छा हो कि शहर-गांव में शॉपिंग माल, दफ्तर, दुकान के साथ पार्क और खेल के मैदान भी बने।
पांचवा, लिखें कि आप क्यों कृतज्ञ हैं। न्यूरोसाइंटिस्ट रिक हेन्सन का कहना है आदम के जमाने के हमारे दिमाग में नेगेटीविटी बायस होता है। चिंता, दु:ख, विफलता और असंतोष इसका डिफॉल्ट मोड है। इससे बचने के लिए जरूरी है कि हम ध्यान उन अच्छी चीजों पर लगाएं जो हमें हासिल है। छट्ठा, माइंडफुलनेस का रियाज करें। इसका मतलब ये हुआ कि वर्तमान का ध्यान करें और इसे बगैर अच्छा-बुरा समझे स्वीकार करें। इससे मूड अच्छा रहता है, तनाव कम होता है और जीवन की गुणवत्ता में बेहतर होती है। हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के मैट किलिंज्वर्थ ने 15,000 लोगों पर शोध के उपरांत ये पाया कि इधर-उधर भटकने के बजाय अगर हमारा ध्यान वर्तमान पर होता है तो हम ज्यादा खुश रहते हैं।
सातवां, सात-आठ घंटे घोड़े बेचकर सोएं। ऐसा नहीं करने से हिप्पोकंपस, दिमाग का हिस्सा जो सकारात्मक सोच का केंद्र है, कमजोर पड़ जाता है। नेगेटिव सोच को हावी होने का मौका मिल जाता है। एक प्रयोग में उनिंदे लोगों को याद करने के लिए नेगेटिव, पॉजिटिव और न्यूट्रल शब्दों की सूची दी गई। नेगेटिव शब्दों की याददाश्त 81% और पॉजिटिव और नूट्रल शब्दों की मात्र 31% पाई गई। आश्चर्य नहीं कि उल्लू की तरह जागने वाले जले-भूने ही रहते हैं। आठवां, दूसरों की मदद करें। हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के माइकल नोर्टन ने अपने प्रयोग में पाया कि लोग अपने के बजाय दूसरों पर पैसे खर्च कर ज्यादा खुश होते हैं। छात्रों के दो समूह को डॉलर देकर उसे शाम तक खर्च करने के लिए कहा गया। बाद में टेस्ट में पाया गया कि दूसरों पर पैसे खर्च करने वाले ज्यादा खुश थे।
9वां, जैसी जिंदगी चाहिए उसपर फोकस करें। डेविड गिल्बर्ट का कहना है कि दिल वहीं जाता है, जहां दिमाग ले जाता है और दोनों में से किसी को पैरों की परवाह नहीं होती। और अंत में, अपनी ताकत पर फोकस करें। आप जिज्ञासु हैं, खुले दिमाग के हैं या मजबूत। जो भी हैं उसी का इस्तेमाल कर आगे बढ़ें। अपनी कमजोरियों का रोना रोते रहे तो हालात और बिगड़ेंगे ही। जीवन का उद्देश्य ही जिसमें में हम अच्छे हैं उसमें श्रेष्ठ होने की होनी चाहिए। राहत की बात ये है कि खुश रहने की कवायद शुरू करने की कोई उम्र नहीं है। जभी जागो तभी सवेरा। फिर देर किस बात की?
ओम प्रकाश सिंह
(लेखक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं।)

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