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Teach good habits: सिखाएं अच्छी आदतें

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पुलिस के व्यवहार के बारे अक्सर सवाल उठते रहते हैं। ये अकेली एजेंसी है जो लोगों के जान-माल के हिफाजत के लिए बल-प्रयोग भी कर सकती है। समस्या तब खड़ी हो जाती है जब ये गाली-गलौज को अपनी राजभाषा बना लेती है। चलते-फिरते थप्पड़-मुक्का का शौक पाल लेती है। ये कोई नई बात नहीं है। अच्छे-बुरे सबको एक ही लाठी से हांकना पुलिस विभाग में एक स्थापित उपसंस्कृति है। आम सोच ये है कि जब मनमानी कर सकते हैं तो परहेज किस बात का? लेकिन मोबाइल फोन और सीसीटीवी कैमरे ने खेल बदल दिया है। आए दिन बदजुबानी और मार-कुटाई के वीडियो वायरल होते रहते हैं। विभागीय प्रतिक्रिया अक्सर एक टेम्पलेट के हिसाब से आती है। शोर-शराबा ज्यादा हो तो दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हो जातें हैं। गिरफ्तारी, निलम्बन भी हो जाता है। समय बीतने पर समझौता हो जाता है। लोग सोचते हैं कि पुलिस से दुश्मनी ठीक नहीं। कुछ ही समय बाद कोई और वीडियो चल पड़ता है। फिर वही प्रक्रिया दोहराई जाती है।
इस बात को समझने की दरकार है कि गाली-गलौज, थप्पड़-मुक्का किसी इक्का-दुक्का सरफिरे पुलिसकर्मी की कारिस्तानी नहीं है। ये तो एक आदत है। बदमाशों से रे-बे करती, आए दिन उलझती पुलिस इसी लाठी से बाकियों को भी हांक देती है। लोगों को शिकायत ये है कि पुलिस के हाथ जब-तब पिटना ही है तो सुरक्षा किससे और काहे की? पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की एक उक्ति बड़ी चर्चित हुई थी – ‘शरीफों को छेड़ना नहीं, बदमाशों को छोड़ना नहीं’। सवाल है कि क्या ऐसा सम्भव है? जबाव हां में है।बशर्ते बेकसूरों के साथ बदसलूकी-मार-पीट के लिए सख्त कार्रवाई तो हो ही, साथ-साथ इस सदियों पुरानी जुते-मारो रवायत को बदलने के लिए योजनाबद्ध तरीके से अभियान चले। आदमी के आदत के ऊपर 1989 में स्टीवन कवी नाम के अमेरिकी ने एक किताब लिखी थी – सेवन हैबिट्स आॅफ हाइली इफेक्टिव पीपुल। इसकी अब तक ढाई करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं। 40 भाषा में अनुवाद हुआ है। लेखक ने पैसे तो कूटे ही, शोहरत भी बेहिसाब बटोरी। यहां तक कि तब के अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने अपने कैम्प डेविड रिट्रीट को बुलाकर इनसे समझा कि कैसे इनकी बातों को अमल कर वे अमेरिका को और फायदे में ला सकते हैं। अच्छी किताब है। मुझे लगता है इसे हर पुलिस अधिकारी को पढ़ना चाहिए। सात आदतें जो एक आदमी को कारगर बनाती है, सीखनी चाहिए।
पहली, प्रोएक्टिव रहें। जो कर सकते हैं समय रहते करें। हाथ पर हाथ धरे बवाल का इंतजार न करें। दूसरी, जो चाहते हैं, उसकी दिमाग में स्पष्ट छवि बनाएं। जैसे कि लोगों में सुरक्षा का भाव उत्पन्न करना। सरल भाषा में कोई मिशन स्टेट्मेंट हो जिसे सब समझें, मानें। जैसे कि:
1. मैं अपने शहीदों को हृदय में रखता हुं। मैं उन आदर्शों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हुं, जिनके लिए उन्होंने प्राण दिए थे।
2. मेरा दायित्व विधि-अनुसार व्यवस्था संचालन है। मेरा लक्ष्य है कि लोग भय-मुक्त एवं अपराधी सलाखों के पीछे रहें।
3. मुझे सम्पन्नता की ललक नहीं है। मैं एक योद्धा हुं और मुझे ज्ञात है कि तलवारें लोहे की होती है।
4. मेरे बच्चे मेरे आचरण से सीखते हैं। अपने अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा, निर्भीकता एवं सहिष्णुता के माध्यम से मैं उनके लिए प्रेरणा का श्रोत बनूंगा।
5. मैं अपराधियों के हर दुस्साहस का करारा जवाब दूंगा। ईश्वर उनपर दया करें, मुझे कतई नहीं करनी।
6. मुझे अपनी वफादारी पर गर्व है। मैं अपने वरिष्ठों के प्रति सम्मान, समकक्षों के प्रति सहिष्णुता एवं अधिनस्थों के प्रति उदारता का भाव रखूंगा।
7. मुझे ज्ञात है कि मेरा कार्य वृहद और जटिल है। मैं हमेशा धैर्य रखूंगा, विशेषकर उन परिस्थितियों में जब दूसरे किसी कारण विचलित हों।
8.अपराध-नियंत्रण एवं व्यवस्था संचालन में मैं हमेशा नियमों का पालन करूंगा। विधि एवं विधि द्वारा स्थापित संस्थाओं के प्रति मैं हमेशा आदर का भाव रखूंगा।
9. मुझे अपने सत्यनिष्ठ, न्यायप्रिय, अनुशासित, निर्भीक एवं परोपकारी होने पर गर्व है।
10. राष्ट्रगौरव, लोकहित एवं पुलिस विभाग की प्रतिष्ठा मेरे लिए सर्वोपरि है। मैं हर स्थिति में इसकी रक्षा करूंगा।
तीसरी, अपनी प्राथमिकता स्पष्ट करें। लक्ष्य लोगों को भय मुक्त माहौल देना है, सिर्फ बदमाशों का गोदाम चलाना नहीं। काम का एक चार्ट बना लें, इसे चार भागों में बांट लें – जरूरी और महत्वपूर्ण, गैर-जरूरी लेकिन महत्वपूर्ण, जरूरी लेकिन महत्वहीन, गैर-जरूरी एवं महत्वहीन।
पहला काम अपने हाथ में रखें, दूसरा सक्षम अधिनस्थों से कराएं, तीसरे को टपाएं और चौथे की तो बात ही न करें। चौथी, दूसरों के साथ काम करने की क्षमता विकसित करें। आप कितने भी सक्षम हैं, बगैर लोगों एवं अन्य संस्थाओं के सक्रिय सहयोग के चल नहीं पाएंगे। 5वीं, अपनी सुनाने से पहले दूसरों की सुनें, समझें। प्रभावी संवाद की क्षमता विकसित करें। ज्यादा समय बोली ही चलेगी, गोली नहीं। अपनी निजी विश्वसनीयता बनाएं, दूसरों का भावनात्मक विश्वास जीतें और बातें तर्कसंगत करें। छठी, सकारात्मक टीमवर्क के जरिए अधिनस्थों को जोड़ें। तभी कुछ बड़ा हो पाएगा।
पार्टीबाजी और गुटबंदी से ग्रसित पुलिस इकाई से कुछ नहीं होने वाला। 7वीं और सबसे जरूरी आदत कि अपने को चुस्त-दुरुस्त रखें, नई चीजें सीखते रहें। इस तेजी से बदलती दुनियां में अगर नए हुनर नहीं सीखे तो हालात पुराने फर्निचर जैसी हो जाएगी। किसी कोने में पड़े रहेंगे। मानसिक दृढ़ता नहीं रही तो किसी दिन भर-भराकर गिर पड़ेंगे। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने कहा था की अगर पेड़ काटने के छह घंटे मिले तो वे पांच घंटे कुल्हाड़ी में धार देने में लगाएंगे।
ओम प्रकाश सिंह
यह लेखक के निजी विचार हैं।

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