Home संपादकीय पल्स Sponsored hatred game for vote politics: वोट की सियासत के लिए प्रायोजित नफरत का खेल

Sponsored hatred game for vote politics: वोट की सियासत के लिए प्रायोजित नफरत का खेल

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 श्रीरामकृष्ण परमहंस जी ने अपना पूरा जीवन एक परम भक्त की तरह बिताया। वह किसी धर्म संप्रदाय या व्यक्ति के नहीं देवी काली के भक्त थे। उनके लिए काली कोई देवी नहीं थीं, वह एक जीवित हकीकत थी। काली उनके सामने नाचती थीं, उनके हाथों से खाती थीं, उनके बुलाने पर आती थीं और उन्हें आनंदविभोर छोड़ जाती थीं। यह वास्तव में होता था। उन्हें कोई मतिभ्रम नहीं था। वह पढ़े लिखे नहीं थे मगर उनसे ज्ञान लेने कोलकाता के बड़े-बड़े विद्वान आते थे। विवेकानंद भी आये और चंद सालों में वह विश्वस्तर पर पहचान बना सके। परमहंस जी की आलोचना उनके सामने ही सिर्फ ईश्वर चंद बंदोपाध्याय कर पाते थे, जब कोई उनसे कहता कि ईश्वर चंद ऐसा कहते हैं तो वह कहते थे कि ईश्वर चंद ‘विद्यासागर’ है। ज्ञानी है, उसके ज्ञान का सम्मान करो। विद्यासागर जो कर सकता है वह कोई अन्य नहीं कर सकता। उन्हीं विद्यासागर की प्रतिमा को उन्मादी भाजपा कार्यकर्ताओं ने साजिश के तहत राष्टÑीय अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान तोड़ दिया।

उन्होंने यह हमला नफरत का ध्रुवीकरण कर वोट बैंक बनाने के लिए किया था मगर घटना के वीडियो सामने आने से साजिश बेनकाब हो गई।बंगाल के नवजागरण के अगुआ समाज सुधारक विद्यासागर जी को बंगाल के नागरिक देवता की तरह मानते हैं। जिनको बंगाल के सबसे बड़े संत रामकृष्ण परमहंस जी ने भी सम्मान दिया हो, जब उनका अपमान होगा तो बंगाली कभी चुप नहीं बैठ सकता। धर्म के ठेकेदार बने भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनकी मूर्ति तोड़कर समाज को तोड़ने का काम किया। यह नफरत पैदा करने वाली थी, जो हिंसा में बदली। इस घटना की निंदा के बजाय भाजपा नेताओं ने इसे सियासी रूप देकर वोट बटोरने की असफल कोशिश की। इसी तरह भाजपा ने आतंकी हमले के मामले में आरोपित प्रज्ञा ठाकुर को लोकसभा का प्रत्याशी बनाकर कट्टरपंथ को बढ़ावा देने का काम किया।

प्रज्ञा के खिलाफ अदालत में आरोप तय हो जाने के बाद भी बीमारी का बहाना करके इलाज के नाम पर जमानत ली गई। इलाज हो रहा है या नहीं मगर वह चुनाव जरूर लड़ रही है। उसने अपने आचरण के अनुकूल भारत देश के निर्माता महात्मा गांधी के हत्यारे का महिमा मंडन करते हुए उसे देशभक्त और पुरुषार्थी बताया। अगर 79 वर्ष के गांधी की हत्या करना पुरुषार्थ है, तो उससे घिनौना नहीं हो सकता है। यह पहली बार नहीं हुआ। इस आतंकी महिला ने पहले भी कई बार नफरत फैलाने वाला जहर उगला है। इसके बावजूद भाजपा ने कोई सख्त कदम नहीं उठाया। जब भाजपा का राष्टÑीय अध्यक्ष अमित शाह महात्मा गांधी को चतुर बनिया कहता है तो फिर उससे ऐसे शब्दों के प्रयोग को रोकने की उम्मीद बेमानी है। बंगाल को मिनी पाकिस्तान बताने वाली भाजपा के नेताओं ने चुनाव के दौरान केरल में भी ऐसे ही बवाल खड़े किये थे। इस तरह की घटनायें करके कट्टरवादी भावनाओं को भुनाने की कोशिश होती रही है।

प्रज्ञा सिंह ही नहीं सांसद सच्चिदानंद साक्षी और निरंजन ज्योति से लेकर अजय सिंह बिष्ट (योगी आदित्यनाथ), तक ने कट्टरपंथ के जरिए समाज में जहर बोया है। जिनके कारण कई बार सांप्रदायिक हिंसा भी हुई है। यही करके ये लोग वोट बैंक बनाते हैं। लोकतंत्र की भावनाओं के विपरीत इस तरह की हरकतें करने वालों को हतोत्साहित करने के बजाय विश्व के सबसे बड़े सियासी दल होने का दम भरने वाली पार्टी उन्हें प्रोत्साहित करती है। देश के प्रधानमंत्री सहित अन्य मंत्रियों और सांसदों से उम्मीद की जाती है कि वे नैतिक रास्ते अपनाएंगे मगर वे सिर्फ ढकोसले के लिए ऐसा करते हैं। उसका कोई मायने नहीं रखता। उदाहरण गोहत्या के नाम पर होने वाली भीड़ के हमले रहे हैं।

पीएम मोदी ने दिखावे के लिए बोला मगर किया कुछ नहीं, क्योंकि यह वोट बैंक बना रहा था।हमें याद है कि जब अलीगढ़ और मेरठ नगर निगम में मेयर ने वंदेमातरम स्वैच्छिक करने का आदेश दिया तो भाजपा के लोगों ने तोड़फोड़ से लेकर हमले तक किये थे, मगर जब प्रधानमंत्री के मंच पर ही बिहार के मुख्यमंत्री नितिश कुमार और जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने उठना भी जरूरी नहीं समझा तो मोदी ने उनके साथ रहते वंदे मातरम कहना ही बंद कर दिया। स्पष्ट है कि यह सिर्फ वोटबैंक के लिए पढ़ा जाता है। नफरत पैदा करके कुछ भी मनगढ़ंत बोलने की परंपरा हो गई है। जैसे एक रैली में मोदी ने कहा कि कांग्रेस के नेताओं ने उन्हें गंदी नाली का कीड़ा, गंगू तेली, पागल कुत्ता, रेबीजयुक्त बंदर सहित तमाम गालियां दीं। प्रधानमंत्री जैसे ओहदे पर बैठा व्यक्ति अगर इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करता है तो निश्चित रूप से दुखद स्थिति उत्पन्न करने वाला है। ऐसे शब्द और नफरत की भाषा सिर्फ सियासी फायदे के लिए इस्तेमाल हो रही है।

यह किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकती। पहले झूठ बोला जाता था मगर अब झूठी कहानियां और इतिहास सुनाकर नफरत को फैलाया जा रहा है।सबसे अधिक दुख तब होता है, जब चुनावी फायदे के लिए ऐसे गंदे शब्दों और नफरत के बीज बोने का काम डंके की चोट पर होता है। सुव्यवस्था और निष्पक्षता के लिए जिम्मेदार चुनाव आयोग खामोश रहता है। चुनाव आयोग ने एक पार्टी एजेंट की तरह काम किया। उसने व्यवस्थाओं को नियंत्रित करने पर जोर नहीं दिया बल्कि विरोधी दल के नेताओं को भाजपा को फायदा दिलाने के लिए कुचलने का काम किया। दुख तब और हुआ जब चुनाव आयोग ने खराब कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए संविधान में प्रदत्त विशेष शक्ति का इस्तेमाल करके वक्त से पहले चुनाव प्रचार रोकने का आदेश दिया मगर उस वक्त तक प्रचार करने की छूट दी जब तक पीएम मोदी की रैली न संपन्न हो जाये।

पीएम बनने के बाद पहली बार प्रेस कांफ्रेंस में शामिल हुए मोदी ने खुद सिर्फ मन की बात की और पत्रकारों के सवालों पर मौन साधे रखा। उन्होंने मन की बात में जो बोला वह देश का दुर्भाग्य है कि उनके पीएम बनने के वक्त सट्टा लगा था जिसमें सट्टेबाजों को भारी नुकसान हुआ था। मोदी यह बताने की हिम्मत नहीं जुटा सके कि सट्टा कानूनन अपराध है और उन पर उन्होंने क्या कार्रवाई की? उन्होंने यह खुलासा भी किया कि उनका हर स्टेप, एक्शन और रैली की योजना नतीजों को सोचकर बहुत पहले ही कर ली जाती है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि नफरत के बीज भी उसमें शामिल होते होंगे। लोकतंत्र का ऐसा विद्रुप चेहरा भी देखना पड़ेगा? यह हमने कभी नहीं सोचा था। क्या लोकतंत्र पर गर्व करके हम गलत साबित होंगे! हम जिस लोकतंत्र पर गर्व करते थे, वह तो ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ वाला था। आज लोकतंत्र नफरत और हिंसा फैलाने वाला बन गया है। अभी भी वक्त है हम सोचें, चिंतन करें। नेता और दल तो अपने फायदे के लिए कुछ भी करने की कोशिश करेंगे ही। दोष उन नेताओं और दलों से अधिक हमारा है कि हम उन्हें चुनकर भेज रहे हैं। हमारा जनसमर्थन ही उनकी ताकत है। अगर हम ऐसे नेताओं और दलों को लज्जित करना शुरू कर दें, तो शायद फिर से लोकतंत्र पर गर्व किया जा सके। हमारी भावी पीढ़ी नफरत और भय में नहीं बल्कि मस्ती में जियेगी। तो फिर जागिये, उठिये और रोक दीजिए नफरत की हवाओं को, एक नई उम्मीद के साथ।

जय हिंद।

अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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