Home खास ख़बर Special on the birth anniversary-Faisal Ahmed Faiz: जयंती पर विशेष -लोकतांत्रिक मूल्यों के पैरोकार फैज अहमद फैज

Special on the birth anniversary-Faisal Ahmed Faiz: जयंती पर विशेष -लोकतांत्रिक मूल्यों के पैरोकार फैज अहमद फैज

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नवीन शर्मा

फैज अहमद फैज आधुनिक ऊर्दू शायरों में से सबसे संजिदा शायर कहे जा सकते हैं।
वे इश्क के रंगों को भी अपनी नज्मों में बखूबी बयां करते थे। कुछ रंग आपके पेशे नजर हैंं।

उठकर तो आ गये हैं तेरी बज्म* से मगर
कुछ दिल ही जानता है कि किस दिल से आये हैं।

तुमने देखी है वो पेशानी* वो रूखसार*, वो होंठ
जिन्दगी जिनके तसव्वर* में लुंटा दी मैंने

तुम्हारी याद के जब जख्म भरने लगते है
किसी बहाने तुमको याद करने लगते हैं

यह बाजी इश्क की बाजी है जो चाहे लगा दो डर कैसा
गर जीत गये तो कहना क्या, हारे भी तो बाजी मात नही।

दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लंबी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है।

नजर में दल के उभरते हैं, दिल के अफसाने
यह और बात है कि दुनिया नजर न पहचाने।
गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

क़फ़स उदास है, यारो सबा से कुछ तो कहो

कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

सत्ता से निडर आवाज

सत्तानशीनों की फितरत होती है कि वे तानाशाही विकसित करते हैं फ़ैज़ के दौर में भी ऐसा हुआ।उन्हें जेल में डाला गया. जेल में उन्होंने फिर लिखा. उन्हें फिर जेल में डाला गया।

बंटवारे के बाद दंगों का दंश
पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में आजादी तो आई पर बंटवारा लेकर। उससे भी बदतर व खतरनाक दंगे लेकर। हिंदू और मुसलमान भाइयों को आपस में मार-काट रहे थे. सभी को लगा कि यह तो वह है ही नहीं, जिसकी हमने ख़्वाहिश की थी. फ़ैज़ को भी यही लगा था-

ये दाग़ दाग़-उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर

वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं

ये वो सहर तो नहीं जिसकी आरज़ू लेकर

चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ इसलिए खास हैं क्योंकि उनकी कविता पूरी दुनिया की लोकतांत्रिक सरकारों से जन-हितैषी होने की अपेक्षा करती है।इसी के साथ वे जनता को उद्बोधित भी करते हैं. फ़ैज़ के लिए बोलना ज़िंदा होना है. थोड़े से समय में बात भी कह देनी है-

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

बोल ज़बां अब तक तेरी है

तेरा सुतवां जिस्म है तेरा

बोल कि जां अब तक तेरी है

बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है

जिस्म-ओ-ज़बां की मौत से पहले

बोल कि सच ज़िंदा है अब तक

बोल जो कुछ कहना है कह ले

विश्व नागरिक फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फ़ैज़ एक व्यापक अर्थ में वे विश्व नागरिक थे लेकिन उनके अंदर अपने देश का बोध सदा बना रहा.
वे जो कहना चाह रहे थे, उसे कहने के लिए उन्हें ‘देश की संरचना के भीतर’ वे जगहें या अवसर नहीं उपलब्ध हो पा रहे थे जिसकी उन्हें दरकार थी. वे अपना देश छोड़कर दूसरे देश गए। फ़ैज़ की शायरी उनकी पत्रिका ‘लोटस’ के द्वारा फिलिस्तीन, बेरुत और अफ्रीका के नामालूम लोगों तक पहुंची. वास्तव में फ़ैज़ लोकतंत्र और आज़ादी के कवि थे. वे भला एक देश में बंधकर कैसे रह सकते थे!

जो इश्क़ करते हैं, उन्हें ज़रूरत है फ़ैज़ की. जिन्हें दूसरों के सहारे की जरूरत है या जो दूसरों को सहारा देना चाहते हैं-

तुम मेरे पास रहो

मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो

जब कोई बात बनाए न बने

जब न कोई बात चले

जिस घड़ी रात चले

जिस घड़ी मातमी सुनसान, सियाह रात चले

पास रहो

मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो

फ़ैज़ की जरूरत उन्हें भी है जो सोचते हैं कि एक दिन दुनिया बदल जाएगी और जनता का राज होगा. तमाम तरह की बेड़ियां टूट जाएंगी-

हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन

कि जिसका वादा है

जो लौहे-अज़ल में लिखा है

जब ज़ुल्मो-सितम के कोहे गरां

रुई की तरह उड़ जाएंगे.

कहते हैं कि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के इस लेखन से पाकिस्तान के हुक्मरान बड़े नाराज थे।1985 में इक़बाल बानो ने लाहौर के हज़ारों लोगों के सामने इसे गाया था।फैज़ की शायरी भी हिम्मत बंधाने वाली शायरी थी.

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