Home संपादकीय So is the judiciary really in danger?: तो क्या सच में न्यायपालिका खतरे में है?

So is the judiciary really in danger?: तो क्या सच में न्यायपालिका खतरे में है?

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भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका इतनी कमजोर नहीं है। यही एक संस्था है जहां पर लोगों का विश्वास है। हां यह भी जरूर है कि इसी संस्था के सर्वोच्य पदों पर बैठे लोगों पर भी एक बार नहीं, बल्कि कई बार अंगुली उठी है। कई रिटायर्ड जज भी यौन शोषण के आरोपों में घिर चुके हैं।
भारतीय जनता पार्टी के पांच साल की सरकार में बहुत कुछ ऐसा हुआ जिसे पहली बार देखा और महसूस किया गया। पहली बार देश के लोगों ने नोटबंदी को इतने करीब से महसूस किया। पहली बार जीएसटी टैक्स लगाया गया। पहली बार सर्जिकल और एयर स्ट्राइक की चर्चा इतनी जोर शोर से हुई। पहली बार विदेशों में भारतीय प्रधानमंत्री की इतनी गूंज देखने को मिली। पर इसी पांच साल में कुछ ऐसा भी हुआ जो नहीं होना चाहिए था। पहली बार सुप्रीम कोर्ट के जजों ने मीडिया के सामने आकर अपना दुखड़ा रोया और कहा कि न्यायापालिका खतरे में है। यह पहली बार हुआ कि भारत की सर्वोच्य जांच एजेंसी सीबीआई में इतना बड़ा धमासान हुआ। नंबर एक और दो की लड़ाई को पूरे देश ने देखा। केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) में अहम की लड़ाई भी सार्वजनिक मंच पर आई। रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया और भारत सरकार की तकरार को पूरे देश ने महसूस किया। लोकसभा में मनी बिल का प्रयोग पहली बार हुआ। अब नई सरकार किसकी होगी इसका फैसला 23 मई को हो जाएगा। पर नई सरकार के गठन से पहले भी 20 अप्रैल का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐतिहासिक बन गया। पहली बार चीफ जस्टिस आॅफ इंडिया पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा और बकायदा इसकी सुनवाई भी हुई। सुनवाई भी चीफ जस्टिस आॅफ इंडिया की बेंच ने किया। इस सुनवाई ने भी मंथन करने पर मजबूर कर दिया है कि क्या सच में न्यायपालिका खतरे में है? क्या सच में इसकी शक्तियों को कम करने का प्रयास किया जा रहा है।
दरअसल चीफ जस्टिस आॅफ इंडिया रंजन गोगई के खिलाफ एक महिला ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। उस महिला ने बकायदा सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों को अपना हलफनामा भेजकर अपनी बात कही है। यह आरोप इतने गंभीर हैं कि अगर इस पर गौर किया जाए तो बात बहुत दूर तलक जाती है। फिलहाल सीजेआई रंजन गोगोई, जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने शनिवार को ही इस मामले की सुनवाई भी की। बेंच ने निर्णय लिया है कि चीफ जस्टिस के खिलाफ आरोपों पर एक उचित बेंच (अन्य जजों की बेंच) सुनवाई करेगी। साथ ही साथ कोर्ट ने यह भी कहा है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बेहद गंभीर खतरे में है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच द्वारा की गई यह टिप्पणी कोई साधारण टिप्पणी नहीं है। इसके कई मायने हैं। क्योंकि चीफ जस्टिस रंजन गोगई ने अपने ऊपर लगे आरोपों को निराधार बताते हुए कहा है कि कुछ अहम सुनवाइयों से उन्हें रोकने के लिए उनके खिलाफ यह बड़ा षडयंत्र रचा गया है। रंजन गोगई ने शनिवार को हुई विशेष सुनवाई पर भी कहा है कि मैंने अदालत में बैठने का असामान्य और असाधारण कदम उठाया है क्योंकि चीजें बहुत आगे बढ़ चुकी हैं।…न्यायपालिका को बलि का बकरा नहीं बनाया जा सकता। कोई बड़ी ताकत सीजीआई के कार्यालय को निष्क्रिय करना चाहती है।
पर मंथन करने की जरूरत है कि क्या न्यायपालिका इतनी कमजोर है कि एक महिला अपने आरोपों से उसका वजूद खत्म कर सकती है। क्या हमारा न्यायतंत्र इतना डरा हुआ है कि किसी ने आरोप लगाया और हम खतरे में आ गए। देश भर में हर दिन सैकड़ों केस दर्ज होते हैं जिसमें महिलाओं द्वारा दहेज उत्पीड़न से लेकर रेप, गैंग रेप की शिकायत की जाती है। इन आरोपों में प्रतिशत मामले फेक पाए जाते हैं। जबकि कई में हमारी न्यायपालिका द्वारा ही गंभीर सजा का प्रावधान तक है। कई बार फांसी की सजा तक सुनाई गई है। ऐसे में अगर एक महिला ने चीफ जस्टिस आॅफ इंडिया पर सवाल उठाया है तो यह गंभीर होने के साथ-साथ हमारे न्यायतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती है कि वह इस मामले को कैसे लेती है।
इस मामले में निश्चित तौर पर सीजेआई रंजन गोगई की तारीफ बनती है। न्यायतंत्र और लोकतंत्र में 20 अप्रैल के दिन को उन्होंने ऐतिहासिक बना दिया। उन्होंने खुद इस मामले कि न केवल सुनवाई की, बल्कि नई बेंच बनाने का निर्देश भी दिया जो इस मामले की निष्पक्ष सुनवाई करे। हमारे न्यायतंत्र और लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि इसमें हर किसी की सुनवाई हो सकती है। न कोई बच सकता है और न कोई खुद को भगवान मानने की गलती कर सकता है। रंजन गोगई ने अपने खिलाफ जांच करने का निर्देश देकर बड़ा कदम तो उठाया है, लेकिन साथ ही यह बात कहकर कि न्यायपालिका को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है, न्यायपालिका की शक्ति को कम आंकने का काम किया है।
भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका इतनी कमजोर नहीं है। यही एक संस्था है जहां पर लोगों का विश्वास है। हां यह भी जरूर है कि इसी संस्था के सर्वोच्य पदों पर बैठे लोगों पर भी एक बार नहीं, बल्कि कई बार अंगुली उठी है। कई रिटायर्ड जज भी यौन शोषण के आरोपों में घिर चुके हैं। यहां तक की सुप्रीम कोर्ट के दो पूर्व जज -जस्टिस एके गांगुली और जस्टिस स्वतंत्र कुमार पर भी यौन शोषण के आरोप लग चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अशोक कुमार गांगुली को तो पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा तक देना पड़ गया था। जब जस्टिस स्वतंत्र सिंह पर आरोप लगे थे तब उस वक्त एडिशनल सॉलिसिटर जनरल इंदिरा जय सिंह का कहना था कि जस्टिस स्वतंत्र कुमार पर लगा आरोप जस्टिस एके गांगुली पर लगे आरोप से ज्यादा गंभीर है, क्योंकि जिस वक्त का मामला है उस वक्त स्वतंत्र कुमार सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में काम कर रहे थे।
इससे पहले जस्टिस सौमित्र सेन देश के ऐसे पहले जज रहे थे जिन पर राज्यसभा में वित्तीय गड़बड़ी के आरोप में महाभियोग तक चलाया गया था। कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस सौमित्र सेन पर स्टील अथॉरिटी आॅफ इंडिया और शिपिंग कॉरपोरेशन आॅफ इंडिया के बीच एक मुकदमे में रिसीवर के तौर पर 32 लाख रुपए की वित्तीय गड़बड़ी का आरोप लगा था। तीन जजों के एक पैनल ने 2008 में उन्हें दोषी भी पाया। उस वक्त सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस केजी बालाकृष्णन ने सेन पर महाभियोग चलाए जाने की सिफारिश प्रधानमंत्री से की थी। अगस्त, 2011 में राज्यसभा में महाभियोग का प्रस्ताव बहुमत से पारित हो गया। लोकसभा में महाभियोग का प्रस्ताव पास होने से पहले सितंबर, 2011 में सेन ने इस्तीफा दे दिया।
दिल्ली हाईकोर्ट के जज रहे जस्टिस शमित मुखर्जी को तो 2003 में सीबीआई ने करोड़ों रुपए के जमीन घोटाले में उन्हें गिरफ्तार तक कर लिया था। किसी जज की पद पर रहते हुए गिरफ्तारी का वह पहला मामला था। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एके गांगुली पर एक लॉ इंटर्न ने यौन शोषण का आरोप लगाया था। यह घटना 24 दिसंबर, 2012 की है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तीन जजों की एक समिति को जांच करने को कहा। समिति ने गांगुली के व्यवहार को अनुचित बताया। केंद्र सरकार ने भी गांगुली के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश राष्ट्रपति के पास भेज दी। राष्ट्रपति ने इसे सुप्रीम कोर्ट के पास भेज दिया। सिक्किम हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस पीडी दिनाकरन को भी जुलाई, 2011 में भ्रष्टाचार के आरोप में अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। 2009 में बार काउंसिल आॅफ इंडिया के कई सदस्यों ने आरोप लगाया था कि दिनाकरन ने तमिलनाडु स्थित अपने गृह नगर अराकोनम में खूब संपत्ति बनाई है।
कहने का तात्पर्य बस इतना भर है कि हमारी न्यायपालिका को संविधान ने बेहद सख्त और ताकतवर बना रखा है। पर इसी संविधान ने यह भी व्यवस्था दे रखी है कि न्याय के सर्वोच्य पदों पर बैठे लोग भी मनमानी नहीं कर सकते हैं। आज अगर सीजेआई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा है तो इसकी जांच होगी। जांच में आरोप सही पाया जाता है या झूठा इसका फैसला तो आने वाला वक्त तय करेगा। पर यह कहना कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में है यह बेहद अटपटा है। भारतीय न्यायतंत्र का यही सबसे मजबूत आधार है कि न्यायतंत्र के सर्वोच्य पद पर बैठे व्यक्ति की भी जांच हो सकती है। यही मजबूती भारत के करोड़ों लोगों को हौसला देती है कि उन्हें कोई परेशानी है तो वे न्यायपालिका की ही शरण में जाते हैं।

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