Home विचार मंच Slow-social: स्लो-सोशल

Slow-social: स्लो-सोशल

14 second read
0
0
174

बचपन में एक कहानी पढ़ते थे डाकू ऊंगलीमाल। वो राहगीरों को लूटता तो था ही, उसकी ऊंगली भी काट लेता था। लोगों में खौफ पैदा करने के लिए वो उन ऊंगलियों की माला को गले में पहने रखता था। एक दिन महात्मा बुद्ध उस राह से गुजरे। डाकू ऊंगलीमाल ने आवाज दी ठहर जाओ। बुद्ध चलते गए। वो फिर चिल्लाया ठहर जाओ। कोई असर होता न देख वो कटार हाथ में ले उनके सामने आ कूदा। क्रोध से पूछा ठहरते क्यों नहीं? बुद्ध मुस्कुराए। बोले मैं तो ठहर गया, तुम कब ठहरोगे। डाकू ऊंगलीमाल को बात समझ आ गई। कटार महात्मा बुद्ध के चरणों में डाल दिया।
सवाल ये है कि सोशल मीडिया में घुसे रहने वाले कब ठहरेंगे? आदमी एक चेतन जीव है। रचनात्मक है। अन्य जानवरों की तरह इसे प्रकृति की सीमाओं में बंधना गंवारा नहीं। दुनियांभर के औजार बनाकर पृथ्वी ग्रह का निरंकुश तानाशाह बन बैठा है। सैकड़ों-गुना फुर्तीले और ताकतवर जानवर या तो विलुप्त हो गए हैं या इसका दिया खाते हैं। अनाज उगाने के लिए वर्णशंकर बीज बनाए। पैदावार बढ़ाने के लिए खाद बनाया। पेट तो भरे ही, गोदाम भी भरने में जुट गया। जब खा-खाकर फटने लगा तो ‘स्लो फूड’ मूवमेंट चला डाला थोड़ा खाओ, शुद्ध खाओ, धीरे-धीरे खाओ। उसी तरह इसने टीवी बनाया।
कहीं की चीज कही देखो। समस्या तब खड़ी हो गई जब इसपर रीएलिटी शो चलना शुरू हो गया। दूसरों के घर में ताक-झांक के शौकीन सब-कुछ छोड़ टीवी के आगे जम गए। फिर किसी भले मानुस ने स्लो टीवी की मुहिम छेड़ी भाई टीवी ही देखते रहोगे या कुछ करोगे भी। लत है, वैसे तो छूटेगी नहीं। केबल ही कटवा डालो। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा तक अपने भाषणों में गुहार लगाते थे कि नेटफलिक्सिंग छोड़ो, लोगों से मिलो-जुलो।
इंटरनेट एक मिलिटेरी तकनीक है। शीत युद्ध के दिनों में अमेरिकियों ने सुरक्षित आपसी संवाद के लिए इसे बनाया था। लेकिन जानकारी एक जगह कहां ठहरती है। जल्दी ही इसे आम लोगों को भी बेचा जाना लगा। इसने सूचनाओं का आदान-प्रदान इतना आसान कर दिया कि लोग टूट पड़े। सरकार और व्यापारी भी पिल पड़े। सबको फोमो हो गया, फियर आॅफ मिसिंग-आउट। सरकारें अंतरिक्ष में दनादन उपग्रह भेजने लगी। वैज्ञानिक इस जुगत में भिड़ गए कि इंटरनेट की रफ्तार और इसके डाटा ट्रांसमिशन क्षमता को कैसे बढ़ाया जाए। कम्प्यूटर को आकर्षक, ताकतवर और फुर्तीला कैसे बनाया जाए। इसने जिंदगी कुछ ऐसे बदली कि कहने वालों ने इसे चौथी औद्योगिक क्रांति का नाम दे दिया।
मौके पर चौका मारने वाले कहां रुकते हैं? कोशिश में तो कई लगे थे लेकिन लॉटरी फेसबुक की खुली। पहले तो बनी इसलिए थी कॉलेज के लड़के चुगली-चाटी कर सकें। लेकिन इंटरनेट की बढ़ती क्षमता और पहुंच ने इसे सबके लिए खोल दिया। अपनी सुनाने को आतुर दुनियांभर के लोगों ने जी भर कर एकाउंट खोला। अपनी-अपनी रीएलिटी टीवी खोल कर बैठ गए। एक आंकड़े के मुताबिक अब तक 250 करोड़ के आसपास इधर जम चुके हैं। 140 करोड़ के आसपास इस पर रोज अपनी राम कहानी सुनाते हैं। इनको खबर भी नहीं है इनकी दी गई सूचना फेसबुक अरबों-खरबों में बेच रहा है। कम्पनियां और सत्ता के सौदागर इसका इस्तेमाल इंद्रजाल बुनने में कर रहे हैं।
लोग सोचते हैं कि वे सोच-समझकर फैसला कर रहे हैं। उन्हें पता ही नहीं होता कि बिग डेटा और आर्टिफिशल इंटेलिजेन्स उनको उनसे भी ज्यादा जानता है और उनको दिमाग को हैक करने में लगा हुआ है। अब तो डेटा नेशनलिजम की मुहिम चल पड़ी है। हमारे लोगों के डेटा का सर्वर हमारे देश में ही होना चाहिए। न्यूट्रल इंटरनेट की पैरवी भी चल पड़ी है। रोटी, कपड़ा और मकान की तरह इंटरनेट एक मौलिक अधिकार है। अमेरिका का इसपर से एकाधिकार खत्म होना चाहिए। फेसबुक महाद्वीप की 250 करोड़ की नागरिकता से घबराए लोग कहते हैं कि एक आदमी के हाथ में इतना पावर ठीक नहीं। इसे तीन-चार कम्पनियों में तोड़ देना चाहिए। भारत में भी सरकारों ने इंटरनेट को फैलाने में बड़ी फुर्ती दिखाई। सोच थी कि लोगों की बुद्धि बढ़ेगी, उनका दुनियां से सम्पर्क होगा, कारोबार-रोजगार के नए दरवाजे खुलेंगे। ऐसा हो भी रहा है। लेकिन इंटरनेट पर सवार होकर सोशल मीडिया भी, विशेषकर फेसबुक, हर कम्प्यूटर, टैब, मोबाइल फोन तक पहुंच गई है।
यू-ट्यूब, व्हाट्सएप, इन्स्टाग्रैम, वी-चैट पर दनादन फोटो एवं वीडियो शेयर हो रहे हैं। अक्सर झूठ और अफवाह का बाजार गर्म रहता है। लोग काम-धाम छोड़ चार-पांच घंटे रोज इसी पर खराब करते हैं। टीवी-रेडियो छोड़ कम्पनियां भी इधर ही आ गई है। प्रमोशन और विज्ञापन के जरिए उन्हें खरीदार बनाने में लगी है। सब चांदी कूट रहे हैं। सिवाय सोशल मीडिया के नशेड़ी के। मनोवैज्ञानिको का कहना है कि इससे चिंता, तनाव, ईर्ष्या और डिप्रेशन जैसी बीमारियों को हवा मिलती है। इधर बदमाश भी चढ़ आए हैं। लोगों को रोज ठगी, मुंहजोरी और प्रताड़ना का शिकार बना रहे हैं। ऐसे में ‘स्लो सोशल’ अभियान जोर पकड़ रहा है। इनका कहना है कि सोशल मीडिया पर कम से कम समय लगाएं। ये वास्तव की दुनियां का विकल्प नहीं है। सोशल मीडिया कम्पनियां भी स्पीड-बे्रकर लगा रही है।
व्हाट्सएप अब एक समय पाच से अधिक लोगों को फॉर्वर्ड नहीं करने देती। बाकी भी याद दिलाती रहती है कि बहुत हो गया, थोड़ा ब्रेक ले लो। इनको डर है कि शराब-सिगरेट कम्पनियों की तरह कहीं ये भी बदनाम न हो जाएं और सोने का अंडा देने वाला यूजर कहीं टें न बोल जाय। समय आ गया है कि सोशल मीडिया के मारे ‘जोमो’ का लुत्फ लें – जॉय आॅफ मिसिंग-आउट।
ओम प्रकाश सिंह
(लेखक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं।)

Load More Related Articles
  • Where has customer gone? कहां गए कस्टमर?

    अखबारों का रंग आजकल कुछ बदला-बदला सा है। विशेष कर अंग्रेजी भाषियों का। देश-विदेश के आर्थिक…
  • Dil Jo kahe: दिल जो कहे

    क्या करना ठीक है और क्या नहीं इस बात पर बहस होती ही रहती है। वाद-प्रतिवाद होता रहता है। लो…
  • ‘Base’less Social media: ‘आधार’हीन सोशल मीडिया

    इसमें कोई दो राय नहीं है कि सोशल मीडिया की समस्या गंभीर है। लोग तो आमने-सामने भिड़ जाते हैं…
Load More By OmPrakash Singh
Load More In विचार मंच

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

Where has customer gone? कहां गए कस्टमर?

अखबारों का रंग आजकल कुछ बदला-बदला सा है। विशेष कर अंग्रेजी भाषियों का। देश-विदेश के आर्थिक…