Home संपादकीय Separatists needed some similar surgical strikes: अलगाववादियों पर कुछ ऐसी ही सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत थी

Separatists needed some similar surgical strikes: अलगाववादियों पर कुछ ऐसी ही सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत थी

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जम्मू कश्मीर की समस्या ऐसी नहीं थी जैसी यहां बना दी गई। इन समस्याओं के इतिहास को खंगाला जाए तो जड़ में कुछ ऐसे लोग मिलेंगे जिन्होंने एक अलग तरह की राजनीति की और धीरे-धीरे मजबूत होते गए। ये लोग सभ्य भाषा में अलगावादी कहलाए। पर इन्हें आतंकवादी भी कह दें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। आज भारत सरकार इन अलगावादियों के खिलाफ कड़े कदम उठा रही है। इनके संगठनों को बैन किया जा रहा है। इस बैन पर सिर्फ इसलिए सवाल उठाए जा रहे हैं क्योंकि इसकी टाइमिंग सही नहीं है। पर मंथन करने की जरूरत है कि क्या टाइमिंग पर राजनीति कर हम इस प्रहार के फोर्स को कमजोर नहीं कर रहे। क्या इस तरह की राजनीति कर हम फिर से कश्मीर से धोखा नहीं कर रहे हैं। हर बात और कार्रवाई को राजनीतिक दृष्टिकोण से देखना उचित नहीं है।
भारत सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ बड़ा कदम उठाने का फैसला पुलवामा अटैक के बाद ही ले लिया था। न केवल विदेश नीति के तहत पाकिस्तान को घेरने की रणनीति तैयार की गई, बल्कि देश के अंदर छिपे बैठे गद्दारों के खिलाफ भी खुलकर कार्रवाई की गई। इस तरह की कार्रवाई की उम्मीद पूरे देश सहित जम्मू-कश्मीर के लोग भी कर रहे थे।
जब 2014 में बीजेपी की सरकार बनी थी उसी समय से लोग इस बात का इंतजार कर रहे थे कि सरकार कश्मीर के मुद्दे पर बड़ी कार्रवाई करेगी। पर सत्ता की लोलुपता ने बीजेपी के भी कदम रोक दिए थे। कश्मीर में सत्ता की लोलुपता इतनी अधिक थी कि वहां वैसे दल से गठबंधन किया गया जो हमेशा से ही अलगाववादियों के प्रति नरम रवैया रखती थी। परिणाम पूरे देश ने देखा। चंद महीनों के बाद ही बीजेपी की रणनीति ऐसी कमजोर हुई कि हर तरफ पार्टी को आलोचना झेलनी पड़ी। जैसा अनुमान लगाया जा रहा था ठीक वैसा ही हुआ। बेमेल का गठबंधन अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सका। और लंबे समय से वहां राष्टÑपति शासन लगा हुआ है।
इन सबके बीच जम्मू कश्मीर में बीजेपी ने अपना जनाधार बूरी तरह खोया। क्योंकि वहां के स्थानीय लोग जहां बीजेपी से बड़ी उम्मीद लगाए बैठे थे उन्हें घोर निराशा हुई। उन्हें उम्मीद थी कि कश्मीर की समस्या की जड़ में बैठे अलगाववादियों के खिलाफ सरकार कठोर कार्रवाई करेगी। पर ऐसा संभव नहीं हो सका। अलगावादियों के खिलाफ छिटपुट कार्रवाई तो हुई, लेकिन उनकी सेहत पर कोई असर नहीं हुआ। उनकी सेहत पहले की तरह ही रही। वे खाते भारत का थे। पर गाते पाकिस्तान का थे। पासपोर्ट उन्हें भारत सरकार का चाहिए, लेकिन उसी पासपोर्ट के आधार पर पाकिस्तान जाकर भारत के खिलाफ साजिश रची जाती थी। भारत सरकार से सारी सुविधाएं भी चाहिए होती थी, फंड भी मिलता था, लेकिन विदेशी मुद्रा रखकर आतंकवादियों के टेरर फंडिंग में खुलकर सहयोग करते थे।

पर पुलवामा अटैक के बाद निश्चित तौर पर भारतीय राजनीति ने एक नई करवट ली है। पाकिस्तान के प्रति सॉफ्ट रणनीति को जहां एक तरफ तिलांजली दी गई, वहीं जम्मू कश्मीर की समस्या के मूल में बैठे लोगों पर भी शिकंजा कसना शुरू हुआ। सबसे पहले अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापस ली गई। टेरर फंडिंग के मामले में ईडी को कार्रवाई की पूरी छूट मिली। साथ ही ऐसे संगठनों पर प्रतिबंधित करने जैसा कड़ा कदम भी उठाया गया। इसी कड़ी में भारत सरकार ने शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता यासीन मलिक के संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) पर प्रतिबंध लगाया। आतंकवाद विरोधी कानून के तहत यह बड़ी कार्रवाई की गई है। इससे पहले जमात-ए-इस्लामी संगठन को भी प्रतिबंधित किया गया।
जो कदम आज उठाए गए हैं उसकी जरूरत काफी पहले से महसूस की जा रही थी। यासिन मलिक को कौन नहीं जानता है। घाटी में जब कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार शुरू हुआ था उसका अगुवा यही शख्स था। जम्मू कश्मीर का बच्चा-बच्चा जानता है कि किस तरह यासीन मलिक के नेतृत्व वाले जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने घाटी में अलगाववादी विचारधारा को हवा दी और यह 1988 से हिंसा और अलगाववादी गतिविधियों में सबसे आगे रहा है। पर अश्चर्य इस बात का है कि तुष्किरण की नीति ने जम्मू कश्मीर का बंटाधार किया। कश्मीरी पंडितों को चुन चुन कर मारा गया। उनकी बहू बेटियों के साथ बर्बरता की हदें पार की गई। उनके साथ इन अलगाववादियों ने जो बदसलूकी की उसकी हजारों कहानियां आज भी कश्मीर में सुनाई देती हैं। कश्मीर पंडितों को अपना घर बार छोड़कर दर बदर की ठोकरें खाने पर मजबूर होना पड़ा। पर विडंबना देखिए इतनी ज्याततियों के बाद भी यासिन मलिक जैसा ‘आतंकवादी’ न केवल भारत सरकार का दामाद बना रहा, बल्कि अपनी मनमर्जी करता रहा। इस शख्स के ऊपर 37 एफआईआर दर्ज हैं। यहां तक की इसके संगठन पर वायुसेना के दो अधिकारियों की हत्या तक का आरोप है। पर संगठन की सेहत पर कोई असर नहीं था। जम्मू कश्मीर पुलिस, सीबीआई सहित एनआईए तक ने यासिन मलिक के खिलाफ केस दर्ज कर रखा है। पर कार्रवाई अब जाकर हुई है।
यह तुष्टिकरण की किस तरह की राजनीति है इस पर मंथन करने की जरूरत है। भारत सरकार को आज होश आ रहा है। हमें पुलवामा में शहीद हुए उन 40 जवानों को दिल से नमन करना चाहिए कि उनके ही बहाने सही, कम से कम भारत सरकार अपनी कुंभकर्णी नींद से तो जगी। इसी बहाने कश्मीर के अलगावादी आतंकियों के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक की प्लानिंग तो हुई। राजनीति से ऊपर उठकर कार्रवाई तो की गई। हुर्रियत नेताओं सहित तमाम अन्य अलागावादी संगठनों पर कुछ ऐसे ही सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत है।
आज चुनाव के इस माहौल में भारत सरकार की कार्रवाई की टाइमिंग को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यह सवाल उठना लाजिमी ही है। क्योंकि जो कार्रवाई काफी पहले होनी चाहिए थी वह अब हो रही है। पर हमें इस बात से संतुष्ट होना चाहिए कि जब जागो तभी सवेरा। आज पूरे देश में रह रहे कश्मीरी विस्थापित बेहद खुश हैं। क्योंकि उनके अंदर उम्मीद जगी है कि अगर इन अलगावादियों पर सही तरीके से सर्जिकल स्ट्राइक हो गई तो देर सबेर उन्हें कश्मीर में वापस जाने का मौका मिलेगा। यह सच्चाई है कि देश के अंदर छिपे गद्दारों को अगर चिह्नित कर लिया गया तो कश्मीर से आतंकवाद का नामो निशान मिट सकता है। इन्हीं अलगावादियों की शह पर स्थानीय युवा सीमा पार से आए आतंकवादियों को सुरक्षा मुहैया करवाते हैं। इन्हीं अलगाववादियों द्वारा दिए जा रहे रुपयों की बदौलत पत्थर फेंकना शुरू करते हैं और इन्हीं के बहकावे में आकर आतंकवाद का रास्ता अख्तियार करते हैं।
सभी राजनीतिक दलों के अपने हित हैं। अपने एजेंडे हैं। अपनी बात है। पर जब बात देशहित की आती है तो सभी को एकजूट रहने की जरूरत है। भले ही इस वक्त माहौल चुनाव का है। पर कश्मीर की समस्या के मूल में बैठे लोगों पर कार्रवाई को तमाम राजनीतिक प्रतिद्वंदिता से ऊपर उठकर देखने की जरूरत है। चुनाव के बाद केंद्र में सरकार चाहे किसी भी दल की आए, लेकिन इन अलगावादियों के रूप में बैठे आतंकवादियों के खिलाफ इससे भी ज्यादा कड़े तेवर के साथ सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत है।

कुणाल वर्मा

kunal@aajsamaaj.com
(लेखक आज समाज के संपादक हैं)

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