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Security forces and military operations in electoral issues: चुनावी मुद्दों में सुरक्षा बल व सैन्य कार्यवाहियां

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लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान जो प्रमुख मुद्दे उभर कर आए हैं, उनमें एक मुद्दा सेना, सुरक्षा बल और सैनिक कार्यवाहियों का है। सुरक्षा बलों, यानी सेना, पुलिस, अर्ध सैनिक बलों पर सामूहिक चर्चा या जन चर्चा से कोई परहेज नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह सब तंत्र भी सरकार के अंग है और सुरक्षा, शांति व्यवस्था किसी भी सरकार की प्रथम प्राथमिकता होती है। पर 1952 के प्रथम आम चुनाव से लेकर 2019 के इस चुनाव के पहले तक सुरक्षा बल, पाकिस्तान और आतंकवाद कभी भी चुनाव के कोर मुद्दे नहीं रहे हैं। 1952 में देश का पहला चुनाव हुआ था। देश की अधिकतर जनता कम पढ़ी लिखी थी। कांग्रेस आजादी के आंदोलन की मुख्य धारा होने के कारण लोकप्रियता के शिखर पर थी। वैचारिक आधार पर समाजवादी खेमा तथा कम्युनिस्ट पार्टी थी। आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित जनसंघ एक राजनीतिक दल बन चुका था। राजा महाराजाओं वाला दक्षिणपंथी विचारधारा से प्रभावित एक अन्य दल था स्वतंत्र पार्टी। 1952 के चुनाव में कांग्रेस की सरकार बनी और जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने। 1957, 1962 तक चुनाव में राजनीतिक विचारधारा के आधार पर चुनाव सम्पन्न हुए। कांग्रेस लगभग अपराजेय ही रही।
1967 का चुनाव देश की तंद्रा तोड़ने वाला चुनाव था। 1962 में चीन के हाथों पराजय और 1965 में पाकिस्तान को पराजित करने की घटनाएं हो चुकी थी। 1967 का चुनाव गैरकांग्रेसवाद के मुद्दे पर लड़ा गया था। कांग्रेस का लंबा शासन हो चुका था और एंटी इनकंबेंसी फैक्टर जोरो पर था। डॉ.राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में सभी गैर कांग्रेसी दलों ने एक मोर्चा बनाया और केंद्र में तो कांग्रेस की ही सरकार रही, पर कुछ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं। लेकिन 1969 में कांग्रेस टूट गई और पुराने कांग्रेसी नेताओं को दरकिनार कर के इंदिरा गांधी ने अलग कांग्रेस की नींव डाली। यह कांग्रेस प्रगतिशील विचारधारा और कार्यक्रमों पर आधारित थी। यह कांग्रेस का वामपंथी स्वरूप था। राजाओं के प्रिवीपर्स समाप्त हो चुके थे। बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो चुका था। बुजुर्ग कांग्रेसियों को इंदिरा का यह बदलाव पसंद नहीं आया। 1971 में चुनाव का मुद्दा बना, जन सरोकार से जुड़े मुद्दों पर वोट मांगना। गरीबी हटाओ सबसे चर्चित और लोकप्रिय नारा बना। इंदिरा गांधी को अपार बहुमत मिला। उसी के कुछ बाद हुए भारत पाकिस्तान के युद्ध ने जिसमे बांग्लादेश का जन्म हुआ था, इंदिरा गांधी की लोकप्रियता को उच्चतम शिखर पर पहुंचा दिया था। वे निर्विकल्प समझ लीं गई थीं।
1977 का चुनाव, 1975 से 1977 तक लगे आपातकाल के बुरे अनुभवों के मुद्दों पर केंद्रित था। वह चुनाव एकाधिकारवाद के विरुद्ध था। वह चुनाव कांग्रेस बनाम विपक्ष कम, बल्कि कांग्रेस बनाम जनता अधिक था। इंदिरा खुद चुनाव हार गर्इं और कांग्रेस अपदस्थ हो गई। अपराजेयता और निर्विकल्पता का दंभ चूर चूर हो गया। 1980 का चुनाव जनता पार्टी के परफॉर्मेंस से अधिक जनता पार्टी के आपसी फूट के कारण एक स्थायी सरकार न दे पाने के मुद्दे पर लड़ा गया, जिसने इंदिरा गांधी की वापसी हुई। 1984 का चुनाव इंदिरा गांधी की हत्या से उपजे व्यापक सहानुभूति के मुद्दे पर हुआ। वह एक प्रकार से चुनावी श्रद्धांजलि थी। पर कांग्रेस को इतिहास में सबसे अधिक बहुमत 1984 में मिला। 1989 का चुनाव भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लड़ा गया। बोफोर्स घोटाले पर बीपी सिंह, जो राजीव गांधी सरकार में तत्कालीन रक्षा मंत्री थे ने बोफोर्स तोप खरीद मामले में दलाली के आरोप को मुख्य मुद्दा बनाया और उन्होंने जन मोर्चा नाम से एक अलग दल बना कर चुनाव लड़ा और वामपंथी दलों और भाजपा के सहयोग से वे प्रधानमंत्री बने। यह सरकार 1990 में गिर जाती है फिर चार महीने के लिए चंद्रशेखर कांग्रेस के समर्थन से पीएम बनते हैं। 1991 तक वह सरकार रहती है और फिर 1991 में पुन: चुनाव होता है और नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनती है, जो 1996 तक रहती है। इस चुनाव में भी मुख्य मुद्दा, अस्थिर सरकारें भी थीं। 1996 से 1999 तक कभी तीसरे मोर्चे की तो कभी भाजपा की अल्पजीवी सरकारें बनीं। फिर 1999 में भाजपा की सरकार बनी और उसने पांच साल के पहले ही चुनाव करा लिए, लेकिन भाजपा को हारना पड़ा और कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार 2004 में बनी, जो 2009 में दुबारा बनी। डॉ.मनमोहन सिंह दस साल प्रधानमंत्री रहे। 2014 के चुनाव में यूपीए सरकार के समय भ्रष्टाचार की शिकायतें और गुजरात मॉडल, संकल्पपत्र 2014 के वादे और विकास मुख्य मुद्दा बना और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को अपने दम पर बहुमत मिला। सरकार पांच साल से है और पुन: जनादेश के लिए जनता के सामने है।
2019 के मुद्दों में सरकार की तरफ से उसके पांचसाला कामधाम का रिकॉर्ड मुख्य रूप से रहना चाहिए था। संकल्पपत्र 2014 के विभिन्न वादे रहने चाहिए थे। नोटबंदी, जीएसटी, और अन्य उपलब्धियां जो सरकार द्वारा पिछले पांच साल से लगातार मास्टरस्ट्रोक कहकर प्रचारित की जाती रही हैं, जिसे जनता के सामने लाकर रखना चाहिए था, पर सरकार ने यह नहीं किया। प्रधानमंत्री के चुनावी भाषण में इन मुद्दों का और उन वादों का कोई भी उल्लेख नहीं होता है। इसके बजाय सारा फोकस सेना, सैनिक, सुरक्षा बल, और पाकिस्तान के ऊपर रहता है। 2019 के चुनाव में सेना सैनिक और पाकिस्तान मुद्दा बन कर उभरा है। क्या आतंकवाद मुद्दा नहीं है? क्या पाकिस्तान से आसन्न खतरा और कश्मीर में उसकी अनावश्यक दखल कोई मुद्दा नहीं है? क्या सैनिकों की शहादत कोई मुद्दा नहीं है? जब सेना को मुद्दा बनाने पर ऐतराज होता है, तो मोदी समर्थक ऐसे ही सवाल उठाते हैं, और ये सवालात प्रथम दृष्टया अपील भी करते हैं। पर इन सवालों पर चर्चा करने के पूर्व यह याद दिलाना भी जरूरी है कि 1962 के चीनी हमले में हार, और 1965 में लाल बहादुर शास्त्री के कुशल नेतृत्व में जीत के बावजूद,1967 के आम चुनाव में सेना मुद्दा नहीं बनी। जबकि,1962 में चीन के हाथों हुई हार ने हमे झिंझोड़ कर जगा दिया था। तीन साल में ही हमने एक बड़ी लड़ाई जीतने लायक सामर्थ्य पा लिया था। फिर भी 1962 की हार और 1965 की जीत पर 1967 का चुनाव नहीं लड़ा गया। मुद्दा था खाद्यान्न पर आत्मनिर्भरता का और अमेरिका से पीएल 480 के द्वारा आयातित खाद्यान्न का। डॉ.राममनोहर लोहिया जैसे प्रतिभाशाली और प्रखर विरोधी नेतृत्व के होते हुए भी सरकार कांग्रेस की ही बनी। जनहित और गैर कांग्रेसवाद मुख्य मुद्दा था। सेना चुनाव के केंद्रबिंदु में नहीं आ पाई।
1971 के युद्ध मे बांग्लादेश के बनने के बाद जो आम चुनाव हुआ, वह 1977 का था। लेकिन सेना की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि भी, 1977 के चुनाव में कोई मुद्दा नहीं बनी, क्योंकि उस स्वर्णिम जीत से भी बड़े मुद्दे नागरिक स्वतंत्रता, संविधान की रक्षा और लोकतंत्र बहाली का था। इन्ही मुद्दों पर इंदिरा गांधी को न केवल अपनी सरकार गंवानी पड़ी, बल्कि उन्हें खुद भी हार का सामना करना पड़ा। 1999 में करगिल के युद्ध के बाद 2004 का चुनाव हुआ। करगिल में भी भारत की विजय हुई थी। फिर भी तत्कालीन अटल सरकार ने सेना को कोई मुद्दा नहीं बनाया, बल्कि इंडिया शाइनिंग के नाम से अटल सरकार के छ: साल की उपलब्धियों को मुद्दा बनाया गया। यह अलग बात है कि वह चुनाव भाजपा हार गयी थी। इंडिया शाइनिंग को जनता ने नकार दिया। भारतीय सेना विश्व की कुछ गिनी चुनी प्रोफेशनल सेनाओं में से एक है। यह अब तक अराजनीतिक बनी हुई है। सेना में जातिगत आधार पर रेजिमेंट्स हैं, पर यह पूर्णत: धर्मनिरपेक्ष आज भी है। फौज की अपनी संस्कृति, सोच और परम्पराएं होती हैं। किसी भी राजनीतिक दल ने अब तक सेना में राजनीति का वायरस संक्रमित करने का काम नहीं किया पर 2019 के चुनाव में सेना चुनावी विवादों के केंद्र में आ गई। सेना और सुरक्षा बलों को उनकी उपलब्धियों पर राजनीतिक मुद्दा बनाया तो जाता है, पर जब जवान सेना और सुरक्षा बलों के अंदरूनी स्थिति के बारे में बातें सार्वजनिक करते हैं, तो उन समस्याओं से अक्सर मुंह चुरा लिया जाता है और अनुशासन की बात की जाती है। किसी भी सैन्य बल या सुरक्षा बल में अनुशासन का स्थान सर्वोपरि है, पर उन शिकायतों का क्या किया जाए, जो जवान अक्सर भोगते हैं। बीएसएफ जवान तेज बहादुर ने मेस के खाने की शिकायत की और फोटो तथा टेक्स्ट सोशल मीडिया पर भी डाला। यह एक अनुशासनहीनता का मामला था और इसकी उसे सजा भी मिली। पर जिस खराब खाने का जिक्र उसने किया था, क्या उसके बारे में कोई जांच की गई या यह पूरा मामला ही घोर अनुशासनहीनता का मानते हुए उसे सजा दे दी गई?
अक्सर कभी पाक प्रायोजित आतंकवाद के कारण, तो कभी नक्सलियों की आतंकी घटनाओं के कारण, सेना और केंद्रीय आर्म्ड पुलिस बल के जवान शहीद होते रहते हैं। उनके ताबूत, रीथ, और बलिदान मुद्दे तो बनते हैं, पर किन सुरक्षा चूकों के कारण उनको शहीद होना पड़ा यह बात चार दिन बाद ही भुला दिया जाता है। पठानकोट, उरी, पुलवामा, गढ़चिरौली के शहीद जवानों की जान किसकी गलती से गई, क्या यह चुनाव का मुद्दा नहीं बनना चाहिए? शहीदों का जो भावनात्मक दोहन हो सकता है वह करके शेष सब भुला दिया जाता है। चुनाव में जब सेना और सुरक्षा बल मुद्दा बनाया जा रहा है, तो सरकार को जवान की समस्याओं और सुरक्षा चूक को भी एक मुद्दा बनाया जाना चाहिए। शोक परेड, रीथ और बिगुल की लास्ट पोस्ट एक औपचारिकता होती है और औपचारिकताओं से जीवन नहीं चलता है। कर्तव्यपालन में हुई मृत्यु के आंकड़ों से कहीं अधिक जवान, अवसाद, बीमारी और अन्य कारणों से मरते हैं। चूंकि यह मृत्यु कर्तव्यपालन के दौरान नहीं हुई है, तो ऐसे जवानों को मृत्योपरांत लाभ जो मिलते हैं वे नहीं मिलते हैं। क्या सरकार ने इसे कभी मुद्दा बनाया है? कभी इस पर बहस हुई है कि कैसे जवानों की यह मौत हो रही है? मलेरिया और बीमारी का कारण, जवानों की प्रतिकूल हालात में तैनाती हो सकती है, पर अवसाद जन्य आत्महत्या का क्या कारण है? क्या इस विंदु पर किसी मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग या जांच की बात नहीं की जा सकती। चूंकि अनुशासन की बात और रेजीमेंटेशन की आदत घुट्टी में बैठ गई है कि इसपर बहुत बहस नहीं होती है। हालांकि, सेना और सुरक्षा बलों के कल्याणकारी कार्यों के लिए अच्छा खासा बजट रहता है, अस्पताल आदि की सुविधाएं भी रहती हैं, पर यह सवाल मैं इसलिए उठा रहा हूं कि जब उनकी उपलब्धियां को सरकार अपनी उपलब्धि बताकर प्रचारित करती है, तो जवानों की समस्याओं, सुरक्षा चूकों से होने वाली घटनाओं के बारे में क्यों नहीं बोलती है? सेना को प्रोफेशनल और संविधान के प्रति प्रतिबद्ध और शपथबद्ध होना चाहिए। सभी राजनैतिक दलों को सेना और सुरक्षा बलों का अराजनीतिक स्वरूप बनाए रखना होगा। अगर राजनैतिक दलगत वायरस ने इसे संक्रमित कर दिया, तो देश सैन्यवाद की ओर बढ़ने लगेगा। सैन्यवाद, लोकतंत्र को नष्ट करने का प्रथम सोपान है।
विजय शंकर सिंह
( लेखक सेवानिवृत्त  आईपीएस अधिकारी हैं)

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