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School system should be changed: बदले स्कूली व्यवस्था

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भारत में मई का महीना एक बार सबको हिला देता है। इन दिनों सीबीएसई, आईएससीई और राज्य के स्कूल बोर्ड दसवीं और बारहवीं परीक्षा का परिणाम घोषित करते हैं। पूरे और लगभग पूरे नम्बर लाने वाले फौरन चमकते सितारे बन जाते हैं। अक्सर मोटे फ्रेम के चश्मों से लैश, वे अखबार -टीवी वालों के जरिए अपने माता-पिता और शिक्षकों का धन्यवाद करते हैं। पढ़ाई में खपाए गए घंटे गिनवाते हैं। सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखने की अपनी दूरदर्शिता पर प्रकाश डालते हैं। आगे क्या तीर मारने वाले हैं इस पर तफसील से बताते हैं। मुंह में लड्डू भकोसे वे अगले दिन अखबारों की सुर्खियां बनते हैं।
नब्बे-पंचानवे प्रतिशत वाले चिंता में पड़ जाते हैं। वे जानते हैं कि नामी कालेजों में कट-आॅफ निंयानबे प्रतिशत होता है, वे उनके गेट के भी आसपास नहीं भटक सकते। अस्सी-पचासी वाले तो मुंह छिपाए फिरते हैं। फेल-गति को प्राप्त हुए चुपचाप सरक लेते हैं। इस औपचारिक प्रमाण पत्र के साथ कि पढ़ाई-लिखाई के जरिए उनके हाथ कुछ नहीं लगने वाला। कहीं ये अपने ही जान के ग्राहक ना बन जाए, मुफ्त सलाह के लिए सरकारें हेल्पलाइन के पीछे मोर्चा संभाल लेती हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि शिक्षा तरक्की का सबसे शर्तिया गारंटी है। आदमी शारीरिक तौर पर कमजोर होने के बावजूद भी बाकी जानवरों पर इसी कारण भारी पड़ा। लेकिन अब इसका मुकाबला मशीन से है। ‘सेपियंस : ए ब्रीफ हिस्ट्री आॅफ ह्यूमनकाइंड’ के लेखक हरारी का कहना है कि पिछली औद्योगिक क्रांतियों में आदमी की बुद्धि को कोई चुनौती नहीं थी। मशीन ने शारीरिक श्रम में ही इसे घर बिठाया था। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस रोबोट और कम्प्यूटर अब इसे बुद्धि में भी पीटने ही वाले हैं। आने वाले दिनों में आदमी एक “यूजलेस क्लास” बनकर रह जाएगा। ड्रग्स और वर्चूअल रीऐलिटी में सुख-संतोष ढूंढ़ेगा।
वर्तमान स्कूली शिक्षा व्यवस्था इस चुनौती के बारे में सोच भी नहीं रही है। पिकासो ने कहा था कि सारे बच्चे जन्म से कलाकार होते हैं, चुनौती ये है कि वे बड़े होने के बाद भी ऐसा कैसे बने रहें। लोगों को शिकायत है कि स्कूल बच्चों की कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का बंटाधार करने में लगा है। ये गलतियों के लिए सजा देता है जबकि कुछ मौलिक करने के लिए ये जरूरी है। ये छात्रों का भेजा तथ्यों से भरता रहता है। परीक्षा स्मरणशक्ति की जांच भर है। इसमें मौलिक सोच के लिए कोई जगह नहीं है। स्कूल सबको एक डंडे से हांकता है जबकि हरेक की अपनी रुचि होती है। आइंस्टिन का कहना था कि हर कोई विलक्षण है। लेकिन अगर एक मछली को इस बात के लिए आंका जाय कि वो कितनी कुशलता से पेड़ पर चढ़ सकती है तो वो हमेशा मूर्ख ही दिखेगी। स्कूल जानी हुई चीजें रटवाता रहता है। जब समस्याओं का समाधान भिन्न सोच से सम्भव है, ये पुरानी लकीर पीटता रहता है। ये छात्रों को असल की बाहरी जीवन के लिए तैयार नहीं करता। ये अभी भी पुरानी औद्योगिक युग में अटका पड़ा है, फेक्टरियों के लिए आधे-अधूरे मजदूर बनाने में लगा है।
विकसित देश और कुछ खरबपति इसे बदलने में लगे हैं। फिनलैंड में सबसे काबिल लोगों को पढ़ाने के काम में लगाया जाता है। बच्चों को खेल और सामूहिक गतिविधियों के जरिए सीखने के लिए प्रेरित किया जाता है। जापान में दस साल की उम्र तक कोई परीक्षा नहीं होती। इस दौरान उनके चारित्रिक विकास पर जोर दिया जाता है जिससे कि वे विनम्रता, करुणा, आत्मनिर्भरता और जिम्मेवारी सीख सकें। ई-कामर्स कम्पनी अलीबाबा के मालिक जैक मा का कहना है स्कूल जो कुछ और जिस तरह से सिखा रहे हैं, इनकी आने वाले दिनों में कोई उपयोगिता नहीं रह जाएगी। अगर फौरन बदलाव नहीं लाया गया तो अगले तीस साल में भारी मुश्किल खड़ी हो जाएगी, मशीन के मुकाबले आदमी किसी काम का नहीं रहेगा। मा की बात को हलके में नहीं लिया जा सकता। 420 बिलियन डॉलर की कम्पनी को छोड़ वे वापस पढ़ाने का काम करना चाहते हैं। उनका मानना है कि बच्चों की मौलिकता और रचनात्मकता को बढ़ावा देना होगा। तभी वे सूचना क्रांति के युग में टिके रह पाएंगे। टेस्ला के मालिक एलन मस्क को जब लगा कि उनके पांच बच्चों को स्कूल खराब करने में लगा है तो खुद का “एड अस्ट्रा स्कूल” खोल दिया। यहां बच्चे समूह में काम करते हैं। उन्ही टॉपिक पर जानकारी इकट्ठी करते हैं जिनका भविष्य में इस्तेमाल है। जो काम मशीन कर सकता है, वो सीखते ही नहीं। जो उन्हें पसंद नहीं, उसे सीखने के लिए बाध्य नहीं किया जाता। कोई ग्रेड-सिस्टम   नहीं है। स्कूल अच्छा चल रहा है। देर-सवेर सबको इसी रास्ते चलना होगा। बच्चों के जीवन का उद्देश्य जिस चीज में वे अच्छे हैं, उसमें श्रेष्ठ बनना होना चाहिए। स्कूल और शिक्षकों को इस काम में उनकी सहायता करनी चाहिए
ओम प्रकाश सिंह
(लेखक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं।)
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