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Save water, then you will survive: पानी बचाइए, तभी आप भी बचेंगे

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माता वैष्णव देवी के दरबार से लौटा हूं। हर साल जाता हूं। पर इस बार एक बात कई बार नोटिस की। हर जगह पानी बचाने के लिए स्लोगन लिखे थे। पहाड़ों के ऊपर पानी भरपूर मात्रा में पहुंचाया गया है, लोगों को दिक्कत न हो इसके लिए जगह-जगह वाटर कूलर लगाए गए हैं। पर हर जगह आपको स्लोगन जरूर पढ़ने को मिलेंगे। पानी बचाइए, तभी आप भी बचेंगे। पहाड़ों के ऊपर तो समझ में आता है कि पानी की दिक्कत है इसीलिए इस तरह के स्लोगन की जरूरत पड़ी होगी, पर हमें चेन्नई से लेकर बिहार तक स्थिति पर पर मंथन जरूर करना चाहिए।
पानी को लेकर हर जगह त्राहिमाम है। इसके दो पहलुओं पर मंथन करें। पहला पहलू है कि बारिश हो नहीं रही है। ग्राउंड वाटर लेवल बेहद नीचे चला गया है। हैंडपंप से लेकर कुंए तक सूख गए हैं। शहरों के बीच में स्थापित छोटे-छोटे तालाबों पर अवैध कब्जा हो चुका है। देश के किसी भी राज्य के सौ प्रतिशत घरों में सरकारी नल नहीं पहुंच सका है, जहां से निर्बाध पानी की सप्लाई हो।
अब जरा दूसरे पहलू पर गौर करें। पानी के त्राहिमाम के बीच पानी का बिजनेस खूब फल फुल रहा है। हर छोटे से छोटे कस्बे में आपको बिस्लरी के बीस लीटर कंटेनर या 25 लीटर के कैंपर में पानी की सप्लाई देखने को मिल जाएगी। लोग पैसे खर्च कर रहे हैं और खुशी-खुशी पानी खरीद रहे हैं। सबमर्सिबल पंप का बिजनेस गजब की प्रगति कर रहा है। बिहार में हाल तो यह है कि सरकार इसे प्रोत्साहित कर रही है। ग्राम पंचायतों में इसे कई फेज में लगाने का लक्ष्य रखा गया है। निश्चित तौर पर सरकार की यह योजना कृषि प्रधान बिहार राज्य के किसानों और आम लोगों को निर्बाध पानी के लक्ष्य को पूरा करने के उद्देश्य से है। पर क्या सरकार यह नहीं जानती कि एक सबमर्सिबल पंप लगाने के बाद पानी का लेबल कितना नीचे चला जाता है। हाल यह है कि बिहार के एक-एक मोहल्ले में आपको सौ-सौ सबमर्सिबल पंप लगे मिल जाएंगे। इस तरह के पंप इंस्टॉल करने में अच्छा खासा खर्च आता है। ऐसे में इसका बिजनेस भी दिनों दिन बढ़ रहा है।
अब एक और पहलू पर गौर करें। पानी की कमी के कारण चेन्नई जैसे विकसित शहर में भयंकर अकाल पड़ा हुआ है। तमिलनाडु सरकार ने इस अकाल से निपटने के लिए युद्धस्तर पर कार्य शुरू किया है। मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी ने कहा है कि वेल्लोर जिले के जोलारपेट से विशेष ट्रेन के जरिए रोज एक करोड़ लीटर पानी चेन्नई भेजा जाएगा। अगले छह महीने तक यह ट्रेन लगातार चक्कर लगाती रहेगी। शहर में जल संकट को देखते हुए छोटे रेस्त्रां बंद किए जा रहे हैं, मेट्रो सिस्टम ने स्टेशनों पर एयर कंडीशनिंग का उपयोग बंद कर दिया है और कुछ कार्यालयों में घर से काम करने का नियम लगाया गया है।
सिर्फ बिहार और चेन्नई ही नहीं, बल्कि देश के तमाम ऐसे शहर हैं जहां पानी के लिए लोग तरस रहे हैं। यह कोई पहली बार नहीं है कि देश के तमाम राज्य जल संकट से त्रस्त हैं। खुद नीति आयोग ने पिछले साल कहा था कि देश इतिहास के सबसे गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। ऊपर मैंने जो जिन पहलुओं पर गौर करने को कहा था उसका लब्बोलुआब यह है कि जल संकट के बीच सिर्फ अस्थाई समाधान पर ही गौर किया जा रहा है। बिहार में जल संकट है तो सबमर्सिबल पंप लगाने पर जोर दिया जा रहा है। चेन्नई में संकट पैदा हो गया है तो ट्रेन से पानी की सप्लाई की जा रही है। पर कोई भी राज्य जल संकट के स्थाई समाधान को लेकर गंभीर नहीं है। इस स्थाई समाधान पर गंभीरता से मंथन जरूरी है।
समझना और सोचना जरूरी है कि आखिर दस साल पहले बिहार जैसे राज्यों में पानी के संकट का समाचार क्यों नहीं आता था। ऐसा इसलिए था क्योंकि तमाम शहरों और कस्बों में छोटे-छोटे तालाब बने थे, जिनमें हमेशा पानी की उपलब्धता बनी रहती थी। इस पानी की उपलब्धता का फायदा यह होता था कि आसपास के कई किलोमीटर इलाके में भूमिगत पानी का लेवल बेहद ऊपर होता था। आज बिहार के किसी भी कस्बे या शहर में चले जाएं पोखर या तालाब का नामोनिशान मिट चुका है। या तो पोखर या तालाबों को पाट कर उस पर अवैध कब्जा जमा लिया गया है। या फिर उसे अवैध तरीके से बेच कर वहां शॉपिंग कॉम्प्लेक्स खड़ा कर दिया गया है। सबमर्सिबल पंप लगाने के लिए न तो नियम कायदे हैं और न लोगों के पास समझ। पास में है सिर्फ पैसा। उन्हें सिर्फ अपने घर से मतलब है। जो भी थोड़े बहुत नियम बने हैं उनको कोई देखने और समझने वाला नहीं है। कमोबेश यह स्थिति देश के हर इलाके में है।
पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्य में हाल यह है कि ग्राउंड वाटर लेवल बेहद नीचे चले जाने के बावजूद उन फसलों के उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है जिसमें सबसे अधिक पानी की जरूरत पड़ती है। पैसे खर्च कर सबमर्सिबल पंप लगाकर डीप बोरिंग के जरिए खेती की जा रही है, लेकिन ग्राउंड वाटर लेवल की किसी को चिंता नहीं है। न तो किसानों को जागरूक करने पर जोर दिया जा रहा है और न ग्राउंड वाटर लेवल बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। नि:संदेह किसानों को सिंचाई के वे तरीके भी उपलब्ध कराने होंगे, जिनमें कम पानी की जरूरत पड़ती है। इसी के साथ पानी की बचत करने और उसे दूषित होने से बचाने के तौर-तरीके भी विकसित करने होंगे। यह भी एक तथ्य ही है कि वर्षा जल संरक्षण के उपाय अभी कागजों पर ही अधिक हैं। इस स्थिति को बदलने के लिए ठोस उपाय जरूरी हैं।
कुछ महीने पहले मैं बिहार के कोसी क्षेत्र में गया था। एक होटल में हैंडपंप के साथ ही पानी का पाइप लगा दिया गया था और उस पाइप को सड़क की तरफ खोल दिया गया था। मुझे लगा कि इस पानी को पंप के जरिए निकाल कर सड़क पर बहाया जा रहा है ताकि धूल मिट्टी होटल में न आए। मैंने जब होटल के मालिक से इस पर आपत्ति जताई कि बिहार के ही कई इलाके जल संकट से त्रस्त हैं और आप पानी को यूं सड़क पर बहा रहे हैं। उसने जवाब दिया कि सर इस हैंडपंप में ऐसे ही पानी आता है, इसे चलाने की भी जरूरत नहीं है। हैंडपंप भी बांस के जरिए लगाया गया है। यानि हैंडपंप के नीचे लोहे की पाइप नहीं, बल्कि बांस लगी है। वह भी सिर्फ आठ या दस फीट की। पानी का लेवल इतना ऊपर है कि हैंडपंप को बिना चलाए प्रेशर से पानी आता है। अगर पाइप लगाकर पानी को सड़क की तरफ न बहाऊं तो पूरा पानी मेरे होटल में ही आ जाएगा। मैं आश्चर्यचकित था। पर तुरंत समझ में आ गया कि कोसी नदी ने इस क्षेत्र को इतना समृद्ध कर रखा है कि बांस के जरिए भी यहां पानी की उपलब्धता है।
अब आप समझ गए होंगे कि क्यों ग्राउंड वाटर के लेवल को बढ़ाने की जरूरत है। सिर्फ पानी की टंकी और सबमर्सिबल पंप के जरिए पानी के दोहन से जरूरत तो पूरी हो सकती है, लेकिन संकट को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता है। अब भी समय है। अभी से हमें प्रयास सार्थक प्रयास करने की जरूरत है। नदियों, तालाब और पोखर के महत्व को समझने की जरूरत है। बारिश के हर एक बूंद को सहेजने की जरूरत है। और कुछ नहीं तो लोगों को जरूर जागरूक करिए। वैष्णव देवी के पहाड़ों पर लिखे स्लोगन को अपने जीवन का आधार बनाइए। आप भी जगह-जगह बताएं और लोगों को मंथन करने पर मजबूर करें कि पानी बचाइए, तभी आप भी बचेंगे।

कुणाल वर्मा

(लेखक आज समाज के संपादक हैं )
Kunal@aajsamaaj.com

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