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Sankalp patra Analysis: Ajay Shukla: संकल्प पत्र विश्लेषण : अजय शुक्ल, सेना के पराक्रम से राष्ट्रवाद को भुनाता संकल्प पत्र

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भाजपा के संकल्प पत्र पर विश्लेषण:

चंडीगढ़। 17वीं लोकसभा के निर्वाचन के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपना घोषणा पत्र (संकल्प पत्र 2019) सोमवार को जारी कर दिया। 16वीं लोकसभा के चुनाव के लिए 2014 में 08 अप्रैल को ही घोषणा पत्र जारी किया गया था। उस वक्त 52 पेज के घोषणा पत्र में 549 वादे किये गये थे। इस बार 50 पेज के संकल्प पत्र में 208 वादे हैं, जिनमें 75 संकल्पों को दोहराया गया है। इसमें किसानों, युवाओं, महिलाओं, रेलवे, स्वास्थ, अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचा, समान विकास, संस्कृतिक धरोहर और सुशासन को शामिल किया गया है। इस संकल्प पत्र में राष्ट्रवाद, अंत्योदय, सुशासन और सांस्कृतिक विरासत के नाम रामंदिर का राग नये तरीके से पेश किया गया है। 2014 के वादे अच्छे दिन लाने के लिए महंगाई कम करना, काले धन लाने, हर साल दो करोड़ रोजगार, हर रोज एक कानून खत्म करने पर कोई चर्चा इस बार नहीं है। कश्मीरी पंडितों के लिए भी भाजपा के पास पुराने राग के सिवाय कुछ नहीं है। कांग्रेस के घोषणा पत्र की काट इसमें नहीं है मगर उसका असर जरूर है।
संकल्प पत्र 2019 के निर्माता देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह हैं जो 2014 के घोषणा पत्र के भी निमार्ता थे। 08 अप्रैल 2014 को जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री प्रत्याशी के रूप में प्रस्तुत करते हुए राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर जारी किया था, तब उनके साथ भाजपा के प्रणेता लालकृष्ण आडवाणी और डा. मुरली मनोहर जोशी भी थे। सोमवार को ये दोनों लोग मोदी टीम के साथ नजर नहीं आये। मोदी, राजनाथ, अमित शाह, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज सहित सात लोग मंच पर थे। संकल्प पत्र में राष्ट्रवाद की भावना पर सियासत गर्माने की कोशिश की गई है। राष्ट्र सर्वप्रथम शीर्षक से इसकी शुरुआत है। जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, सैन्यबल, सीमा सुरक्षा, वामपंथ से मुकाबला और अनुच्छेद 370 को रखा गया है। ये वही बातें हैं जिन पर राजनीति न करने की बात भाजपा नेता बार-बार कहते रहे हैं। यह भी याद रहे कि ये सभी लच्छेदार वायदे पिछले चुनावों में भी दूसरे शब्दों से शामिल थे।
भाजपा ने कांग्रेस की किसान नीति की अहमियत को समझा है। उसने किसानों की आय दो गुनी करने के पिछले चुनावी वायदे को ही इस बार भी दोहराया है। उसमें गरीब किसानों को वृद्धावस्था पेंशन की बात कही गई है, जो पहले से ही दूसरे रूप में मिल रही है। देश को सुशासन और सुदृढ़ अर्थव्यवस्था के वादे के साथ ही व्यापारियों के हितों को साधने का वादा किया गया है। मेक इन इंडिया से लेकर एमएसएमई सेक्टर की बात की गई है मगर उस पर कोई विजन नहीं दिखा। युवाओं को बेहतर भविष्य देने में असफल रहे स्टार्टअप को फिर दोहराया गया है। शहरी विकास को प्राथमिकता पर रखा गया है मगर 100 नये स्मार्ट सिटी बनाने के पुराने वादे पर कोई चर्चा नहीं है। जल संसाधन मंत्रालय को जल शक्ति में तब्दील करने की बात है जैसे योजना आयोग, नीति आयोग बना था।
संकल्प पत्र में सुशासन और राम मंदिर का राग एक बार फिर से अलापा गया है, जिस पर पिछले घोषणा पत्र में भी वादे किये गये थे। सांस्कृतिक विरासत में रखे गये बिंदुओं में गंगा, सबरीमला, योग, धरोहर दर्शन और भारतीय भाषाओं को शामिल किया गया है। समान नागरिक संहिता को फिर दोहराया गया है। युवाओं और महिलाओं को लेकर वादे हैं मगर पिछले वादे अब तक कागजी हैं। कौशल विकास पर भी दोबारा वादा है मगर पिछले बार के नतीजे उत्साहवर्धक नहीं रहे हैं। रेलवे से लेकर सेहत तक की बात की गई है मगर पिछले पांच सालों में बदतर हुई हालत के लिए जिम्मेदार कौन है? यह सवाल खड़ा होता है। वैश्विक भारत के नाम पर विदेश नीति को वसुधैव कुटुम्बकम का सिद्धांत बखान किया गया है।
गौर से देखने पर पिछले लोकसभा चुनाव में जारी किये गये घोषणा पत्र से इस संकल्प पत्र में कोई बड़ा बदलाव नजर नहीं आता है। चेहरों में कुछ अंतर है मगर कोई ठोस आधार नहीं है। राष्ट्रवाद और सैन्य बलों की क्षमताओं को भुनाने की कोशिश की गई है। भाजपा को यह समझ आ गया है कि देशवासी राष्ट्र और सेनाओं के नाम पर एकजुट हो जाते हैं। विरोधी दल वाजिब विरोध दर्ज कराकर खलनायक बन जाते हैं।

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