Home संपादकीय Sadhvi Pragya’s so much ruckus is unnecessary: साध्वी प्रज्ञा पर इतना हंगामा बेवजह ही तो है

Sadhvi Pragya’s so much ruckus is unnecessary: साध्वी प्रज्ञा पर इतना हंगामा बेवजह ही तो है

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जरा मंथन करिए कि क्या साध्वी प्रज्ञा पहली ऐसी प्रत्याशी हैं जिनके ऊपर आपराधिक मामले दर्ज हुए हैं। या फिर वो आखिरी प्रत्याशी होंगी कि जिनको अगर चुनाव से डी-बार कर दिया गया तो राजनीति पवित्र हो जाएगी? हद है इस दोहरी मानसिकता की। यह न कोई पहली प्रत्याशी हैं और न आखिरी जो राजनीतिक मैदान में हैं और जिनपर आपराधिक मुकदमे दर्ज हों। ऐसे प्रत्याशी पहले भी आते रहे हैं और भविष्य में भी आते रहेंगे। फिर मंथन करना जरूरी है कि आखिर क्यों सिर्फ साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर ही इतना हंगामा हो रहा है? क्या यह सही है कि भारतीय जनता पार्टी की सोची समझी रणनीति में तमाम विपक्षी पार्टियां उलझ कर रह गई हैं? क्या साध्वी प्रज्ञा को सामने लाकर बीजेपी ने हिंदूत्व का वही पुराना ट्रंप कार्ड चल दिया है जिसके बलबूते वह हमेशा राजनीति में अपनी जगह खोजती रही है?
दरअसल जैसे ही लोक सभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी ने भोपाल से 2008 में हुए मालेगांव बम धमाकों की आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को चुनावी रण में उतारा वैसे ही एक माहौल बना दिया गया कि बीजेपी एक बार फिर अपने पुराने ट्रैक पर है। बीजेपी के विरोध में माहौल तैयार किया गया, पर शायद बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व भी यही चाहता था। मैनेजमेंट का भी फंडा है ऐवरी बैड पब्लिसिटी इज ए गुड पब्लिसिटी। जिस उद्देश्य के लिए साध्वी प्रज्ञा को मैदान में लाया गया वह उद्देश्य बीजेपी ने एक झटके में पा लिया। लोकसभा चुनाव का तमाम मुद्दा एक ऐसे मुद्दे पर शिफ्ट हो गया जो बीजेपी खुल कर नहीं उठाना चाह रही थी। पर विरोधियों की जुबां से ही बीजेपी ने हिदुत्व का मुद्दा केंद्र में ला दिया। बीजेपी के लिए यह वही बात हुई कि हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा। कहने का मतलब है बीजेपी ने एक ऐसी सोची समझी साजिश के तहत प्रज्ञा ठाकुर को मैदान में उतारा, जिससे विपक्षी पार्टियां खुद ब खुद बीजेपी के हिंदुत्व एजेंडे की ब्रांडिंग कर दे। यकिन मानिए हुआ भी ऐसा ही है। अब विपक्षी पार्टियां भले ही प्रज्ञा ठाकुर को लेकर बयानबाजी नहीं कर रही, लेकिन जितनी बयानबाजी वो कर चुकी हैं, उससे निश्चित तौर पर उन्हें नुकसान ही उठाना पड़ेगा, यह तय है।
अब बात आती है कि आखिर क्यों प्रज्ञा ठाकुर को चुनावी मैदान में नहीं होना चाहिए था? क्या सिर्फ इसलिए उनका विरोध किया जाना चाहिए क्योंकि मालेगांव मामले में उन्हें आरोपी बनाया गया है? या फिर सिर्फ इसलिए क्योंकि उनके ऊपर ऐसे आरोप लगे हैं जो अब तक सिद्ध ही नहीं हो सके हैं? इसका सीधा सा जवाब यह है कि भारतीय संविधान के प्रावधान उनको चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकते हैं। साध्वी प्रज्ञा ही क्या उनके जैसे हजारों लोग चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र हैं। वैसे भी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर से मालेगांव ब्लास्ट मामले में महाराष्ट्र कंट्रोल आॅफ आॅग्रेनाइज्ड क्राइम एक्ट (मकोका) काफी पहले हटा लिया गया था। एनआईए ने तो प्रज्ञा ठाकुर पर से पूरा मामला खत्म करने तक की बात कही थी, लेकिन एनआईए कोर्ट इस पर राजी नहीं हुआ। इस मामले में गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट यानि यूएपीए) के तहत साध्वी पर अब भी मुकदमा चल रहा है। साध्वी अप्रैल 2017 से ही जमानत पर जेल से बाहर हैं। साल 2017 में ही मध्यप्रदेश के देवास कोर्ट ने साध्वी प्रज्ञा और सात लोगों को पूर्व आरएसएस प्रचारक सुनील जोशी की हत्या के केस से भी बरी किया था। मालेगांव विस्फोट से पहले साध्वी प्रज्ञा पर 2007 के इस मर्डर केस में षड्यंत्र रचने के आरोप लगे थे।
2008 मालेगांव ब्लास्ट केस में महाराष्ट्र एंटी-टेररिज्म स्कवाड ने चार्जशीट दायर करते हुए साध्वी प्रज्ञा को इस केस में प्रथम आरोपी बनाया था। 29 सितंबर 2008 को मोटरसाइकिल में आईईडी से हुए बम धमाकों में छह लोगों की मौत हो गई थी, जबकि करीब 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे। यह मोटरसाइकिल साध्वी के नाम पर रजिस्टर्ड थी। हेमंत करकरे के नेतृत्व में एटीएस की टीम ने साध्वी को गिरफ्तार किया था। नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) बनने के बाद यह केस अप्रैल 2011 में एनआईए को सौंपा गया। एनआईए ने अपनी चार्जशीट में कहा कि एजेंसी को साध्वी प्रज्ञा के इस केस से जुड़े होने के कोई सबूत नहीं मिले, जिसके कारण उन्हें बरी किया जाना चाहिए। अप्रैल 2017 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने साध्वी को जमानत दे दी। एनआईए ने साध्वी की जमानत की अर्जी पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं की थी। एनआईए ने ये कहते हुए साध्वी को क्लीन चिट दी थी कि उनके खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं हैं, लेकिन एनआईए स्पेशल कोर्ट ने एजेंसी की इस दलील को अस्वीकार करते हुए दिसंबर 2017 में यह साफ कर दिया कि साध्वी पर यूएपीए के तहत मुकदमा चलेगा। इसके बाद अक्टूबर 2018 में कोर्ट ने साध्वी और छह लोगों पर यूएपीए की धारा 16 और 18, इंडियन पीनल कोड की धारा 120बी (आपराधिक साजिश), 302 (हत्या), 307 (हत्या की कोशिश) और 326 (इरादतन किसी को नुकसान पहुंचाना) के तहत आरोप तय किए।
अब सवाल उठता है कि क्या इन मामलों के आधार पर साध्वी को चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है। इसका जवाब है नहीं। रिप्रिजेंटेशन आॅफ द पीपल एक्ट 1951 की धारा 8 (3) के अनुसार अगर किसी व्यक्ति को अदालत ने दोषी करार दिया है और उसे दो साल या इससे ज्यादा की सजा सुनाई गई है, तो वह व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता। जबकि साध्वी प्रज्ञा को अभी तक किसी भी कोर्ट में दोषी करार नहीं दिया गया है, लिहाजा वो कानूनी तौर से चुनाव लड़ सकती हैं। पिछले साल जब एसोसिएशन आॅफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और इलेक्शन वॉच ने अपनी रिपोर्ट जारी की थी तब चौंकाने वाले तथ्य सामने आए थे। देश भर के कुल 4856 जनप्रतिनिधियो में से 1024 सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। इन आंकड़ों की व्याख्या करें तो देश का हर पांचवा नेता आरोपी है। इस वक्त 1518 नेताओं पर केस दर्ज हैं, जिसमें 98 सांसद हैं। नेताओं पर 35 पर बलात्कार, हत्या और अपहरण के आरोप हैं। महाराष्ट्र के 65, बिहार के 62, पश्चिम बंगाल के 52 नेताओं पर केस दर्ज हैं। इनमें से किसी पर भी दोष सिद्ध नहीं हुआ है, इसीलिए ये माननीय हैं। हाल यह है कि 29 अप्रैल को होने वाले चौथे चरण के मतदान में 71 सीटों पर 210 दागी उम्मीदवार मैदान में हैं। जब ये माननीय हैं तो साध्वी प्रज्ञा आतंकवादी कैसे हो गर्इं? मंथन करना जरूरी है।
सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायमूर्तियों दीपक मिश्रा, नरीमन खानविलकर, धनन्जय चंद्रचूड, इंदु मल्होत्रा की संविधान पीठ का निर्णय है कि अदालत उन अपराधियों को जिनके मुकदमे लंबित हैं और आरोप भी तय हो चुके हैं, चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकती। तर्क यह कि न्यायशास्त्र की निगाह में जब तक दोष सिद्ध न हो, तब तक हर अभियुक्त निर्दोष माना-समझा जाना चाहिए। राजनीति में अपराधीकरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों का संविधान पीठ ने कहा था कि वक्त आ गया है कि संसद कोई ठोस कानून लाए ताकि अपराधी राजनीति से दूर रहें। पब्लिक लाइफ में आने वाले लोग अपराध राजनीति से ऊपर हों। राष्ट्र तत्परता से संसद द्वारा कानून का इंतजार कर रहा है। कोर्ट के इस फैसले से दागी नेताओं को राहत मिली हुई है।
राजनीति में अपराधियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। 2004 में जहां 24 प्रतिशत आपराधिक पृष्ठभूमि के सांसद थे। वहीं 2009 में यह संख्या 30 प्रतिशत हो गई। 2014 में इसका आंकड़ा बढ़कर 34 प्रतिशत हो गया। ऐसे नेताओं को संसदीय लोकतंत्र से दूर रखने की जिम्मेदारी आम जनता की ही है। पर अफसोस इस बात का है कि जनता भी ‘अपने लोगों’ को कभी अपराधी नहीं मानती। राजनीति ऐसे लोगों को किसी धर्म या संप्रदाय का चेहरा बना देती है और हीरो की तरह ये प्रोजेक्ट भी हो जाते हैं। राजनीति को अगर अपराधिकरण के श्राप से मुक्त करना है तो जनता को अपनी भागीदारी निभानी होगी। नहीं तो साध्वी प्रज्ञा जैसे उम्मीदवारों पर हो हल्ला करने से कुछ होने जाने वाला नहीं है। आप भी मंथन करिए। क्या यह बेवजह का हो हल्ला नहीं है?

कुणाल वर्मा

kunal@aajsamaaj.com
(लेखक आज समाज के संपादक हैं)

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