Home विचार मंच Ram in the court between faith and trust: आस्था और विश्वास के बीच अदालत में राम

Ram in the court between faith and trust: आस्था और विश्वास के बीच अदालत में राम

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5 अगस्त 2019 से सुप्रीम कोर्ट, अयोध्या स्थित राममंदिर विवादित भूमि मामले की नियमित सुनवाई कर रहा है। यह सुनवाई इस मामले में अदालत द्वारा मध्यस्थता का अवसर दिए जाने और उसका कोई नतीजा न निकलने के बाद, दिन प्रतिदिन के हिसाब से रोज हो रही है। अब तक कुल आठ दिवसों की सुनवाई हो चुकी है। अखबारों के विधि संवाददाता इस कार्यवाही को छाप भी रहे हैं और सोशल मीडिया में भी इस मुकदमे को लेकर उत्कंठा बनी हुई है। वैसे तो लोग इस विवाद को 1528 ई. से शुरू हुआ बताते हैं, पर वर्तमान मुकदमेबाजी का इतिहास 1949 में एक वीरान पड़ी हुई इमारत में राम के बालरूप की एक छोटी सी प्रतिमा रख देने के बाद शुरू हुआ है।
इस घटना को निर्मोही अखाड़ा और अन्य हिंदू पक्ष राम का प्राकट्य बताते हैं। वे एक मुस्लिम हवलदार का बयान भी इस संबंध में प्रस्तुत करते हैं। पर सच क्या है यह तो राम ही जाने। राम भी कम लीला थोड़े ही करते हैं! सिटी मजिस्ट्रेट फैजाबाद की अदालत से शुरू हुआ यह मुकदमा, 2010 में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से निर्णीत हुआ तब उस मुकदमे की अपील के बाद सुप्रीम कोर्ट में यह मामला पहुंचा। अब जाकर 5 अगस्त से इस मुकदमे की सुनवाई दिन प्रतिदिन हो रही है, और उम्मीद है कि इस साल के अंत तक इस मुकदमे का फैसला आ जाएगा।
अभी सुप्रीम कोर्ट में मुकदमे के संबंध में केवल प्रारंभिक सुनवाई शुरू हुई है। पर कुछ रोचक बातें भी इन आठ दिनों में हुई है। इस मुकदमे में तीन पक्षकार हैं जिनके बीच हाईकोर्ट ने जमीन के तीन टुकड़े करके उनका स्वामित्व अलग-अलग तीन पक्षों का माना है। जिसमें, एक सुन्नी वक्फ बोर्ड है, दूसरा पक्ष निर्मोही अखाड़ा है, और तीसरा पक्ष रामलला विराजमान का है।
सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा तो पुराने प्रतिद्वंद्वी हैं और लंबे समय से अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं, पर रामलला विराजमान बाद में विश्व हिंदू परिषद के नेता, जस्टिस लोढ़ा द्वारा अलग से एक पक्ष के रूप में अदालत में आए हैं। तीनों को एक-एक तिहाई उक्त विवादित भूमि का अंश मिला है। रामलला और निर्मोही अखाड़ा को मिली दोनों की एक तिहाई भूमि को अगर आपस मे जोड़ कर मिला दें तो भी यह भाग विवादित भूमि का दो तिहाई ही होता है क्योंकि एक तिहाई भूखंड तो सुन्नी वक्फ बोर्ड को भी मिला है। अब सुन्नी वक्फ बोर्ड उस भूखंड का क्या उपयोग करता है, मस्जिद बनाता है या उसे यूंही छोड़ देता है या यह भूमि भी वह मंदिर बनाने के लिए सदाशयता से निर्मोही अखाड़ा को दे देता है, यह सब अभी कयास की बातें हैं और यह परिस्थिति हाईकोर्ट के फैसले के बाद की थी। अब तो तीनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट में हैं और क्या होता है, यह बात अब अदालत के ऊपर है।
ऐसा नहीं है कि एक देवमूर्ति पहली बार किसी मुकदमे में पक्षकार बनाई गई हो। इसके उदाहरण पहले भी उपलब्ध हैं। यह बात तब उठी जब अदालत ने यह कहा कि क्या जीसस या मुहम्मद के बारे में भी कभी अदालत में उन्हें पक्षकार बनाकर बहस हुई है? मैंने इस विषय पर ढूंढा और मुझे कोई ऐसा सन्दर्भ नहीं मिला जिससे यह पता चलता हो कि जीसस या मुहम्मद को किसी मुकदमे में पक्षकार बनाया गया हो। पर हिंदू धर्म में देवता या विग्रह या मूर्ति की अलग अवधारणा है और वह अवधारणा जीसस और मुहम्मद से अलग है। न्यायशास्त्र के विद्वान जॉन विलियम सलमोंड का कहना है कि किसी भी न्यायिक व्यक्तित्व का अदालत में एक पक्ष के रूप में खड़े होना अन्यायिक नहीं है, अगर वह किसी न किसी सम्पत्ति का मालिक है तो। अदालत में वह सम्पत्ति का मालिक या उस संपत्ति को पाने वाला पक्षकार के रूप में न्यायिक तोष पाने के लिए खड़ा होता है।
एक हिंदू विग्रह के न्यायिक पक्षकार बनने के पीछे कानून के विद्वान गणपति अय्यर अलग तर्क देते हैं। वे हिंदू और इस्लाम धर्म में व्याप्त अंतर को भी स्पष्ट करते हैं। उनके अनुसार, हिंदू विग्रह में निवास करने वाला देवता सभी व्यावहारिक दृष्टिकोण से एक जीवंत व्यक्ति है। वह विग्रह न केवल संपत्ति अपने पास अपने नाम रख सकता है बल्कि वह उस संपत्ति को बेच और खरीद भी सकता है जैसा कोई मनुष्य कर सकता है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए अयोध्या मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने रामलला विराजमान को विवादित और ध्वस्त किए गए भवन के केंद्रीय गुम्बद के नीचे जहां रामलला की पूजा होती थी, की भूमि उन्हें दी है। इस प्रकार हाईकोर्ट ने उनके न्यायिक अस्तित्व को मान लिया है। अब कुछ मुकदमों का उल्लेख पढ़िए जिसमे अदालत ने इस विवाद को सुलझा दिया है कि कोई हिंदू विग्रह अदालत में पक्षकार बनाया जा सकता है या नहीं। 1922 ई. में विद्यावारिधि तीर्थ स्वामीगल बनाम बालुस्वामी अय्यर का मुकदमा बहुत चर्चित हुआ था। इस मुकदमे में यही केंद्रीय प्रश्न उभर कर सामने आया था कि क्या हिंदू विग्रह या देव (अंग्रेजी में इसे डेइटी शब्द प्रयुक्त किया गया है) की न्यायिक हैसियत है या नहीं? इसके अतिरिक्त शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अमृतसर बनाम घनश्याम दास का भी एक मुकदमा 2000 ई में इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट में चल चुका है।
उपरोक्त मुकदमों में भी अदालत ने यही सिद्धांत रखा कि हिंदू देव विग्रह अगर उनके नाम पर कोई संपत्ति है या उसकी खरीद फरोख्त, अधिग्रहण, दान आदि कि संपत्ति से जुड़ीं कार्यवाहियां होती हैं तो उक्त देव विग्रह को एक न्यायिक हैसियत उसी तरह से प्राप्त है जैसे किसी भी नागरिक को प्राप्त है। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इन देव विग्रहों को अगर न्यायिक हैसियत का स्वरूप नहीं दिया जाएगा तो आगे चलकर उनसे जुड़ी संपत्तियों के संरक्षण, संवर्धन और कराधान संबंधी अन्य जटिलताएं उत्पन्न हो जाएंगी जिससे और नई समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती हैं, जिसका कानूनी निराकरण आसानी से संभव नहीं हो सकेगा। कानून में लीगल पर्सन का अर्थ ज्यूरिस्टिक पर्सन है।
एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास कानूनी अधिकार और दायित्व होते हैं, जैसे कि कम्पनियां होती हैं जिनके पास संपत्तियां होती हैं और वे उस सम्पत्ति का प्रबंधन अपने अफसरों द्वारा करतीं हैं और अदालतों में अपने मुकदमों में पक्षकार बनती हैं। ठीक यही स्थिति और विधिशास्त्रीय दर्शन हिंदू देव विग्रह के संदर्भ में भी है। अदालत ने जीसस और मुहम्मद की जो बात की है उसके बारे में यह उल्लेखनीय है कि ईसाई धर्म मे चर्च की संपत्ति के लिए उनके विभिन्न संगठन होते हैं। कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट मेथोडिस्ट आदि विभिन्न शाखाओं के अपने अपने प्रबंधन होते हैं। इस्लाम में मूर्तिपूजा का कोई स्थान ही नहीं है। इस्लाम मे न तो अल्लाह की और न ही मुहम्मद की कोई तस्वीर बनाई जा सकती है और न ही कोई मूर्ति। मस्जिद भी इस्लाम मे एक इबादतगाह है जहां लोग एकत्र होकर नमाज पढ़ते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल ही अपने एक निर्णय में यह स्पष्ट कर दिया है कि मस्जिद इस्लाम का मूल अंग नहीं है। वहां मस्जिद और इबादतगाह की संपत्ति की जिम्मेदारी वक्फ बोर्ड की है। सुन्नी वक्फ बोर्ड उसी के आधार पर इस मुकदमे में एक पक्षकार है। इसके विपरीत, हिंदू एक बहुदेववादी धर्म है।
अलग-अलग देवता, अलग-अलग पूजा पद्धति, अलग-अलग कर्मकांड और अलग-अलग क्षेत्रीय, सामाजिक, ऐतिहासिक परिवेश के कारण हर देव विग्रह अपनी अलग और विशिष्ट स्थिति रखता है। मंदिरों और मठों के नाम हजारों एकड़ की कृषि भूमि, तथा अन्य संपत्तियां हैं। जिनके बारे में कभी भी कोई न कोई कानूनी विवाद उठता रहता ही है। यह सारी संपत्तियां भले ही इसका सुख इनके ट्रस्टी और महंत उठाएं पर ये उस मंदिर या मठ के मुख्य देव विग्रह के ही नाम होती हैं। इसीलिए अदालत ने हिन्दू देव विग्रह या देवता को अदालती भाषा मे एक न्यायिक हस्ती स्वीकार किया है।
यह मुकदमा अभी चल रहा है। अभी तीनों पक्षों को अपने-अपने जमीन के बारे में दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे। हालांकि निर्मोही अखाड़े ने अपने दस्तावेजों के बारे में यह कह दिया है कि उनके अभिलेख किसी डकैती की घटना में लूट लिए गए। अभी राम के आराध्य भाव, देवत्व पर बहस चल रही है, हालांकि यह कोई कानूनी मुद्दा ही नहीं है। कानूनी मुद्दा है, वह जमीन के मालिकाना हक के संबंध में है जिसे सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है। आज राम को इस विवादित स्थिति में पहुंचाने का दोष किसका है जब कि अदालत उनके वंशजो तक की कैफियत और प्रमाण मांगने लगी है? राम को एक षड्यंत्र की तरह, सिर्फ अपनी सत्ता प्राप्ति की महत्वाकांक्षा के लिए किसने इस्तेमाल किया है और अब भी कौन कर रहा है? राम इस सनातन संस्कृति के ऐसे नायक हैं जिनके विरुद्ध किसी ने भी कभी कुछ नहीं कहा। मुस्लिम साहित्यकारों ने खुल कर उनकी प्रशंसा में गीत लिखें। किसी ने उन्हें इमाम ए हिंद कहा तो फादर कामिल बुल्के जैसे विदेशी ईसाई विद्वान ने रामकथा पर एक कालजयी शोध ही कर डाला।
अदालत तो अदालत होती है। वह कानूनी पहलू ही देखती है, आस्था, विश्वास और राजनीति आदि नहीं। राम के संदर्भ में अदालत में कोई मुकदमा नहीं चल रहा है। आस्था और विश्वास पर कोई मुकदमा और सवाल हो ही नहीं सकता है। जिसे है तो हैं नहीं है तो नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में 2010 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले की एक अपील की सुनवाई चल रही है, जो 2.77 एकड़ विवादित भूखंड के मालिकाना हक के बारे में है। राम 2.77 एकड़ के ही दायरे में ही नहीं सिमटे हैं, वह सर्वव्यापी हैं और असीम हैं।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

(लेखक सेवानिवृत्त
आईपीएस अधिकारी हैं)

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