Home संपादकीय प्रवासियों के लिए पंचभकार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

प्रवासियों के लिए पंचभकार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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अटलजी की पहल पर शुरु हुआ प्रवासी सम्मेलन 2003 से अब तक हर साल बराबर होता चला आ रहा है। इस वर्ष नरेंद्र मोदी ने एक नई पहल की है। उन्होंने ऐसे प्रवासियों को आमंत्रित किया है, जो अपने-अपने देशों में चुने हुए जनप्रतिनिधि हैं। वे सांसद हैं, मंत्री हैं, प्रधानमंत्री हैं, राष्ट्रपति हैं, विधायक हैं, महापौर हैं।
ऐसे लगभग सवा सौ जन-प्रतिनिधि इस बार भारत आए हैं। वे पहले भी आते रहे हैं लेकिन उनका अलग से सम्मेलन पहली बार हो रहा है। प्रवासी सम्मेलन का मूल सुझाव डा. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी और हमारे राजदूत श्री जगदीश शर्मा का था। दोनों ने मिलकर जो पहला सम्मेलन दिल्ली में करवाया था, उसके एक सत्र की अध्यक्षता मैंने की थी।

उस समय हमारा लक्ष्य यह था कि सारे विश्व में फैले भारतीय मूल के ढाई-तीन करोड़ लोगों के हितों की रक्षा में भारत की सक्रिय सहायता हो। उन्हें अपनी भारतीय मूल संस्कृति से जोड़े रखने का ठोस प्रयत्न हो और भारत की विदेश नीति के लक्ष्यों को प्राप्त करने में वे सहायक हों। अटलजी की इस पहल का लाभ उन्हें भी हुआ है और हमें भी हुआ है। उन्हें अनेक प्रकार की सुविधाएं मिली हैं और अपने-अपने देशों में उच्च पदों पर पहुंचकर उन्होंने भारत का डटकर समर्थन भी किया है।

अमेरिका के ट्रंप प्रशासन पर प्रवासी भारतीयों का असर साफ-साफ दिखाई पड़ रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी विदेश यात्राओं के दौरान भारतीय मूल के लोगों को काफी प्रेरित और प्रोत्साहित किया है लेकिन असली सवाल यह है कि उन लोगों की भारतीय जड़ें कहीं सूख तो नहीं रही हैं ? वास्तव में फीजी, मोरिशस, गयाना, सूरीनाम जैसे देशों में भारतीय मूल के लोग बहुसंख्या में हैं और लगभग सभी दूर सत्ता उनके हाथों में है लेकिन जैसे भारत के भद्रलोक का पश्चिमीकरण हो रहा है, उन लोगों की भी जड़ें उखड़ रही हैं। वे भारत के लिए और भारत उनके लिए अजनबी होता जा रहा है।

उनकी मूल संस्कृति की रक्षा हो, उनका आधुनिकीकरण भी हो और अपने-अपने देश में वे घुलमिल कर रहें, इस संबंध में हमारे विदेश मंत्रालय को विशेष दृष्टिसंपन्न नीति बनानी होगी। हमारी सरकारें इस मामले में देश के अंदर ही दिशाहीन हैं तो वे विदेशों में क्या करके दिखा सकती हैं ? विश्व हिंदी सम्मेलन इसकी जीती-जागती मिसाल है। मैंने तो 1981 में अपनी ‘भारतीय विदेश नीति- नए दिशा संकेत’ पुस्तक में पंचभकार की विदेश नीति प्रतिपादित की थी याने भाषा, भूषा, भोजन, भजन और भेषज के जरिए विदेशों में भारत का प्रभाववर्द्धन किया जाए।

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