Home लोकसभा चुनाव राजनीति Political families has got lot in Indian democracy: वंशवाद का फलदार पेड़

Political families has got lot in Indian democracy: वंशवाद का फलदार पेड़

5 second read
0
0
405

अंबाला। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कई ऐसे राजनीतिक दल हैं जो अपने परिवार के इर्द गिर्द ही घूमते रहे हैं। इन राजनीतिक दलों ने केवल अपना एक अलग मुकाम हासिल किया बल्कि भारतीय राजनीति की दशा और दिशा तय करने में भी अपनी अहम भूमिका निभाई। इन दिनों चुनाव प्रचार में वंशवाद को लेकर खूब तंज कसे जा रहे हैं। आज समाज ऐसे ही राजनीतिक घरानों के बारे में बताने की कोशिश कर रहा है। कांग्रेस पर हमेशा से ही वंशवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है, लेकिन कई अन्य पार्टियां भी हैं जहां वशंवाद का फलदार पेड़ मौजूद है।

1. समाजवादी पार्टी
उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इस पार्टी की स्थापना मुलायम सिंह यादव ने 4 अक्टूबर 1992 में की थी। इस पार्टी में अधिकतर यादव परिवार के लोग ही मुख्य पदों पर हैं। जब पार्टी में नंबर दो शिवपाल यादव को मुख्यमंत्री बनाने की बात चली तो मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे अखिलेश को कूटनीतिक तरीके से आगे कर दिया और बहुत ही नाटकीय घटनाक्रम के बाद पूरी पार्टी उसे सौंप दी। शिवपाल यादव को एक अलग पार्टी बनाना पड़ी। आज यह पार्टी मुलायम परिवार की एक संपत्ति की तरह है जिन्होंने उत्तर प्रदेश पर कई सालों तक राज किया। मुलायम सिंह अपने आधे से ज्यादा रिश्तेदारों को राजनीति में ले आए हैं और उन्हें राज्य में कई महत्वपूर्ण विभाग और पद सौंपे हैं।

2.जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस
इस पार्टी का वजूद जम्मू और कश्मीर में है। शेख अब्दुल्ला ने चौधरी गुलाम अब्बास के साथ मिलकर आॅल जम्मू-कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के नाम से 15 अक्टूबर 1932 में पार्टी का गठन किया। बाद में यह पार्टी जम्मू कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के नाम से पहचानी जाने लगी। सितंबर 1951 में नेशनल कॉन्फ्रेंस सभी 75 सीटों पर जीत हासिल की और शेख अब्दुल्ला कश्मीर के मुखिया बने। 1977 के चुनाव के बाद शेख अब्दुल्ला फिर से कश्मीर के मुख्यमंत्री बने। 1982 में शेख की मौत के बाद उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला ने राज्य के मुख्यमंत्री बने और पार्टी के प्रमुख भी। फारूक के नेतृत्व में 1983 में पार्टी फिर चुनाव जीती और वे एक बार फिर राज्य के मुख्यमंत्री बने। 1987 के चुनाव के बाद फारूक अब्दुल्ला एक बार फिर राज्य के मुख्यमंत्री बने। 1996 के चुनाव में अब्दुल्ला ने 87 में से 57 विधानसभा सीटें जीतीं। वर्ष 2000 में फारूक ने कुर्सी छोड़ दी और उनके स्थान पर उनके बेटे उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बन गए। 2008 राज्य विधानसभा चुनाव में नेकां को 28 सीटें ही मिलीं, मगर उसने कांग्रेस (17) के सहयोग से सरकार बनाई। वर्तमान में फारूक अब्दुल्ला के बेटे ही पार्टी के सर्वेसर्वा हैं। इन पर आरोप लगता रहा है कि उन्होंने कभी भी देश की राजनीति नहीं की और ना ही पाटीं में किसी को नंबर दो बनने दिया। यह उनके परिवार की पार्टी बनकर रह गई।

3.राष्ट्रीय जनता दाल
लालू प्रसाद यादव ने 5 जुलाई 1997 को जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल (राजद या आरजेडी) के नाम से नए दल का गठन किया और लालू यादव लगातार कई वर्षों तक बिहार के मुख्यमंत्री बने रहे। चारा घोटाले में आरोप पत्र दाखिल होने के बाद लालू ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर पत्नी राबड़ी देवी को राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया। इसके बाद राज्य और पार्टी में बहुत उठा पटक हुआ। बाद में लालू ने जेल जाने के बाद पार्टी की कमान अपने पुत्र तेजस्वी यादवी और तेज प्रताप यादव को सौंप दी, जबकि उन्होंने अपने परिवार के अन्य वरिष्ठ सदस्यों को दरकिनार कर दिया। लालू की बेटी मीसा को 2016 में राज्यसभा का सदस्य बनी थी। उन्होंने अपने चाचा को दरकिनार कर यह पद हथियाया था। अब तेजप्रताप यादव और तेजस्वी यादव में सत्ता की जंग ने पार्टी को दो भाग में विभाजित कर दिया है। इसके भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा हुआ है।

4.जनता दल सेक्युलर
यह पार्टी कर्नाटक में अपना वर्चस्व रखती है। देश के पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने जुलाई 1999 में जनता दल सेक्युलर की स्थापना की। वर्ष 2004 में जदएस ने भाजपा के सहयोग से सरकार बनाई और देवेगौड़ा के पुत्र एचडी कुमारस्वामी राज्य के मुख्यमंत्री बने। बाद में यह सरकार 20 महीने ही चल पाई। विधानसभा के लिए वर्ष 2018 में हुए चुनाव में भाजपा 104 सीटें हासिल कर सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन किस्मत कुमारस्वामी के साथ रही और वे कांग्रेस के सहयोग से फिर राज्य के मुख्यमंत्री बने। इस चुनाव में जदएस को 38 और कांग्रेस को 78 सीटें मिली थीं। देवेगौड़ा ने इस चुनाव में अपने पोते निखिल को मांड्या और प्रज्वल को हासन लोकसभा चुनाव क्षेत्रों का प्रत्याशी घोषित कर किया है। देवेगौड़ा परिवार की तीसरी पीढ़ी को भी आगे बढ़ाया जा रहा है। एक तरफ देवेगौड़ा के छोटे बेटे कुमारस्वामी राज्य में मुख्यमंत्री पद संभाले हुए हैं वहीं कुमारस्वामी के बड़े भाई और प्रज्वल के पिता रेवन्ना लोक निर्माण विभाग के मंत्री हैं। कुमारस्वामी ने परिवारवाद की प्रथा को एक कदम और बढ़ाते हुये अपने तीसरे भाई के ससुर डीसी तमन्ना को भी राज्य के परिवहन विभाग की बागडोर थमा दी है। इस परिवार की बहुएं भी आज महत्वपूर्ण पदों पर हैं।

5.राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी-
सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग होकर महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री रहे शरद पवार, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा और तारिक अनवर ने 25 मई 1999 को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा या एनसीपी) के नाम से नई पार्टी बनाई थी। लेकिन अब यह पार्टी पूरी तरह शरद परिवार की पार्टी बन गई है। हाल ही में शरद पवार के भतीजे अजीत पवार और उनके बेटे पार्थ ने मिलकर अब पार्टी में अपने वर्चस्व की लड़ाई छेड़ दी है। हालांकि पवार खानदान की तीसरी पीढ़ी के पार्थ के चुनाव मैदान में उतरने के बाद परिवार अपनी एकजुटता की तस्वीर पेश करने की हरमुमकिन कोशिश कर रहा है। शरद पवार के भाइयों के पोतों- रोहित व पार्थ, पवार की बेटी और अपनी बुआ सुप्रिया सुले आदि सभी रिश्तेदार राजनीति में हैं। एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार अपनी पुत्री सुप्रिया सुले को लोकसभा सदस्य बनाने में नहीं चूके।

6.तेलगुदेशम पार्टी-
तेलुगु फिल्मों के सुपर सितारे एनटी रामाराव ने 29 मार्च 1982 को तेलुगुदेशम पार्टी (तेदेपा या टीडीपी) की स्थापना की। रामाराव के चमत्कारी व्यक्तित्व का ही नतीजा था कि पार्टी के गठन के बाद 9 महीने के भीतर हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी ने बहुमत हासिल किया और एनटी रामाराव आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री बने। इस पार्टी का जनाधार मुख्य रूप से आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में है। एनटीआर के निधन के बाद पार्टी की कमान उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू के हाथों में आई, जो कि वर्तमान में राज्य के मुख्यमंत्री हैं। आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर चंद्रबाबू नायडू ने एनडीए से संबंध तोड़ लिए।

7.तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस)-
आंध्रप्रदेश से तोड़कर अलग तेलंगाना राज्य बनाने की मांग को लेकर कल्वकुंतला चंद्रशेखर राव (केसीआर) ने 27 अप्रैल 2001 को तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) का गठन किया। तेलुगुदेशम पार्टी से अलग हुए राव का पार्टी गठन का एकमात्र एजेंडा तेलंगाना राज्य का गठन था। हैदराबाद को नए राज्य की राजधानी बनाने की मांग भी इसमें शामिल थी। तेलंगाना जब अलग राज्य बना तो वे वहां के मुख्यमंत्री बने जबकि उन्होंने अपने बेटे केटी रामाराव को पार्टी का अध्यक्ष बना दिया। उनका बेटा रामा राव उन्हीं की सरकार में भी मंत्री है। उनकी छोटी छोटी बहन कविता निजामाबाद निर्वाचन क्षेत्र के लिए लोकसभा में संसद सदस्य है।

8.पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी-
जम्मू कश्मीर की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (जेकेपीडीपी) के संस्थापक पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री और जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे मुफ्ती मोहम्मद सईद ने 1999 में की थी। वर्तमान में इसकी मुखिया सईद की बेटी मेहबूबा मुफ्ती हैं। सईद का राजनीतिक सफर 1950 में नेशनल कॉन्फ्रÞेंस से शुरू हुआ था, लेकिन 1959 में वे नेकां से अलग होकर डेमोक्रेटिक नेशनल कॉन्फ्रÞेंस और फिर कांग्रेस में चले गए। वर्ष 1987 में वे कांग्रेस से बाहर चले आए और वीपी सिंह सरकार में गृहमंत्री बने। इस पार्टी में इस वक्त मेहबूबा मुफ्ती के अलावा कोई दूसरा चेहरा नजर नहीं आता है।

9.द्रमुक- द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक या डीएमके)
यह एक क्षेत्रीय राजनीतिक दल है, जिसका जनाधार तमिलनाडु और पुडुचेरी में है। इसकी स्थापना 17 सितंबर 1949 में सीएन अन्नादुराई ने की थी। इसका गठन द्रविड़ कषगम नामक पार्टी के विभाजन के बाद हुआ, जिसके प्रमुख पेरियार ईवी रामास्वामी थे। दिग्गज नेता एम. करुणानिधि 1969 में डीएमके के प्रमुख बने और 7 अगस्त 2018 में अपनी मृत्यु तक वे इस पद पर रहे। अब यह पार्टी पूर्णत: एक परिवार की पार्टी बनकर गई है जिसमें करुणानिधि के वेटे स्टालिन और उनकी बेटी कनिमोझी ही सर्वेसर्वा हैं। दिवंगत मुख्यमंत्री करुणानिधि के बेटे स्टालिन के हाथ में डीएमके की कमान है। करुणानिधि पांच बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे।

10. इंंडियन नेशनल लोकदल
हरियाणा की राजनीति में इंडियन नेशनल लोकदल (इनेला) ने व्यापक प्रभुत्व स्थापित किया। पर यह भी एक परिवार की पार्टी बनी रही। इनेलो की स्थापना 1987 में ओपी चौटाला के पिता देवीलाल ने की थी। देवीलाल 1971 तक कांग्रेस में रहे थे। 1989 में देवीलाल देश के उप प्रधानमंत्री बने। देवीलाल के बाद इस पार्टी की कमान उनके बड़े बेटे ओम प्रकाश चौटाला के हाथ आई। ओपी चौटाला ने भी हरियाणा की राजनीति में अपना एक अलग मुकाम बनाया। वे भी चार बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। ओपी चौटाला की राजनीतिक विरासत उनके दोनों बेटों अजय चौटाला और अभय चौटाला के हाथ में आई। इनकी अगली पीढ़ि भी दुष्यंत चौटाला के रूप में राजनीति में है। पर वर्ष 2018 में परिवार की फूट ने पार्टी को दो फाड़ कर दिया। अब इनेलो अभय चौटाला के हाथ में है। बड़े भाई अजय चौटाला और उनके बेटे इस पार्टी से अलग हो चुके हैं।

Load More Related Articles
Load More By Aajsamaaj Network
Load More In राजनीति

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

ED’s intentions not right, ED-Chidambaram wants to spoil the image: ईडी के इरादे ठीक नहीं, छवि खराब करना चाहता है ईडी-चिदंबरम

नई दिल्ली। आईएनएक्स मीडिया मामले में पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने बुधवार को अपनी जमानत…