Home विचार मंच Plunder of the land of the tribal: आदिवासी की धरती की लूट

Plunder of the land of the tribal: आदिवासी की धरती की लूट

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आदिवासियों की भूमियों का जबरिया अधिग्रहण और उनका कू्रर विस्थापन असंतोष का बड़ा कारण है। भूमि अधिग्रहण अधिनियम, अंगे्रजों ने भारतीयों के संपत्ति अधिकार में जबरिया दखल देने बनाया था। अधिनियम जनता के खिलाफ सत्ताधीशों का हथियार बना। कई काले कानूनों को आज भी सत्ता ने अहंकार के रूप में कायम रखा है। लोकप्रयोजन के नाम पर निजी उद्योगपतियों, कारखानेदारों और संयुक्त क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए किसानों और बस्तर के संदर्भ में आदिवासियों की जमीनें आपात प्रावधानों के तहत सरकारें छीनती रही हैं। निजी क्षेत्रों का हित लोकप्रयोजन कैसे हो सकता है। न्यायालय कुछ साहसी अपवादों को छोड़ पीड़ित की सहायता करते नजर नहीं आते। कभी पूर्व सूचित भी हो सकती है। एयर कंडीशनर कमरों में बैठे मंत्री लाचार किसानों और आदिवासियों को गुर्राते हैं, उन्होंने आदेश कर दिया। किसान पीड़ित हैं तो अदालतों में चुनौती दें। भूमि अधिग्रहण में वनवासियों की संख्या सबसे ज्यादा है। प्रशासन उन्हें आंख की किरकिरी समझता है। वे अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं तो राजद्रोह तक के अपराधी करार दिए जाते हैं।
लोकतंत्र हिंसा में सुलग रहा है। संविधान की मंशा और संस्थाएं सफल नहीं हो पार्इं। सदियों से गरीब, ग्रामीण, आदिवासी तथा दलित वन, चारागाह और जल स्त्रोतों जैसे झील, नदियों, कुओं, तालाबों आदि पर निर्भर हैं। जल स्त्रोतों, वनों और खुली भूमियों पर भ्रष्ट नेताओें, महत्वाकांक्षी उद्योगपतियों और अंग्रेजियत बुद्धि के नौकरशाहों की गिद्ध-दृष्टि पड़ने लगी। कमजोर तबकों को पारम्परिक अधिकारों और सुविधाओं से बेदखल किया जाने लगा। गरीब बनाम अमीर, शहर बनाम गांव, उच्च वर्ण बनाम आदिवासी-दलित के बीच खाई अंग्रेजों के जमाने से ज्यादा चौड़ी की जा रही है। सरकार के कारण देश में शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और यातायात आवास और रहन सहन के दो संसार बना दिए गए हैं। एक विलासिता को मौलिक अधिकार मानता है और दूसरे के मौलिक अधिकारों को विलासिता समझता है। एक का इलाज विदेशों में होता है और दूसरों के लिए इलाज कराना विलासिता जैसा होता है। एक पब्लिक स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाकर आईआईटी और आईआईएम के माध्यम से नौकरी करने विदेशों में भेजता है। दूसरे के लिए स्कूल, शिक्षक और पाठ्य सामग्री तक मुहैया नहीं कराई जाती। एक पांच सितारा संस्कृति के स्वप्न महल में जीता है। दूसरा वह जिसका आजादी मिलने के बाद स्वप्न भंग होने से उसे दिन में अनगिनत तारे ही तारे दिखाई देते हैं। एक जिसे गगनचुंबी अट्टालिकाएं चाहिए और दूसरा वह जिसे अब खुले आसमान के नीचे सोना भी फुटपाथों तक पर मयस्सर नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 39 की आयत का बने सरकारी लोग संविधान-विरोधी स्वर का अजान देकर मजाक उड़ा रहे हैं। संसद में संविधान पंडित जोर से नारे लगा रहे हैं कि नक्कारखाने में आदिवासी तूतियों की आवाज ही गुम हो जाए।
संविधान ने हिदायत दी थी सामाजिक और आर्थिक गैरबराबरी दूर की जाएगी। अनुच्छेद 14 ने कहा राज्य भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। समाज के कुलीनों ने जाति, लिंग और असमानताएं उगाकर देश के बहुजन को वंचित बना दिया है। संविधान निर्माताओं ने वचन दिया था सामाजिक भेदभाव, छुआछूत, घरेलू हिंसा और कमजोर वर्गों पर अत्याचारों को खत्म किया जाएगा। शोषित तबके में निजी और सामूहिक क्रोध तथा अलगाव आना स्वाभाविक है। भारतीयों में दब्बूपन है। सदियों से मुट्ठीभर विदेशी आक्रांताओं की गुलामी करते आए हैं। शिक्षा, ज्ञान, संचार और वैज्ञानिक साधनों के बढ़ते जाने से धीरे-धीरे एक तरह के समझदार सामाजिक बंधुत्व का घनत्व अब उभर भी रहा है। ऐसा लक्ष्ण वंचितों को हौसला देता है कि असंवैधानिक अत्याचारों का प्रतिकार करें। नक्सलवाद जन विरोध की सबसे उग्र और हिंसात्मक शैली होने पर भी जन विरोध का वाचाल उदाहरण भी तो है।
सरकार के पास किसानों, मजदूरों और मध्यवर्ग के लिए सब्सिडी नहीं है। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और अन्य लोकोपयोगी योजनाओं के लिए धन नहीं है। वह उद्योगपतियों की सेज पर सोकर रोम के नीरो या लखनऊ के वाजिद अली शाह की तरह आचरण करती है। किसानों की भूमियों के छिनने का नतीजा देश में महंगाई या भ्रष्टाचार की दीमकों के बढ़ने का है। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक जीवन पर कारपोरेट जगत के कब्जा करने का यह घिनौना समय है। राजनीतिज्ञ और नौकरशाह अंतरराष्ट्रीय आर्थिक शब्दावली में एजेंट जैसी भूमिका करने अभिशप्त हैं। धरती, आकाश, पानी, पृथ्वी और अग्नि तक से संबंधित कानून ताक पर रख दिए गए हैं। न्यायपालिका ब्रिटिश जुमले में समझाती है। राज्य की सार्वभौमिक शक्ति के बाबत घोषणा अदालतें कैसे कर सकती हैं। सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष मौसेरे भाइयों की भूमिका में हैं। भारत में कारपोरेटीकरण फैलने के सबसे ज्यादा आसार हैं। भारत पश्चिम के लिए सबसे बड़ा उपनिवेश है। सत्ता और उद्योग में धड़ल्ले से अंग्रेजी भाषा बोली जाती है। संविधान और लोकतंत्र में बहुत से चोर दरवाजें खोज लिए गए हैं। भूमिका नव धनाड्य वर्ग को सौंपी गई है। उनकी देह भारत और आत्मा विदेश में है। वहां उनके स्वप्न महल हैं। विदेशी जीवन शैली, नृत्य, संगीत, भोजन, भाषा, पोशाक, बैंक, यात्राएं, इलाज वगैरह भारत नामक टापू में सार्थक हो सकेंगे। यहां धरती सस्ती। महंगाई की मस्ती और मजदूरी तो क्या नेताओं की घूस की दरें भी सस्ती हैं। विकास के नाम पर औपनिवेशिक कानूनों का चोला ओढ़कर जन, धन और मन धरती के साथ हड़पा जा रहा है।
भूमिहीनता और बेकारी झेल रहे आदिवासी परंपराओं के कारण वन का परिवेश नहीं छोड़ना चाहते। नवऔद्योगिकवाद खस्ताहाल आदिवासियों को हर वक्त आशंकित रखता है। धमकाता है उनको मौजूदा रहवास बल्कि अधिवास से खदेड़ दिया जाएगा। आर्थिक उदारवाद (उधारवाद) का शोर है। औद्योगीकरण के अनुपात में श्रमिकों का नियोजन कहां हुआ है। आधुनिक टैक्नोलॉजी का तमगा लगाए उद्योग नियोजन में मजदूरों की संख्या लगातार घटाते जाने को औद्योगिक उत्कर्ष कहते हैं। गरीबी रेखा के नीचे के बस्तर के आदिवासी अकुशल श्रमिकों को नौकरी की गारंटी भी कहां दी जा रही है जिससे केन्द्र और राज्य सरकारों की कथित विकास योजनाओं में नामधारी प्रतिभागी तो बनें। सड़कें ज्यादा बनीं या आदिवासियों की प्रगति के रास्तों पर रोड़े अटकाए गए-वक्त को इसका भी जवाब देना होगा।

कनक तिवारी
(लेखक छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।)

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