Home विचार मंच One more Jumala – Modi will only come Vaiya Shining India?: एक और जुमला-आएगा तो मोदी ही वाया शाइनिंग इण्डिया?

One more Jumala – Modi will only come Vaiya Shining India?: एक और जुमला-आएगा तो मोदी ही वाया शाइनिंग इण्डिया?

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मिडिया द्वारा भ्रमित मोदी फैन्स दिन रात यही उगल रहे हैं लेकिन विपक्ष छोड़ अब तो उनके अपने भी कहने लगे हैं की बहुमत मुश्किल है। पहले सुब्रमन्यम स्वामी फिर राम माधव और कल जदयू के सेक्रेटरी जनरल श्री के सी त्यागी ने भी मान लिया कि मोदी का बहुमत आना संभव नहीं है। 2004 में भी कमोबेश यही कहना था मिडिया व भाजपा सपोर्टर का हालांकि तब अटल जी से नाराजगी नहीं थी उन्हें अजात शत्रु माना जाता है आज भी न ही विपक्ष उनके विरोध में लाम बंद हुआ था जैसा आज मोदी विरोध में हो चला है। साम दाम दंड भेद के इस्तेमाल के बावजूद मोदी सरकार बनने की संभावनाएं क्षीण दिख रही हैं। न केवल श्री मोदी के मुखमंडल की आभा गायब है अपितु दिन ब दिन उनके व्यक्तव्यों से हताशा साफ जाहिर होने लगी है। अत्याधिक आत्मविश्वास से ग्रस्त हो उन्होंने स्वयं अपने पांव में कुल्हाड़ी मार ली है। वे अपनी पार्टी में ही अकेले पड़ गए। अब न तो पार्टी के कद्द्वर नेता शिवराज चौहान, वसुंधरा राजे, उमाभारती, रमनसिंह कहीं दीखते सुनते हैं न रामदेव कहीं दिख रहे हैं न ही आरएसएस उनके साथ दिख रहा है। 2014 में अन्ना आन्दोलन, आरएसएस व जनता ने उन्हें जो सहयोग दिया था मजरूह साहिब के शेर को उलट कर देखें तो उनके हालत स्पष्ट हो जायेंगे।
मैं तो कारवां लेकर चला था जानिबे मंजिल / लोग छोड़ते गए और मैं अकेला रह गया। यही संकेत पिछले कुछ दिनों से श्री मोदी की देहभाषा भी दे रही है। यही नहीं श्री मोदी द्वारा 6 मई के ओडिसा दौरे में नवीन पटनायक की सराहना व बिन मांगे एक हजार करोड़ की सहायता की घोषणा भी चुनाव के बाद पटनायक से सहायता याचना के रूप में देखी जा रही है, ममता की बुराई के बाद उन्हें फोन करना प्रायोजित साक्षात्कार में ममता लारा मिठाई भेजने का जिक्र या फिर माया को सरे आम चेताना कि अखिलेश व कांग्रेस उनके साथ खेल खेल रहे हैं उनकी दिनोदिन बढ़ती हताशा का परिचायक है। अगर ऐसा हुआ तो 23 मई के बाद कैसी सरकार बनेगी?
र अगर मोदी 220 सीट तक पहुंच तो एक बार वे राष्टÑपति द्वारा सरकार बनाकर बहुमत हेतु पर्याप्त समय प्राप्त करने की स्थिति में तो वे हैं। भारत में परम्परा भी है अहसान उतारने की। जैसे ज्ञानी जैलसिंह ने खुद कबूला था कि इन्दिरा जी की हत्या के बाद सबसे वरिष्ठ प्रणव मुखर्जी को शपथ न दिला कर विदेश से राजीव गांधी के आने तक इंतजार कर उन्होंने इन्दिरा जी के अहसान को उतारा था, लेकिन क्या अभी से अपने तेवर दिखा रहे नीतीश उनके साथ आयेंगे या शिव सेना, अकाली आदि अन्य सहयोगी जो मोदी शाह जोड़ी की कार्य शैली से नाराज हैं उन्हें सपोर्ट करेंगे यह यक्ष प्रश्न है। दूसरे क्या भाजपा में उनके विरोध में आवाज नहीं उठेगी?
र दूसरा सीन है मोदी जी को 200 से कम सीट आने का, तब अगर मोदी मैदान छोड़ दें तो किसी अन्य भाजपाई नेता संभवत गडकरी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बन सकती है। क्योंकि श्री गडकरी को न केवल एन डी ए के सहयोगी सहर्ष स्वीकार कर लेंगे अपितु कई अन्य यथा डी एम के, चंद्रबाबू नायुडू नवीन पटनायक तथा अखिलेश का सहयोग मिल सकता है संभवत पुराने सहयोगी ममता भी आ जाए समर्थन को और महाराष्टÑ के नाम पर शायद शरद पवार भी सहयोग को राजी हो जाएं।
र तीसरी संभावना है गैर भाजपाई गैर कांग्रेसी मोर्चे के गठन की जिसकी कोशिश तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने आरम्भ कर दी है। के.सी.आर. ने विधान सभा का चुनाव पहले करवाकर अपने राजनीति में दक्षता, परिपक्वता प्रमाण तो दिए ही थे अपनी पार्टी में अपनी अजेय छवि बना ली। अगर दोनों चुनाव साथ होते तो मोदी शाह उनकी मांद में सेंध अवश्य लगाते। लोक सभा चुनाव के दौरान उनकी बेटी का यह कहना कि अब पिता केंद्र में राजनीति करेंगे के बाद के सी आर 6 मई को केरल के मुख्यमंत्री से मिलना, 13 को स्टालिन से मीटिंग तथा शीघ्र 19 के बाद वे ममता माया अखिलेश व लालू पुत्र तेजस्वी से भी मिल सकते हैं लेकिन के.सी.आर. बड़े खिलाड़ी हैं और तेलंगाना पहले तमिलनाडु फिर आंध्र का हिस्सा रहा है अत: वे इन राज्यों में अपनी पैठ करना चाहे इस लिए नहीं लगता कि चंद्रबाबू नायडू व स्टालिन उन्हें सहयोग देंगे। यह भी हो सकता है वे गडकरी आदि के संपर्क में हों। मोदी शाह अगर 150 पर सिमिट गए तो वे माया ममता चंद्रबाबू को न बनने देने हेतु नीतीश, के.सी.आर., या स्टालिन तक को सपोर्ट कर सकते हैं क्योंकि उन्हें माया ममता व चंद्रबाबू से बदले का भय लगा रहेगा कि वे उनकी अलमारी से रफेल नोटबन्दी आदि के सकेल्टन निकाल उनकी मुसीबत खड़ी कर सकते हैं।
र बहन जी मायावती वे कि दलित एजेंडे को परोस कर सत्ता में आना चाहेगी और संभवत उनका खुला विरोध दलित वोट खोने के डर से कोई नहीं करेगा। अखिलेश व कांग्रेस को छोड़ वे किसी के लिए राजनैतिक खतरा नहीं दिखेंगी क्योंकि आजतक वे उत्तर प्रदेश से आगे नही जा सकी हैं अत उन्हें दक्षिण से सपोर्ट मिल सकती है।
र ममता बनर्जी : मोदी से हर विभाग में टक्कर लेने के श्रेय के साथ ममता दीदी सबसे अधिक सशक्त दावेदार हो सकती हैं, लेकिन उनकी यही उर्जा अन्य दलों के लिये खतरे की घंटी भी है क्योकि एक बार इनके सत्तासीन होने बनने के बाद महत्वाकांक्षी ममता स्थाई रूप से मुस्लिम वोट बैंक को अपना बना सकती है और ऐसी नीतियां भी ला सकती हैं जिनसे उनको राष्टÑीय राजनीति मे एक लम्बी पारी की हैसियत प्राप्त कर लें। इसलिये इनका ताकतवर होना ही इनका सबसे बड़ा निगेटिव पाइंट है।
र कूट नीतिज्ञ चंद्र बाबू नायडू , न केवल अच्छे प्रशासक हैं अपितु तीसरे मोर्चे की शुरुआत करने वाले तथा मोदी के विरुद्ध खड़े होने वाले पहले दक्षिण भारतीय राजनेता हैं। उनकी राजनीति भी आंध्र प्रदेश के आगे नही है इसलिये बाकी दल उनको स्वीकार कर सकते है। राहुल से दोस्ती कर उन्होंने दिखा दिया है कि वे राजनैतिक दुराग्रह से ग्रसित नहीं हैं।
र नितीश कुमार : नितीश मोदी का साथ देकर बदनाम हो गए संभव है कि कुछ शर्तों के साथ कांग्रेस सहित कुछ अन्य दल राजद को छोड़ उनके साथ आ जाएं हालांकि वे इस दौड़ में पिछड़ चुके हैं।
र अन्तिम संभावना 2004 में बेमन से कांग्रेस कमान संभाल रही सोनिया को कोई नही मान रहा था कि वे अटल को हरा सकती हैं, तो गुजरात कर्नाटक में मोदी शाह के पसीने निकलवाकर तीन राज्यों में पटकनी देकर क्या डार्क हॉर्स की भूमिका में नहीं देखे जा सकते हैं। अगर सभी अनुमान ताक में रखकर कांग्रेस 150 से पार निकल जाए तो शायद राजद अखिलेश, शरदपवार स्टालिन व वाम पंथियों के सहयोग से राहुल का नम्बर आ जाए। हालांकि मनमोहन जैसे किसी अन्य प्लेयर को कांग्रेस स्वीकार न करेगी और यही बात संभवत कांग्रेस के लिए हेंडीकेप साबित हो। बहरहाल 23 मई के बाद का घटना क्रम बेहद दिलचस्प होगा। जनता रूपी ऊंट करवट लेता लग रहा है, किस करवट बैठेगा ये तो समय ही बतायेगा।
श्यामसखा श्याम
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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