Home विचार मंच One country, one election and constitutional condition: एक देश, एक चुनाव और संवैधानिक स्थिति

One country, one election and constitutional condition: एक देश, एक चुनाव और संवैधानिक स्थिति

4 second read
0
0
190
2019 में सत्तारूढ़ होने के बाद सरकार ने अपनी प्रथम प्राथमिकता घोषित की है, एक देश एक चुनाव। सरकार का यह एजेंडा पहली बार नहीं सामने आया है, बल्कि सरकार का यह पुराना एजेंडा है। सालभर पहले भी सरकार यह मुद्दा उठा चुकी है और अब फिर यह मुद्दा उठाया जा रहा है। एक देश एक चुनाव क्यों चाहिए यह न तो सरकार ने अब तक बताया है और न ही सत्तारूढ़ दल के थिंक टैंक ने। इस पर बहस शुरू हो चुकी है, आज का विमर्श इसी बिंदु पर है।
भारत में 26 जनवरी 1950 को संविधान के लागू करने के बाद पहला चुनाव 1952 में हुआ था। हमारा संविधान संघीय ढांचे का संविधान है। देश की प्रशासनिक और विधायिक व्यवस्था केंद्र और राज्य में बंटी है। केंद्र और राज्य की अलग-अलग शक्तियां तय हैं। राज्य के जो विषय हैं, उनमें वे स्वायत्त होते हैं और केंद्र के अधीन होते हुए भी अपने प्रशासनिक और नीति निर्माण के मामलों में स्वतंत्र हैं। यह संघवाद संविधान के मूल ढांचे का एक अंग है जिसे संशोधित या बदला नहीं जा सकता है। अब भारत के संसदीय लोकतंत्र के निर्वाचनों के इतिहास पर एक नजर डाल ली जाए।
1947 में देश को पहला मंत्रिमंडल मिल गया था। संविधान सभा गठित हो चुकी थी। उस अवधि में गवर्नमेंट आॅफ इंडिया एक्ट 1935 के अनुसार और अन्य ब्रिटिश भारत के कानूनों के अनुसार, देश की शासन व्यवस्था चल रही थी। संविधान जब बना तब, देश मे निर्वाचन के लिए निर्वाचन आयोग की स्थापना हुई और चुनाव कराने के नियम उपनियम बने। हालांकि 1937 और इसके पहले भी ब्रिटिश राज में देश में चुनाव हुए थे। पर न तो वे उतने व्यापक थे, और न ही उतने प्रभावी सरकार के लिए हुए थे, जितने कि 1952 के बाद के चुनाव थे। ब्रिटिश काल मे सदन को कॉउन्सिल कहा जाता था। इनके भी चुनाव होते थे। पर वास्तव में सारा प्रशासकीय दारोमदार और जिम्मेदारी वायसराय और उनके सीधे अधीनस्थ नियुक्त गवर्नर या लेफ्टिनेंट गवर्नर साहबान पर था। वायसराय की सहायता के लिए उसकी सलाहकार परिषद होती थी। जो अपनी बात कहते तो थे, पर उनकी बात या सलाह, मानने के लिए वायसराय बाध्य नहीं था। वायसराय सीधे ब्रिटिश संसद के अधीन था।
लेकिन जब नया संविधान बना तो 1947 के पांच साल बाद 1952 में इसी संविधान के अनुसार में देश मे पहला आम चुनाव हुआ। हमारा संविधान और संसदीय लोकतंत्र का स्वरूप वेस्ट मिनिस्टर लोकतंत्र पर आधारित है। हालांकि संविधान निर्माताओं ने दुनिया में उपलब्ध सभी शासन प्रणाली और संविधान का अध्ययन किया पर हमारे संविधान और शासन व्यवस्था का मूल आधार ब्रिटिश राज व्यवस्था ही थी। हमारा संविधान लिखित संविधान है जब कि ब्रिटेन का संविधान अलिखित है और 1215 ई. के मैग्नाकार्टा के बाद समय-समय पर होने वाली परम्परा से विकसित है।1952 ई से लेकर 1967 तक देश में लोकसभा और राज्यों की विधानसभा के चुनाव साथ-साथ हुए। 1952 से लेकर 1967 तक कांग्रेस का बोलबाला रहा। केंद्र और राज्यों में लगभग सभी जगह उसी की सरकारें थीं। तब तक सभी सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करतीं रहीं। विरोध में कोई मजबूत दल नहीं था। क्षेत्रीय दलों में केवल द्रविड़ कषगम और द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम का ही उभार था। कम्युनिस्ट पार्टी केरल और बंगाल में मजबूत जरूर थी। पर 1963 में जब डॉ. राममनोहर लोहिया फर्रुखाबाद से उपचुनाव में जीत कर संसद में पहुंचे तब देश को विपक्ष की भूमिका और महत्व का आभास हुआ।
डॉ. लोहिया ने संसद में सबसे पहला अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत किया। बहसें हुर्इं और प्रस्ताव गिरा भी। यह जानते हुए भी कि यह प्रस्ताव गिरेगा, लेकिन विरोध एक संवैधानिक कर्तव्य और विपक्ष का यह एक संवैधानिक दायित्व है, डॉ. लोहिया ने यह प्रस्ताव लोकसभा में नेहरू सरकार के विरुद्ध पेश किया। 1967 तक आते आते देश मे गैर कांग्रेसवाद का एक माहौल बन गया। यह शब्द और यह सिद्धांत भी डॉ. लोहिया की ही देन था।
जब 1967 में देश मे सभी चुनाव एक साथ हुए तो, कांग्रेस का एकाधिकार खत्म हो चुका था।  केंद्र में तो कांग्रेस रही। लेकिन कई राज्यों में गैर कांग्रेसी दल जीत कर सत्ता में आए, पर वे अल्पजीवी साबित हुए। उधर कांग्रेस में भी बिखराव शुरू हो चुका था। 1969 में वह दो भागों में बंट गई। एक को सिंडिकेट, कांग्रेस एस कहा गया दूसरी को इंदिरा गांधी के नाम पर कांग्रेस आई । सिंडिकेट किसी के नाम पर नहीं कहा गया था, बल्कि पुराने और अनुभवी कांग्रेस के नेताओं, मोरारजी, अतुल्य घोष, के कामराज और निजलिंगप्पा आदि के गुट को  अंग्रेजी शब्द सिंडिकेट से संबोधित किया गया। जगजीवन राम इंदिरा कांग्रेस के अध्यक्ष बने। फिर 1971 में लोकसभा का चुनाव हुआ। लेकिन विधानसभाओं के चुनाव तब नहीं हुए थे। तभी से लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग होने लगे। यह एक प्रकार की संवैधानिक बाध्यता थी।
1967 के बाद उत्तरप्रदेश के संदर्भ का एक उदाहरण दृष्टव्य है, जिससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि दोनों ही विधायिकाओं के चुनाव एक साथ बिना संविधान बदले नहीं कराए जा सकते हैं अगर राज्य की विधानसभाये या लोकसभा अपनी निर्धारित संवैधानिक कार्यकाल पूरा नहीं करते हैं तो। 1967 में उत्तरप्रदेश विधान सभा त्रिशंकु हो गई, और दो साल में ही 1969 में पुन: मध्यावधि चुनाव हुए। जब कि केंद्र की सरकार चल रही थी। फिर 1974, 1977, 1980, 1985, 1989, 1991, 1993, 1996, 2002, 2007, 2012, 2017 में विधानसभा के चुनाव हुए। 1967 से लेकर 2002 तक कोई भी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई, और मध्यावधि चुनाव होते रहे। 2002 के बाद स्थिरता बनी और तब से सभी सरकारें अपना कार्यकाल पूरा कर रही हैं।अब इसी अवधि में लोकसभा की स्थिति भी देखें। 1967 के बाद लोकसभा का चुनाव 1972 में होना चाहिए था जो एक साल पहले ही सरकार ने लोकसभा भंग करने की सिफारिश कर के उसे 1971 में ही करा दिया था।
1969 के कांग्रेस विभाजन के बाद इंदिरा गांधी की सरकार वामपंथी दलों के समर्थन पर टिकी थी, लेकिन पूर्ण और स्वतंत्र बहुमत की आशा से, इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग करने की सिफारिश कर दी। 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा को पूर्ण बहुमत मिला। संविधान के अनुसार 1971 के पांच साल बाद 1976 में चुनाव होने चाहिए थे पर कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए कि 1975 में सरकार ने आपातकाल की घोषणा कर दी और एक साल के लिए चुनाव टाल दिया। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी जो ढाई साल में ही बिखर गई और फिर 1980 में चुनाव हुए। कांग्रेस फिर सत्ता में आई। नियमानुसार अब चुनाव 1985 में होने चाहिए थे। लेकिन 31 अक्टूबर को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद चुनाव फिर पहले खिसका दिए गए जो 1984 में हुए। 1989 तक यह सरकार चली फिर वीपी सिंह पीएम बने, फिर चंद्रशेखर अंतत: 1991 में पुन: चुनाव हुए जिसके बाद पांच साल तक स्थिरता बनी रही। फिर 1996 में निर्धारित चुनाव हुए। लेकिन 1996 के बाद 1998, 1999 में जल्दी-जल्दी चुनाव हुए क्योंकि केंद्र में कोई भी स्थायी सरकार इन चुनावों के बाद नहीं बन पाई थी। 1996 से 1998 तक की अवधि में इंद्रकुमार गुजराल, एचडी देवगौड़ा और अटल जी प्रधानमंत्री बने। फिर 1999 में चुनाव हुए और भाजपा नेतृत्व में एनडीए की चुनी हुई सरकार बनी जो अपना कार्यकाल पूरा कर के, 2004 तक चली। तब से 2009,और 2014 के आम चुनावों में स्थायी सरकार रही।
2019 में अभी हुए लोकसभा के चुनाव में भी पूर्ण बहुमत की सरकार है जो 2024 तक चलेगी। अगर यह मान भी लिया जाय कि किसी संवैधानिक संशोधन से यह समस्या हलकर के दोनों चुनाव एक साथ करा भी दिए जांए तो क्या भविष्य में यह प्रणाली चल पाएगी? इस बात की क्या गारंटी है कि बाद में चुनकर आने वाली लोकसभा और विधानसभाएं त्रिशंकु नहीं होंगी और सभी आदर्श स्थिति में अपना कार्यकाल पूरा करेंगी? राज्य की विधानसभाओं के भंग होने पर या विधानसभा की सुशुुप्तावस्था (सस्पेंडेड एनिमेशन की दशा) में होने पर राष्ट्रपति शासन का तो प्राविधान है पर लोकसभा भंग होने की स्थिति में पूरे देश को राष्ट्रपति शासन के अंतर्गत रखने का कोई भी प्राविधान नहीं है। छह महीने से अधिक अवधि में संसद का गठन और अधिवेशन बुलाया जाना अनिवार्य है।
इसलिए भविष्य में फिर वही स्थिति आ जाएगी जिसमे लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ नहीं कराए जा सकेंगे। संविधान में अगर संशोधन द्वारा ऐसी समस्याओं का निदान किया भी गया तो देश संघीय ढांचे से अलग हट जाएगा और जब-जब लोकसभा के चुनाव होंगे तभी समस्त विधानसभाओं के भी चुनाव कराने पड़ेंगे।  भारत का संविधान एक संघीय ढांचा को मान्यता देता है। भारत एक संघ है। राज्य और संघ सबके अलग-अलग अधिकार और शक्तियां हैं। इस व्यवस्था को संविधान संशोधित करके भी तोड़ा नहीं जा सकता है। क्यों यह संविधान का मूल ढांचा है और संसद को संविधान का मूल ढांचा बदलने का कोई अधिकार नहीं है, यह सुप्रीम कोर्ट 1973 में केशवानंद भारती के एक प्रसिद्ध मुकदमें में अपनी व्यवस्था दे चुका है। उपरोक्त कारणों और संभावनाओं के कारण, पूरे देश मे एक साथ चुनाव कराना संभव नहीं है।
इस विषय पर चर्चा करने के बजाय निर्वाचन आयोग द्वारा दिए गए चुनाव सुधारों पर चर्चा करना और उसे लागू करना अधिक उपयुक्त होगा। एक देश एक चुनाव, कानून के छात्रों के लिये एक अकादमिक मुद्दा हो सकता है, पर यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं है कि सरकार इसे प्राथमिकता में रहे। लोकसभा और सभी विधानसभाएं अपना निर्धारित कार्यकाल पूरा करके ही जनादेश के लिए जनता के बीच चुनाव के लिए जाए, यह एक आदर्श स्थिति है पर अगर ऐसा नहीं होता है तो उस विधानसभा या लोकसभा का मध्यावधि चुनाव होगा न कि देश की सारी विधानसभाओं को पुन: भंग कर के चुनाव में झोंक दिया जाए।

विजय शंकर सिंह
(लेखक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी हैं)

Load More Related Articles
Load More By VijayShanker Singh
Load More In विचार मंच

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

Need for professional approach to improve the economy: अर्थव्यवस्था के सुधार को प्रोफेशनल दृष्टिकोण की आवश्यकता

जैसे जैसे समय बीतता जा रहा है वैसे वैसे देश की आर्थिक स्थिति गंभीर होती जा रही है। रिजर्व …