Home विचार मंच Not yet ready to compete in Haryana: हरियाणा में मुकाबले को अभी तैयार नहीं महारथी

Not yet ready to compete in Haryana: हरियाणा में मुकाबले को अभी तैयार नहीं महारथी

0 second read
0
0
249

हरियाणा की दस लोकसभा सीटों पर इस बार सबकी नजर है। इसकी वजह यह भी है कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने रोहतक, सिरसा और हिसार को छोड़कर हरियाणा की सभी 7 सीटों पर अपना कमल खिला दिया था। रोहतक में हरियाणा के पूव मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के पुत्र दीपेंद्र सिंह हुड्डा और हिसार से दुष्यंत चौटाला चुनाव जीते थे। इस बार भी भारतीय जनता पार्टी की कोेशिश अपना गढ़ बचाने और रोहतक, हिसार और सिरसा की बची हुई सीट पर भी कमल खिलाने की है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और उनकी पार्टी का संगठन अपनी तरफ से चुनाव जीतने की जद्दोजहद कर रहे हैं, उससे तो नहीं लगता कि इस बार भी हरियाणा में कांग्रेस का पंजा मजबूत होकर भाजपा का कमल उखाड़ पाएगा। वैसे असल टक्कर तो हरियाणा में भाजपा और कांग्रेस की बीच ही है। विखंडित चौटाला परिवार अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से गठजोेड़ कर अलबत्ते इसे त्रिकोणीय बना रहा है। यह गठजोड़ भाजपा की राह का रोड़ा न बने, इसलिए पंजाब और उत्तराखंड की तर्ज पर भाजपा ने हरियाणा में भी शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन कर लिया है।
यह भी सच है कि परिवार में बिखराव के बाद इनेलो शायद पहले जैसा प्रदर्शन न कर सके। जींद उपचुनाव में परिवार की फुटमत की बानगी से पूरा हरियाणा परिचित है। देखा जाए तो इसका लाभ उसे होना तय है। पहले प्रकाश सिंह बादल और देवीलाल की दोस्ती के चचे आम हुआ करते थे। प्रकाश सिंह बादल ने देवीलाल के बाद भी यथासंभव इस रिश्ते को निभाया भी था लेकिन अभय चौटाला ने नहर के पानी के विवाद में बादल परिवार से रिश्ता तोड़ लिया। इस मौके को लपकने में भाजपा ने जरा भी देर नहीं लगाया। पंजाब में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल एक दूसरे के सहयोगी भी रहे हैं। यही वजह है कि ज्यों ही कैप्टन अभिमन्यु ने बादल परिवार से हरियाणा में सहयोग की बात की तो उन्होंने बिना शत सहयोग करना स्वीकार कर लिया।
हरियाणा में 13 लाख सिख मतदाता हैं। कई जिलों में सिखों की बहुत ज्यादा तादाद है, इसका लाभ भाजपा को मिल सकता है। हालांकि कांग्रेस की नजर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह पर है। उनके प्रचार करने से शायद सिख मतदाताओं का रुझान कांग्रेस की ओर हो जाए। वैसे इंडियन नेशनल लोकदल से संबंध विच्छेद के बाद यह पहला अवसर है, जब अकाली दल हरियाणा में भाजपा का बिना शत समथ न कर रही है। यह और बात है कि वर्षांत में होने वाले चुनाव में भाजपा और अकाली दल मिलकर चुनाव लड़ेंगे। अंबाला, कुरुक्षेत्र, करनाल और सिरसा में सिख मतदाता निर्णायक भूमिका अदा करते रहे हैं। सिरसा के डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के जेल में होने की वजह से भाजपा को डेरा प्रेमियों के वोट बिदकने की चिंता सता रही थी। अकाली दल से हुए हालिया समझौते ने भाजपा की पेशानी पर आए बल को बहुत हद तक कम कर दिया है। भले ही सिरसा की सीट इनेलो के पास है लेकिन चौटाला परिवार के विभाजन के बाद वह स्थिति अपने पक्ष में तो कर ही सकती है। अभी राज्य की भिवानी,महेंद्रगढ़,फरीदाबाद, गुड़गांव,करनाल,अंबाला, कुरुक्षेत्र और कुरुक्षेत्र में भाजपा का कमल खिला था। जाट आरक्षण का मामला भले ही अभी शांत हो लेकिन इससे नुकसान के खतरे ने भी राज्य में भाजपा की नींव उड़ा रखी है। जननायक जनता पार्टी और आप के तालमेल के बाद संतुलन कुछ गड़बड़ाया जरूर है लेकिन इससे ज्यादातर नुकसान कांग्रेस को ही होता नजर आ रहा है। हरियाणा की दस सीटों पर किसका वर्चस्व होगा, यह सवाल हर आम और खास की जुबान पर है। कांग्रेस की चिंता जहां हरियाणा में पंजे को मजबूती देने की है, वहीं बिखरे चौटाला परिवार को भी अपनी अस्तित्व रक्षा करनी है। भाजपा ने भले ही अपनी सभी सीटों पर सारे प्रत्याशी उतार दिए हों लेकिन कांग्रेस ने अभी 6 सीटों पर ही अपने प्रत्याशी उतारे हैं। चार पर या तो उसे जीत सकने योग्य प्रत्याशी नहीं मिल पा रहे हैं या वह अभी असममंजस में है। जननायक जनता पार्टी ने 4 प्रत्याशी उतार दिए हैं लेकिन आप अभी तक सुयोग्य उम्मीदवार नहीं तलाश पाई है। इनेलो ने सिरसा में वत मान सांसद चरण सिंह रोड़ी पर ही पुनश्च दांव आजमाया है। हिसार से उसके प्रत्याशी सुरेश कोथ वहां के मौजूदा सांसद दुष्यंत चौटाला का खेल बिगाड़ने को बेताब हैं। इसके अलावा इनेलो ने फरीदाबाद, अंबाला, रोहतक, कुरुक्षेत्र, करनाल, भिवानी-महेंद्रगढ़, सोनीपत में भी अपने प्रत्याशी उतार रखे हैं। राज्य में 12 मई को चुनाव होने हैं और पार्टियां अभी तक प्रत्याशी ही तय नहीं कर पाइ हैं। ऐसे में वे चुनाव की तैयारियां कैसे कर पाएंगी। कितनी मजबूती से जनता के बीच अपना पक्ष रख पाएंगी, यह विचार का विषय है। हरियाणा में लोकसभा चुनाव वैसे तो भाजपा और कांग्रेस के बीच ही है लेकिन जननायक जनता पार्टी और आप का गठबंधन खेल तो बिगाड़ेगा ही।
शिवकुमार शर्मा
(लेखक इंडिया न्यूज के डिप्टी एडिटर हैं)

Load More Related Articles
Load More By Shiv Sharma
Load More In विचार मंच

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

Accepting the challenge of Haryana is not easy for anyone: हरियाणा की चुनौती स्वीकारना किसी के लिए आसान नहीं

हरियाणा का गढ़ जीतना इस बार भाजपा नेतृत्व के लिए अगर बड़ी चुनौती है तो कांगे्रस, आप और जजपा …