New arrow of CM Manohar Lal Khattar’s election quiver: सीएम मनोहर लाल खट्टर के चुनावी तरकश का नया तीर

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कमाल की घोषणा की है। उन्होंने मृत कर्मचारियों के परिजनों को दो विकल्प दिए हैं या तो सरकारी नौकरी ले लो या उतनी राशि जितनी कि उस मृत कर्मचारी को सेवानिवृत्ति की उम्र तक मिल थी। दोनों ही विकल्प काटने-बराने लायक नहीं है। मृतक आश्रित कोटे के तहत नौकरी पाना भी बहुत आसान नहीं है। जूते घिस जाते हैं विभागों के चक्कर लगाते हुए। पैसे ले लेने का विकल्प भी बुरा नहीं है, लेकिन इसमें एक पेंच है कि सरकारी कर्मचारी की उम्र मृत्यु के दिन 48 साल से अधिक नहीं होनी चाहिए। यदि सेवारत कर्मचारी की मृत्यु 48 वर्ष की आयु के बाद होती है, तो आश्रित परिवार को सिर्फ उसकी रिटायरमेंट तारीख (58 वर्ष) तक पूरा वेतन मिलेगा, नौकरी नहीं। इससे पहले व्यवस्था यह थी कि पहले कर्मचारी जिस विभाग में काम करता था, उसी विभाग में उसके आश्रित को नौकरी दी जाती थी, लेकिन नई नीति के तहत अब ऐसा नहीं होगा। अब आश्रित परिजन को उसकी योग्यता के अनुसार किसी भी विभाग में मृत कर्मचारी के पद से एक ग्रेड नीचे के पद पर नौकरी मिलेगी। सशर्त विकल्प ही सही, लेकिन इससे आमजजन की सुविधा तो बढ़नी ही है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने दूर की कौड़ी खेली है। जाहिर तौर पर इसका लाभ भाजपा को हो सकता है।
गौरतलब है कि हरियाणा में 13 साल बाद फिर से एक्सग्रेसिया पॉलिसी लागू हो रही है। इसके लिए खट्टर सरकार ने खाका भी तैयार कर लिया है और कैबिनेट नोट भी। बस कुछ जरूरी औपचारिकताओं को इस बावत पूरा किया जाना है। 2006 से पहले तक यह नीति थी भी, लेकिन वर्ष 2006 में एक्सग्रेसिया पॉलिसी को तत्कालीन सरकार ने खत्म कर दिया था। उसके बाद से लेकर आज तक सेवारत कर्मचारियों के आकस्मिक निधन पर उनके परिजनों को सरकारी नौकरी का लाभ नहीं मिल पा रहा था। मृतक कर्मचारियों के आश्रित को पेंशन आदि भी पुराने मानकों के आधार पर ही मिलती थी। इसे लेकर मृत कर्मचारियों के परिजनों में आक्रोश भी था। मृत कर्मचारियों के परिजन एक संगठन बनाकर प्रदेश में इस नीति को फिर से लागू करवाने के लिए सरकार पर दबाव डाल रहे थे। उन्होंने इस निमित्त हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल को ज्ञापन भी सौंपा था। सरकार ने भी अपने घोषणा पत्र में कर्मचारियों से इस पॉलिसी को लागू करने का वादा किया था। देखा जाए तो लोकसभा चुनाव से ठीक पहले इस तरह का वादा कर मुख्यमंत्री ने राज्य में भाजपा की चुनावी राह आसान कर दी है। जींद विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में जीतने के बाद मनोहर लाल खट्टर ने कहा था कि केंद्र अगर चाहे तो हरियाणा विधानसभा के चुनाव भी आम चुनाव के साथ ही कराए जा सकते हैं।
लोकसभा चुनाव सिर पर हो तो राजनीतिक सक्रियता वैसे ही बढ़ जाती है। वादों का भानुमती पिटारा खुल जाता है। जनता की पूछ-परख बढ़ जाती है। हर राजनीतिक दल उसके हितों की सोचने लगता है। विपक्षी दल तो आसमान से तारे तोड़ लाने, तूफान से कश्ती निकाल लाने के बड़े-बड़े दावे कर गुजरते हैं। वे पूरे होंगे भी या नहीं, इस पर विचार नहीं करते। उन्हें दिखाई देती है केवल मछली की आंख। अपना उद्देश्य। आपन कुशल कुशल जग माहीं। अपने कुशल के लिए हजारों लाखों वादे किए जा सकते हैं। नीति भी कुछ यही कहती है कि लोभियों के शहर में ठग उपासा नहीं मरता। राजनीति के सिपहसालार जनता को लोभी ही मानते हैं। लोकतंत्र में जनता संप्रभु होती है। उसके जनादेश से ही सरकारें बनती और बिगड़ती है। उसके जनादेश से ही राजनीतिक दलों का उत्थान और अवसान हुआ करता है लेकिन विडंबना यह है कि राजनीतिक दल उसी जनता को लोभ का पुतला मान बैठते हैं। लोकतंत्र में मालिक कब नौकर से भी बदतर स्थिति में आ जाता है, पता ही नहीं चलता। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दो-तीन बड़े वादे किए हैं। पहला यह कि उनकी सरकार अगर केंद्र में बनी तो आतंकी घटनाओं में मरने वाले शहीदों को शहीद का दर्जा देने का प्रयास करेगी। प्रयास तो प्रयास है। सफल हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है। वे कह रहे हैं कि किसानों के सभी कर्ज माफ करेंगे। वादों में बड़ी ताकत होती है, वे तत्काल लाभ के दरवाजे तक पहुंचा देते हैं। वादा जबर्दस्त हों तो अंदर एंट्री भी हो जाती है। भाजपा भी वादों में सिद्धहस्त है। वादों की किमियागिरी दरअसल उसने कांग्रेस से ही सीखी है लेकिन अब पहले जैसे हालात नहीं रहे। पहले नेता वोट लेकर गायब हो जाता था। पांच साल में एकाध बार ही वह अपने भाग्य विधाता यानी जनता के बीच जाता था। तब कहा जाता था कि वादे हैं, वादों का क्या? लेकिन अब जनता जागरूक हो गई है। जनप्रतिनिधि एकबार जनता को भूल जाता है कि लेकिन जनता है कि जनप्रतिनिधि को भूलती ही नहीं। उसके हर ठिकानों पर जाती है। जनता जागरूक हो गई है। अब वादे कर के कोई भूल नहीं सकता। वादा किया तो निभाना पड़ेगा, वाले हालात बन गए हैं। पहले लोग पढ़ते-लिखते कम थे। आजकल हर घर में पढ़ाई-लिखाई का माहौल है। अनपढ़ भी खुद के बच्चे को पढ़ा लिखाकर विद्वान बनाना चाहता है। केंद्र सरकार के कई मंत्री, यहां तक कि प्रधानमंत्री भी इन दिनों धुुआंधार विकास परियोजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण कर रहे हैं। हरियाणा में उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के लोग धड़ल्ले से रोजगार पा रहे हैं। ऐसे में वहां रोजगार कोई मुद्दा नहीं है। सामान्य जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर केंद्र सरकार ने पहले ही सबका-साथ सबका विकास की राह आसान कर दी है। कांग्रेस, इनेलो भी जोर आजमाइश कर रही है। सभी अपने-अपने स्तर पर वादे कर रहे हैं लेकिन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का यह दांव विपक्ष की चुनावी रणनीति पर हथौड़े की तरह ही मारक है। सरकार लोकसभा चुनाव से पहले इस तरह के कई और वादागत अस्त्र अपने तरकश से निकाल सकती है। भाजपा जानती है कि केवल वादों से काम नहीं चलेगा। इसलिए वह चुनाव के दौरान किए गए अपने एक-एक वादों को पूरा कर रही है। कुल मिलाकर यह निर्णय हरियाणा के मृत कर्मचारियों के आश्रितों को तो राहत देगा ही।

शिवकुमार शर्मा
(लेखक इंडिया न्यूज के डिप्टी एडिटर हैं)

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