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Nepal is not like A B C D…“ए बी सी डी” नहीं रहा नेपाल!

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प्रधानमंत्री सार्क देशों को फिर से एकजुट करना चाहते हैं। इसके अलावा उन्होंने और पड़ोसी देशों को भी अपने पाले मेंलाने की कोशिश की है, ताकि इन छोटे-छोटे देशों को मजबूती दी जा सके। यकीनन तब भारत इनका सिरमौर होगा। लेकिन इस प्रधानमंत्री की इस मंशा के पूरी होने में पाकिस्तान एक बड़ा अड़ंगा है, और दूसरी अडचन है नेपाल। अब पाकिस्तान की पंगेबाजी तो समझ में आती है। लेकिन नेपाल का अड़ना भारतमें सभी को अजीब लग रहा है। उनको लगता है, कि नेपाल में बहुसंख्यक हिंदू हैं, और कुछ वर्षों पूर्व तक वह एक घोषित हिंदू राष्ट्र रहा है, फिर वह भारत से थोड़ा बिदका क्यों रहता है। आखिर भारत में तो हिंदू 80 परसेंट हैं। मज़े की बात कि उसका झुकाव भारत के चीर-शत्रु चीन तथा पाकिस्तान की तरफ ज्यादा रहता है। विदेश मंत्रालय के अधिकारी इस पेंच को समझ नहीं पाते। अथवा कहा जाए, कि वे समझने की कोशिश ही नहीं करते। दरअसल भारत के अधिकारी नेपाल को ए बी सी डी समझते हैं। इसकी व्याख्या यूं समझिए- ए यानी अर्दली,बी मायने बावर्ची, सी चौकीदार और डी दरबान!

यही दंझते हुए हमने नेपाल को अपना स्वाभाविक पिछलग्गू समझ रखा है। बस इसी एक समझ से पूरी समझ पर पर्दा पद जाता है। यह सही है, कि नेपाल एक छोटा देश है, गरीब है और कई चीजों के लिए भारत पर निर्भर भी। लेकिन इसके बावजूद वह एक प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र है। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती, न उसे अपमानित किया जा सकता है। बल्कि बराबरी का सम्मान उसे देना ही होगा। नेपाल की इस नाराजगी को समझने के लिए वहाँ जाकर वहाँ के लोगों का मूड भाँपना होगा। पिछले दिनों मैंने नेपाल जाकर उनकी इस अबूझ पहेली को समझने की कोशिश की थी।

काठमांडू में होटल की खिड़की खोल कर मैंने देखा, कि बाहर हल्की-फुल्की बारिश और चारों ओर घनघोर घटा छायी थी। ऐसा लगता था मानों यह काली घटा सरग-पताल अँधियारा करने पर आमादा है। ऐसी ही सुबह हम नाश्ते के बाद करीब दस बजे काठमांडू से पोखरा के लिए निकले। काठमांडू से पोखरा कोई सौ किमी दूर होगा मगर रास्ते पर बार-बार के कट और गड्ढे याद कर हम घबरा रहे थे। ऐसे में हमारी वोल्वों बसें बीस किमी प्रति घंटा की स्पीड से आगे बढ़ नहीं पाती थीं। ऊपर से हर आधे घंटे बाद किसी न किसी सवारी को पेशाब या चयास महसूस होने लगती थी। हमारे सारे सहयात्री तीन बसों में सवार थे। किचेन हमारे साथ अलग एक टाटा सेवन गाड़ी में चल रही थी जिसमें दो महिलाएं, तीन पुरुष व खाना बनाने का सामान लदा था और कुछ गैस सिलेंडर भी। काठमांडू शहर पार करने में ही दो घंटे लग गए क्योंकि जाम और चढ़ाई-उतराई में काफी समय जाया हो गया। और फिर वही हुआ जैसा हम सोच रहे थे। एक जगह मिट्टी के ढहने से जाम लगा था और हमारी गाड़ी रेंगती हुई पार हुई तो एक ढाबे में जाकर रुकी। नाश्ता पच चुका था और जमकर भूख लगी थी लेकिन किचेन मनकामनेश्वरी पहुंच चुकी थी। यानी मनकामनेश्वरी में ही लंच मिलेगा। हम उस ढाबे पर उतरे जिसमें साफ-सुथरे टायलेट्स थे और एक नहीं पांच-पांच। सबने राहत महसूस की। वहां पर नूडल्स थे साठ रुपये प्लेट और चाय बीस रुपये की। वही यहां पर भी हुआ यानी कि जिसने नेपाली मुद्रा दी उसे नेपाली साठ रुपये देने पड़े और जिसने भारतीय मुद्रा दी उसे सौ के बदले उसने चालीस ही वापस किए। जिसके पास जो करेंसी थी वही उसने रख ली और वापस कुछ नहीं किया। वहां से हम आगे बढ़े तो करीब घंटे भर बाद मनकामनेश्वरी मंदिर पहुंचे जाकर।

मनकामनेश्वरी मंदिर दरअसल त्रिशला के उस तरफ पहाड़ की चोटी पर एक देवी मंदिर है। उस मंदिर तक पहुंचने के लिए एक रोप वे है। यह रोप वे दुनिया का सबसे लंबा और सबसे ऊँचा रोप वे है। करीब साढ़े तीन किमी लंबा और 1300 मीटर ऊँचा। यहां पर रोपवे पर सवारी के लिए 800 रुपये लगते हैं यानी इंडियन करेंसी के 500 रुपये। लंच बनने में देरी थी इसलिए अधिकांश लोगों ने रोप वे के जरिये मंदिर तक जाने की ठानी। यहां पर रोपवे के जरिये मंदिर की ऊँचाई तक पहुंचने में करीब बीस मिनट लगते हैं। वहां पर रोपवे स्टेशन से मंदिर कोई आधा किमी की दूरी पर है। मंदिर मैं गया पर वहां पर भी मैं बाहर बैठकर फोटो खींचता गया। यहां के मंदिर में लोग अपनी मन्नत और श्रद्घा के अनुसार भैंस, बकरा अथवा मुर्गे की बलि चढ़ाते हैं । मैं मंदिर परिसर के बाहर चुपचाप बैठकर उन पशुओं को ताकता रहा जिनकी अम्माएं खैर मना रही थीं कि आज मेरे बच्चे की बलि रुक जाए।

अपने सहयात्रियों को देर लग रही थी। मंदिर परिसर में बलि दिए जाने वाले पशुओं की बलि की कतार देख-देखकर मैं आकुल-व्याकुल हो रहा था इसलिए वहां से उठकर मैं एक चाय की दूकान पर चला गया। वहां पर उस दूकान की मालकिन की रुचि चाय परोसने में नहीं बल्कि बियर, व्हिस्की अथवा वोदका परोसने में ज्यादा थी। पर चूंकि मैं अकेला ग्राहक था इसलिए उसने मुझे अनमने भाव से चाय दी। फिर बड़बड़ाती हुई बोली- ये लोग हमें ए बी सी डी ही समझते रहेंगे। मेरे कुछ पल्ले नहीं पड़ा इसलिए मैने पूछा- दीदी ये ए बी सी डी क्या है? एक परदेसी ग्राहक द्वारा दीदी बोलने से वह पचासेक बरस की गौरांग महिला पसीजी और बोली- तुम लोग हमको ए बी सी डी समझता है? मेरे यह पूछने पर कि मतलब बताओ दीदी वह बोली- अर्दली, बावर्ची, चौकीदार और दरबान। अब मुझे इसका एब्रीविवेशन समझ आया तो मुझे हँसी आई पर मैने उसे रोकते हुए कहा कि नहीं दीदी, ऐसा तो नहीं है। हमारे यहां तो नेपाल के लोग बड़े बहादुर और पढ़े-लिखे तथा समझदार होते हैं। पता नहीं किसने तुमको ऐसा कह दिया। फिर मैने उसे बताया कि दीदी कलकत्ता में मेरे पड़ोसी जंगबहादुर थापा थे जो उस वक्त नेपाल के कलकत्ता स्थित कांसूलेट जनरल थे और थापा साहब का बावर्ची, दरबान सब बिहार और पूरब के लोग थे। मेरे ऐसा कहे जाने पर वह मुझसे खूब हिलमिल गई। उसने मुझसे चाय के पैसे नहीं लिए और नेपाल की एक टोपी उपहार में दी। मैं सोचता रहा कि बड़का भाई बनने के चक्कर में हम भारतीयों ने अपने छोटे भाई को कैसे नफरत में घोल दिया है। यही कारण है कि हर नेपाली दार्जिलिंग के गोरखा आंदोलन को सपोर्ट करता है और उसे यह भी लगता है कि भारत की सरकार हमारे देश को अस्थिर करने के लिए मधेशी आंदोलन को उकसाती है।

हम जिस रास्ते से मंदिर गए थे उसी रोपवे के जरिये वापस आ गए। शाम पांच बज रहे थे और तब तथाकथित लंच हमने किया। समझ नहीं आ रहा था कि इसे लंच कहा जाए या भ्रंच। कुछ साहसी लोगों ने त्रिशला की धार में खड़े होकर फोटो खिंचवाई और हम फिर आगे बढ़ चले पोखरा की ओर जो वहां से अभी चालीस किमी था। रास्ता फिर खराब ही था और धीरे-धीरे चलते हुई हमारी बसें करीब रात नौ बजे पोखरा शहर में दाखिल हुईं पर फेवाताल के करीब स्थित हमारे होटल तक पहुंचने में हमें एक घंटा और लग गया। होटल एक गली में था और उस गली में बसें जा नहीं सकती थीं इसलिए हमें अपना सामान स्वयं लादे-फादे करीब एक फर्लांग दूर उस होटल में जाना पड़ा। गर्मी और थकान से हम पस्त थे मगर और कोई रास्ता नहीं था। सामान होटल के कमरे में फेका और जाकर पसर रहे। तब तक पसरे रहे जब तक रसोड़े का बुलावा नहीं आया।

शंभूनाथ शुक्ल

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