Home संपादकीय Need to think about Ayodhya in new ways: अयोध्या मामले पर नए तरीके से सोचने की जरूरत

Need to think about Ayodhya in new ways: अयोध्या मामले पर नए तरीके से सोचने की जरूरत

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लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट की तरफ सभी की निगाहें लगी थी। उम्मीद की जा रही थी कि सुप्रीम कोर्ट कुछ ऐसा फैसला देगी जिससे अयोध्या मामले का निपटारा हो जाएगा। पर सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद को मध्यस्थता के जरिये सुलझाने का फैसला सुनाकर एक बार फिर इस मामले को एक तरह से लटका दिया है। कोर्ट फैसले पर पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने जबर्दस्त तरीके से चुटकी ली है। काटजू ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा कि मैं अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का कोई सिरा ही समझ नहीं पा रहा हूं। इसलिए मैं सिर्फ यही कह सकता हूं कि- जय रंजन गोगोई। काटजू के इस कटाक्ष पर बहस छिड़ गई है। बहस इस पर भी है कि पिछले कई बार मध्यस्था से जब कोई सार्थक रिजल्ट नहीं निकल सका है तो इस बार क्या होगा? मंथन करना जरूरी है कि क्या अयोध्या विवाद का हल मध्यस्थता ही है? क्या सुप्रीम कोर्ट तटस्थ होकर कोई फैसला नहीं सुना सकता है?
पूर्व जज काटजू ने अपने बयानों को आगे बढ़ाते हुए एक और ट्वीट किया। उन्होंने प्रश्न किया है कि क्या कोई मुझे बता सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने मीडिएशन करने का आदेश दिया है या फिर मेडिटेशन या मेडिकेशन? मैं समझ नहीं पा रहा हूं। दरअसल काटजू का प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अयोध्या विवाद कोई साधारण मामला नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता के जरिए अयोध्या में राम मंदिर केस का समाधान करने को कहा है। कोर्ट ने मध्यस्था के लिए तीन मध्यस्थों का पैनल नियुक्त किया है। यह पैनल दोनों पक्षों से बातचीत करेगा और मामले का हल निकालने का प्रयास करेगा। यहां यह बेहद महत्वपूर्ण है कि तीनों ही मध्यस्थ साउथ से बिलॉन्ग करते हैं। तीनों तमिलनाडू से हैं। एक मध्यस्थ सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस कलीफुल्ला हैं, तो दूसरे वकील श्रीराम पंचू, जबकि तीसरे मध्यस्थ आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर हैं। इस पैनल की अध्यक्षता की जिम्मेदारी जस्टिस कलीफुल्ला को सौंपी गई है। यह पैनल चार हफ्ते में अपनी रिपोर्ट देगा।
इस पूरे मामले में सबसे अहम तथ्य यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया से इस पूरे मामले पर रिपोर्टिंग नहीं करने की बात कही है। हालांकि अंतिम निर्णय मीडिएशन पैनल पर छोड़ा गया है कि इसमें कैसे और क्या किया जाना चाहिए। मीडिया को मामले की रिपोर्टिंग न करने को कहकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव के माहौल को शांत बनाने का प्रयास किया है। यह सच्चाई है और इसमें दोराय नहीं कि राम मंदिर मुद्दे को लेकर पूरे भारत की मीडिया भी दो भाग में बंटा हुआ है। ऐसे में चुनाव के माहौल में जिस तरह की अग्रेसिव रिपोर्टिंग मीडिया करता है उसमें माहौल खराब होने का डर है। राम मंदिर पर सुनवाई या मध्यस्थता भी ठीक वैसे समय हो रही है जब पूरा देश चुनाव मोड में आ चुका है। मध्यस्था भी फैजाबाद में ही होनी है। ऐसे में खबर बाहर आने से रोका भी नहीं जा सकता है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने अघोषित गाइड लाइन पहले ही तय कर दी है। अब मंथन करें कि क्यों सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त किए गए पैनल पर विवाद हो रहा है। दरअसल तीनों मध्यस्थ साउथ से आते हैं। उत्तर भारतीय को इसलिए शामिल नहीं गया होगा क्योंकि हो सकता है कि राम के प्रति आस्था मध्यस्था आड़े आती हो। पर साथ ही यह भी मंथन जरूर करना होगा कि आखिर धर्मगुरु श्रीश्री रविशंकर को इसमें शामिल क्यों किया गया है। याद करिए श्रीश्री रविशंकर के पिछले बयानों को। एक बार तो उन्होंने यहां तक कह दिया था कि अयोध्या में जन्मभूमि पर राम मंदिर नहीं बना तो देश में सीरिया की तरह गृहयुद्ध छिड़ जाएगा। ऐेसे में मध्यस्था के वक्त क्या माहौल बनेगा इसे आसानी से समझा जा सकता है।
एक बात और समझने को है। ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा है कि मध्यस्था के साथ मामले का हल निकालने का प्रयास किया जा रहा है। इससे पहले भी कई बार ऐसे प्रयास हो चुके हैं। हर बार नतीजा सिफर ही रहा है। यहां एक बात और गौर करने योग्य है कि श्रीश्री रविशंकर ने भी 2017 में मध्यस्थता के जरिये विवाद का हल निकालने की कोशिश की थी। श्रीश्री और शिया वक्फ बोर्ड के तत्कालीन चेयरमैन वसीम रिजवी मुस्लिम व हिंदू पक्षकारों से मिले और बातचीत की, लेकिन कोई हल नहीं निकला। ऐसे में दोबारा उन्हें पैनल में शामिल करने से विवाद और गहरा हो गया है। वर्ष 2017 में ही सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस जेएस खेहड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने भी विवाद को संवेदना और आस्था से जुड़ा मामला बताया था। चीफ जस्टिस खेहड़ ने पक्षकारों को आपसी रजामंदी से विवाद सुलझाने का सुझाव दिया गया था। पर यह कोशिश भी सिरे नहीं चढ़ सकी थी।
इस मामले को मध्यस्था के जरिए सुलझाने का प्रयास दशकों से चल रहा है। वाजपेयी सरकार में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। साल 1986 में कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य ने इस विवाद को बातचीत से सुलझाने की कोशिश की। उनकी और आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तत्कालीन चेयरमैन के बीच बातचीत हुई, लेकिन मामला लटका ही रहा। 1990-91 के बीच प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शरद पवार और राजस्थान के मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत की मध्यस्थता में बात कराई। उम्मीद जताई गई कि हल निकल जाएगा। पर सरकार गई और बात गई। 1991 में पीवी नरसिंह राव की सरकार में भी समझौते की रणनीति पर काम किया गया। सुबोधकांत सहाय की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई। तीन हल सुझाए गए, लेकिन बात नहीं बन पाई। बाद में मामला इतना पेंचीदा हो गया कि 1992 में ढांचा गिरा दिया गया। इसके बाद मामला और भी गंभीर बनता गया। इसके बाद लंबे समय तक मामला कभी कोर्ट में लटका रहा कभी ठंडे बस्ते में। वर्ष 2012 में बाबरी मस्जिद पक्ष के मुद्दई हाशिम अंसारी से बातचीत करके हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञानदास ने भी मामले में समझौते की कोशिशें की। एक खाका भी तैयार किया, लेकिन यह भी परवान नहीं चढ़ सका।
ऐसे में समझने और मंथन करने की जरूरत है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों एक बार फिर मध्यस्था के जरिए विवाद को सुलझाने के लिए फॉर्मूला खोजने का प्रयास शुरू किया है। यह माना जा सकता है कि आने वाले समय में चुनाव है। ऐसे में क्या सुप्रीम कोर्ट कोई रिस्क लेना नहीं चाहती थी? क्या एक बार फिर अयोध्या का मामला वैसे ही लटका रहेगा जैसे पहले लटका था? हालांकि उम्मीद पर दुनिया टिकी है। ऐसे में सकारात्मक सोच रखना भी जरूरी है। उम्मीद करिए कि इस बार देश को निराश नहीं होना पड़ेगा। हालांकि यह भी जरूरी है कि अयोध्या मामले को एक नए नजरिए से सोचने की भी जरूरत है। यह नया नजरिया क्या होना चाहिए इस पर गंभीरता से मंथन जरूरी है।
कुणाल वर्मा
Kunal@aajsamaaj.com
(लेखक आज समाज के संपादक हैं )

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