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Nature embellish wishes: कामनाओं को संवारती है प्रकृति

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मानव जीवन कामनाओं से भरा है। कुछ कामनाएं पूरी होती हैं और कुछ के पूरी होने की इच्छा लिए वह इस संसार से विदा ले लेता है। लेकिन ऐसा कोई मनुष्य नहीं होगा जिसने अपने जीवन में कोई कामना नहीं रखी हो। मानव जीवन की जो मुख्य कामनाएं हैं वे उनमें पहली तो स्वस्थ रहने की कामना और दूसरी समृद्घि की कामना फिर वंश चलते रहने की कामना। इसके बाद नंबर आता है परलोक में सुख पाने की कामना। इन समस्त कामनाओं से भरा हुआ है मानव मन। सुख-समृद्घि के तमाम रूप हैं और परलोक में सुख की कामना का आधार धर्म है पर स्वस्थ रहने की कामना ही सबसे मूर्त और कामन कही जा सकती है। क्योंकि स्वस्थ रहने के कुछ मूलभूत भौतिक सिद्घांत हैं और वे ही मनुष्य को स्वस्थ बने रहने को प्रेरित करते हैं। स्वास्थ्य का संबंध बहुत कुछ आपके खानपान और आचार-विचार से है और वह औषधियों से अलग है। व्यक्ति दवाई खाकर भी बीमार रहता है और बिना दवाई खाए भी एकदम स्वस्थ। प्रकृति का हर प्राणी स्वस्थ रहने के उपाय करता है और वह प्राकृतिक उपाय होते हैं। जल-थल और नभचर सब के सब स्वस्थ रहने के लिए कोई न कोई प्राकृतिक उपाय करते ही हैं और ये उपाय उन्हें उनकी परंपरा से मिल जाता है जिसके लिए उन्हें किसी विशेष ट्रेनिंग के नहीं मिलती। मसलन किसी भी वन्य प्राणी को चोट लगने पर वह कोई न कोई झाड़ी या प्राकृतिक पौधे का सहारा लेता है और कुछ दिनों बाद वह भला-चंगा हो जाता है। वन्य जीव विशारद बताते हैं कि वन प्रांतर में जिस तरह एक जीव दूसरे के प्रति हिंसक होता है और वह उसका स्वभाविक और प्राकृतिक भोजन होता है इस वजह से जंगल में प्राणियों का जीवन हर पल खतरे से भरा रहता है और तब उनका उपचार प्रकृति अपने सहज रूप में ही करती है।
मध्य काल के हिंदी कवि अब्दुर्रहीम खानखाना का एक दोहा है- रहिमन बहुभेषज करत, ब्याधि न छांड़ै साथ। खग-मृग बसत अरोगबन हरि अनाथ के नाथ।। यानी जंगल में बसने वाले प्राणियों की रक्षा हरि भगवान स्वयं करते हैं और यह भगवान और कोई नहीं प्रकृति ही है। प्रकृति की मदद से निरोग रहने का यह उपाय हमें हमारी परंपरा और अनुभव सिखाता है। जब भी कोई तकलीफ होती है हमारे पास प्रकृति का इलाज भी रहता ही है। आप ज्यादा दूर न जाएं अपनी रसोई में ही हमें तमाम ऐसे नुस्खे मिल जाएंगे जो बीमारी से लड़ने में मुफीद हैं। हमारे खानपान की हर चीज किसी न किसी नुस्खे से जुड़ी है। यह इसलिए क्योंकि यह अनुभवजनित ज्ञान है। शीत ऋतु में पेट में दर्द हो तो हमारी दादी-नानी डॉक्टर के पास ले जाने के पहले अजवाइन और काला नमक देती थीं। हम पाते थे कि उनका यह नुस्खा किसी भी डिग्रीधारी डॉक्टर के पर्चे से अधिक कारगर होता था। बच्चा बहुत रो रहा है और मां परेशान है तो अचानक कोई बड़ी-बूढ़ी प्रकट होती थी और वह हींग का लेप बच्चे की नाभि पर लगा देती और हम पाते कि बच्चा चुप और मजे से खेलने लगता। ऐसे एक नहीं असंख्य उपाय हैं जो प्रकृति ने हमें दे रखे हैं बस उन्हें सहेजना है और समझना है। जीवन में अनुभव से बड़ी कोई सीख नहीं है। जिसने यह अनुभवजन्य ज्ञान हासिल कर लिया उसने अपनी पहली कामना स्वस्थ रहने की कामना पर जीत दर्ज कर ली।
रसोई हमारे खानपान की जान है और वहां पर रखी हर चीज के कोई न कोई औषधीय गुण हैं पर हम उन्हें या तो जानते नहीं अथवा जानते भी हैं तो अनदेखी करते हैं। हमारा आयुर्वेद हमारी रसोई के अनुभव से ही बना है। अनुभव आवश्यकता के बूते पनपता है। जब भारत में जैनियों और बौद्घों की देखादेखी वैष्णव पंथ का चलन बढ़ा तब अहिंसा और जीवहत्या के विरोध में एक बड़ी जमात खड़ी हुई और उसने शाकाहार में ही तमाम ऐसी चीजें ईजाद कीं जो हमें हमारे शरीर को हर वह चीज मुहैया होने का भरोसा देती थी स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक है। मसलन जाड़े में तामसी भोजन के स्थान पर कलौंजी अथवा काला जीरा का प्रचलन। गोंद, अलसी और आटे के लड्डू जाड़े में मुफीद माने जाते हैं और वह भी इसलिए क्योंकि जाड़े में व्यक्ति गर्मियों की तुलना में ज्यादा भोजन तो करता ही है साथ में ऐसा भोजन करता है जिससे उसके शरीर का संतुलन बिगड़ता है और वह कोलोस्ट्रोल आधिक्य का शिकार हो जाता है। ऐसे में अलसी उसके लिए रामबाण है। इसी तरह मक्के की रोटी के साथ सरसों का साग का संतुलन भी बेजोड़ है। मक्के का आटा वात बढ़ाता है यानी शरीर में वायुरोग गैस का प्रकोप करता है पर सरसों की तासीर गर्म है और वह इससे मुक्त देता है। इसी तरह बाजरे की रोटी को उड़द की दाल के साथ खाया जाता है। बाजरे की तासीर गर्म है और उड़द की ठंडी। इसलिए दोनों का मेलजोल शरीर को रोगों से मुक्त रखेगा। ऐसे एक नहीं हजारों उदाहरण हमारी रसोई में मिल जाएंगे। कढ़ी, कद्दू, कटहल और मशरूम तीनों चीजें वातरोगियों के लिए जहर के समान हैं पर इन रेसिपी को बनाने के लिए मेथी, लहशुन और अजवायन का इस्तेमाल होता है वह इसके जहर को कुंद कर देता है और वातरोगी भी इन रेसिपी का लुत्फ उठाता है।
कभी किसी जंगल में जाकर देखिए वहां पर जब भी कोई प्राणी घायल होता है या उसे चोट लगी होती है तो वह किसी न किसी झाड़ी के पास जाकर अपने उस घाव को घिसता है और थोड़ी देर बाद ही रक्त प्रवाह बंद हो जाता है और वह फिर से उछल-कूद करने लगता है। यानी उस वन्यप्राणी को यह अपने अनुभव और हेरिडिटी से पता होता है कि अमुक झाड़ी उसके इस रोग के लिए कारगर है। यह कला प्रकृति उसे सिखाती है और प्रकृति की यह देन उसकी आवश्यकता के अनुरूप हुई है। ठीक इसी तरह मनुष्यों के लिए भी प्रकृति ने अपने अनमोल तोहफे दे रखे हैं। पर उसे समझने की जरूरत है। फौरी निदान के लिए ये उपचार रामबाण बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त हमारा शरीर एक संतुलन की मांग करता है। अर्थात यदि हम अपने मनोवेगों पर काबू पा लें तो तमाम आधुनिक बीमारियों से दूर रह सकते हैं। मसलन उच्च रक्तचाप, हृदय रोग समस्या, मधुमेह और अवसाद आदि। आज ज्यादातर लोग उन समस्याओं से ग्रस्त हैं जिनका संंबंध उसके अपने मनोवेगों से है। इसलिए अगर स्वस्थ रहना है तो अपना खानपान सुधारें और अपने आचार-विचार भी।

शंभूनाथ शुक्ल
(लेखक वरिष्ठ संपादक रहे हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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