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Nationalism and India’s concept: राष्ट्रवाद और भारत की अवधारणा

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23 मई की देर शाम तक लोकसभा चुनाव 2019 के लगभग सभी नतीजे आ गए थे और भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल चुका था। 24 मई की सुबह, अपेक्षाकृत शांत और फुसफुसाहट भरी थी। हालांकि एक्जिट पोल ने नतीजों का संकेत दे दिया था, फिर भी अधिकांश लोगों के लिए यह नतीजे अप्रत्याशित रहे। अब एक नई सरकार 30 मई को शपथ लेगी और वह पांच साल सत्तारूढ़ रहेगी। यह चुनाव कई मामलों में पिछले चुनाव से अलग रहा, विशेषकर चुनाव के मुद्दों के बारे में।
अमूमन चुनाव में आर्थिक नीतियां, बेरोजगारी, महंगाई, विकास, आदि मुद्दे सतह पर रहते हैं, पर इस चुनाव में ऐसे कोई मुददे चर्चित नहीं हुए। इसका कारण यह भी नहीं है कि देश की आर्थिक स्थिति ठीक थी, बल्कि इसका कारण यह रहा कि सत्तारूढ़ दल ने चुनाव का मुद्दा ही राष्ट्रवाद के इर्द गिर्द समेट दिया और आतंकी हमले, सर्जिकल स्ट्राइक और राष्ट्रवाद मुद्दे के रूप में उभर कर सामने आ गए। राष्ट्रवाद एक ऐसा मुद्दा है जिसका विरोध हो भी नहीं सकता है, जिस के स्वरूप पर बहस तो हो सकती है पर राष्ट्रवाद का विरोध नहीं किया जा सकता है। अकादमिक बहस में राष्ट्रवाद के विभिन्न रूपों और उसके खतरों पर बहस तो हो सकती है पर चुनाव में राष्ट्रवाद के विरुद्ध कहा गया एक भी शब्द राष्ट्रविरोधी सिद्ध किए जाने के लिए पर्याप्त है।
अब जब चुनाव ही राष्ट्रवाद के मुद्दे पर लड़ा गया है और जनादेश भी इसी मुद्दे पर है तो आर्थिक मुद्दे की बात करना फिलहाल उचित नहीं है। पर जिस राष्ट्रवाद की बात चुनाव के दौरान की जा रही थी, वह किस प्रकार का राष्ट्रवाद है यह जानना जरूरी है। विचारधारा के आधार पर अमूमन चुनाव कम ही होते हैं, पर यह चुनाव जनसरोकार को छोड़कर विचारधारा के आधार पर केंद्रित हो गया। चुनाव के दौरान, गांधी, नेहरू, इंदिरा, राजीव, गोडसे सबकी बात हुई पर जनता के असल मुद्दे रोजी रोटी शिक्षा और स्वास्थ्य नेपथ्य में ही रहे। भाजपा ने भी अपनी उपलब्धियों का बखान करने से परहेज ही किया, हालांकि विपक्ष ने वे मुद्दे उठाने की कोशिश की।
राष्ट्रवाद भारतीय सन्दर्भ में कोई नई अवधारणा नहीं है, बल्कि यह प्राचीन आख्यानों में भी मिलती है। पर आज जिस राष्ट्रवाद की बात की जा रही है क्या वह आजादी के आंदोलन का सकारात्मक राष्ट्रवाद है या फिर 1937 में हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग की, धर्म ही राष्ट्र है की अवधारणा से उपजा द्विराष्ट्रवाद वाला राष्ट्रवाद है। दोनों ही राष्ट्रवाद के अपने अपने तर्क है। पर आजादी के आंदोलन का राष्ट्रवाद देश की विविधितापूर्ण संस्कृति और बहुआयामी सभ्यता के साथ देश को बांधकर रखने वाला राष्ट्रवाद है जब कि 1937 के बाद का राष्ट्रवाद राष्ट्रभंजक राष्ट्रवाद है। यह राष्ट्रवाद ही पाकिस्तान की अवधारणा का आधार बना और भारत की अवधारणा के विरुद्ध है। कौन किस ब्रांड के राष्ट्रवाद के साथ है यह उसकी अपनी सोच है।
1885 में जब एओ ह्यूम ने इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना की तो उसका उद्देश्य न तो आजादी थी, न ब्रिटिश साम्राज्य में खुदमुख्तारी और न ही भारत के जनगणमन को जगाना था। उसका एक ही उद्देश्य था, एक ऐसा मंच प्रदान करना जहां, आभिजात्य और अंग्रेजी समाज मे पढ़े लिखे लोग एकत्र होकर साम्राज्य के कार्यों की आलोचना कर अपनी भड़ास निकाल सकें। पर तब तक 100 साल पहले हुए भारतीय पुनर्जागरण का असर पड़ चुका था। गुलामी के संताप से लोग ऊब रहे थे और एक राष्ट्रीय सोच विकसित होने लगी थी और भारत के प्रति गर्व और एकता के भाव ने जिस राष्ट्रवाद को विकसित किया वह सकारात्मक राष्ट्रवाद था, जो धर्म, जाति और क्षेत्र से परे था। उसमें बदरुद्दीन तैयब जी भी थे, दादा भाई नौरोजी भी थे और व्योमेश चंद्र बनर्जी भी थे। उसका उद्देश्य राष्ट्रीय चेतना को जगाना और अपनी अस्मिता को पहचानना था। बाद में सेफ्टी वाल्व थियरी पर गढ़ी गई कांग्रेस में तिलक जैसी महान प्रतिभा का आगमन होता है और इस समूह का स्वरूप ही बदल जाता है। तिलक, अंग्रेजों के लिए एक समस्या थे और जब आजाद होने का इरादा, शायद ही कुछ लोगों के मन मे पनपा हो तब, स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है का ब्रिटिश राज की अदालत में उद्घोष कर साम्राज्य में खलबली मचा दी थी। यह तिलक का राष्ट्रवाद था, जो ब्रिटिश राज से मुक्ति चाहता था। तिलक को अंग्रेजों ने भारतीय विक्षोभ का पिता, फादर आॅफ द इंडियन अनरेस्ट कहा था। फिर तो जो चेतना जागृत हुई वह बराबर फैलती गई और भारत एक राष्ट्र के रूप में अपनी आजादी के लिए प्रत्यूष पथ पर चल पड़ा।
1925 में आरएसएस की स्थापना होती है और संघ जिस राष्ट्रवाद की बात करता है वह राष्ट्रवाद, स्वाधीनता संग्राम के राष्ट्रवाद से अलग है। स्वाधीनता संग्राम का राष्ट्रवाद सकारात्मक राष्ट्रवाद था और भारतीय आत्मा को प्रतिविम्बित करता हुआ, जाति, धर्म, और क्षेत्र से परे था। पर संघ का राष्ट्रवाद उदार नहीं था बल्कि वह आक्रामक राष्ट्रवाद था। धर्म केंद्रित राष्ट्रवाद था। संघ के राष्ट्रवाद और वैचारिक पृष्ठभूमि में यूरोप के दो देशों इटली और जर्मनी के श्रेष्ठतावादी राष्ट्रवाद का प्रभाव था। उधर मुस्लिम लीग के गठन से देश के साम्प्रदायिक सद्भाव को नुकसान पहुंचा और एक ही देश मे दो अलग अलग राष्ट्र के बीज पड़ने लगे। मुस्लिम साम्प्रदायिक राजनीति ने हिंदुत्व के उभार को उकसाया। हालांकि जनता में इसका प्रभाव बहुत कम था।
जनता कांग्रेस के मूल स्वरूप जो उदार और धर्मनिरपेक्ष था, के साथ बनी रही। 1920 के बाद में भारत मे साम्प्रदायिक राजनीति की जड़ें जमनी शुरू हो गई थी। दंगे भी छिटपुट होने लगे थे। धार्मिक और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण भी होने लगा था। अंग्रेजों को इस साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से यह लाभ हुआ कि उनका साझा दुश्मन अब आपस मे ही लड़ने लगा। इस साम्प्रदायिक विवाद और झगड़े से न केवल आजादी की लड़ाई कमजोर हुई बल्कि अंग्रेजों को जिस साझी चुनौती से खतरा था वह लगभग खत्म होने लगी। अंत मे जब अंग्रेज देश बांट कर जाने लगे तो जो भयंकर नरसंहार हुआ उसमें एक भी अंग्रेज नहीं मरा। मरे तो केवल हिंदू और मुस्लिम।
1937 आते आते राष्ट्रवाद का एक और रूप सामने आ गया जिसे वीडी सावरकर ने गढ़ा। सावरकर स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा थे, अंग्रेजों ने उन्हें अंडमान के सेलुलर जेल में बड़ी यातनाएं दीं पर वह टूट गए और माफीनामा देकर जेल से मुक्त हुए। वे हिन्दू महासभा के नेता बने और 1937 में राष्ट्रवाद की जो व्याख्या उन्होंने दी वह सकारात्मक राष्ट्रवाद से बिल्कुल अलग थी और वह धर्म आधारित राष्ट्रवाद था। मुस्लिम लीग के अंदर भी मुस्लिम कौम, और उसके अलग होने की सुगबुगाहट चल ही रही थी, अंतत: 1940 आते-आते धर्म ही राष्ट्रवाद है के आधार पर द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत जिन्ना और सावरकर ने घोषित कर दिया। जिन्ना ने इसी द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के आधार पर देश के बांटने की रूपरेखा तैयार की और 1940 से 1945 तक जब कांग्रेस के सभी बड़े नेता अंग्रेजों के खिलाफ थे, 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था, दुनिया द्वितीय विश्वयुद्ध से त्रस्त थी, तब हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग ने एक साथ मिलकर साझा सरकारें चलाईऔर बंटवारे की रूप रेखा बनी।
जब बंटवारा हुआ तो जिन्ना ने अपने कौम के लिए एक अलग मुल्क तो ले लिया, पर भारत ने जो रास्ता चुना वह भारतीय राष्ट्रवाद का चुना जो धर्मनिरपेक्षता का था। सावरकर और हिन्दू महासभा उस समय भी हिंदू समाज द्वारा ही नकार दिये गए थे। गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष, आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खान आदि कांग्रेस के जितने भी बड़े नेता थे, वे सभी धर्मनिरपेक्ष भारत के पक्ष में थे। हालांकि भौगोलिक कारणों से खान अब्दुल गफ्फार खान अपने प्रदेश को धर्मांधता से नहीं बचा पाये। लेकिन सावरकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी पाकिस्तान के जवाब में हिन्दुराष्ट्र के पक्ष में थे। पर बहुसंख्यक जनता ने उनके द्विराष्ट्रवाद को नकार दिया । भारत की यह अवधारणा पिछले पांच हजार साल से प्रवाहित है। पर राष्ट्र को धर्म के आधार पर विभाजित करने के दुष्चक्र की शुरूआत 1930 के दशक से शुरू होकर 1947 तक यह पूरी भी हो गई। यह अंग्रेजों की कुटिल चाल थी और धर्म ही राष्ट्र है को मानने वालों का गठजोड़ कि भारत दो भागों में बंट गया। अक्सर अखंड भारत के पैरोकार देश की एकता की चिंता करते हुए दिखते हैं पर क्या किसी भी प्रकार का अखंड भारत समाज मे धार्मिक मतभेद और साम्प्रदायिक वैमनस्य के साथ संभव है ? कदापि नहीं। साम्प्रदायिक उन्माद भी फैले, धर्म आधारित राष्ट्र का निर्माण भी हो, और देश अखंड भी बना रहे, यह कैसे संभव है? जिस दिन पुन: धर्म आधारित राष्ट्र की बात की जाने लगेगी उसी दिन न केवल भारत की अवधारणा का अंत शुरू हो जाएगा बल्कि वह विघटन की ओर एक दु:खद कदम होगा। पर भारतीय इतिहास की जिजीविषा और समावेशी प्रवित्ति को देखते हुए ऐसा संभव भी नहीं है।
अंत मे जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में ‘भारत के समग्र इतिहास में हम दो परस्पर विरोधी और प्रतिद्वंद्वी शक्तियों को काम करते देखते हैं। एक तो वह शक्ति है, जो बाहरी उपकरणों को पचाकर समन्वय और सामंजस्य पैदा करने की कोशिश करती है, और दूसरी वह, जो विभाजन को प्रोत्साहित करती है।’ भारत आज जो कुछ भी है, उसकी रचना में जनता के प्रत्येक भाग का योगदान है। और यदि हम इस बुनियादी बात को नहीं समझ पाते तो हम भारत को भी समझने में असमर्थ होंगे। सच तो यह है कि, कोई भी देश नारों और विपन्नता से एक और अखंड नहीं रह सकता है। जब तक देश और देश की जनता आर्थिक रूप से समृद्ध और स्वावलंबी नहीं बनती है तब तक राष्ट्रवाद के सारे नारे, बस मन बहलाने के साधन हैं। धर्म भी विपन्नता में क्षीण होने लगता है। भंजक और युयुत्सु धर्म आधारित राष्ट्रवाद देश की हानि ही करता है न कि देश को अखंडता की ओर ले जाता है।
विजय शंकर सिंह
(लेखक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी हैं)

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