Home संपादकीय तीन तलाक विधेयक जगाता न्‍याय की उम्‍मीद : डॉ. निवेदिता शर्मा

तीन तलाक विधेयक जगाता न्‍याय की उम्‍मीद : डॉ. निवेदिता शर्मा

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भारत में मुस्‍लिम महिलाएं सदियों से तीन तलाक के नाम पर अन्‍याय सह रही हैं। जब दुनिया के कई देशों में ट्रिपल तलाक अमान्‍य कर दिया गया हो, वहां इसके लिए भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में मान्‍यता का बना रहना अब तक यही बता रहा है कि हमारे समाजिक एवं कानूनी ढ़ॉचे में कमियां किस हद तक हैं। इसी के साथ एक बुनियादी सवाल यह भी है कि जब निकाह के लिए लड़की का कुबूलनामा जरूरी होता है तो तलाक में उसके कुबूलनामे को अहमियत क्यों नहीं दी जाती?

भारत में जो मुस्‍लिम विद्वान और कानून के जानकार इसके दुष्‍परिणामों को देखकर भी जिस तरह से इसका समर्थन आज भी लगातार कर रहे हैं, उन्‍हें यह जरूर समझना चाहिए कि जब विश्‍व में कट्टरता के प्रतीक बन चुके पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित 22 मुस्लिम देशों ने पूरी तरह से इस प्रथा को खत्म कर दिया है, फिर वह क्‍यों इसे भारत जैसे सहिष्‍णु देश में बने रहते देखना चाहते हैं? इसीलिए मुस्‍लिम महिलाओं के हक में पहले सर्वोच्च न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक है ही, किंतु जो हाल ही लोकसभा में मोदी सरकार ने ट्रिपल तलाक बिल प्रस्‍तुत किया और उसे ध्‍वनि मत से पास कराया है और आगे वह इसे अतिशीघ्र राज्यसभा में प्रस्‍तुत कर पास करवाने के लिए प्रयत्‍न करेगी, उसकी जितनी तारीफ की जाए आज कम ही होगी । वास्‍तव में यह केंद्र की भाजपा सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक जीत होने के साथ ही इस मायने में भी अहम है कि इससे सीधे देश की नौ करोड़ मुस्लिम महिलाओं को वैवाहिक संबंधों में समानता के स्‍तर पर न्‍याय मिल सकेगा और प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष रूप से उनके ऊपर होनेवाले अत्‍याचारों में कमी आएगी।

देश के लिए जरूर राजनीतिक स्‍तर पर यह दुर्भाग्‍यपूर्ण कहा जाएगा कि केंद्र में एक तरफा 50 सालों से अधिक समय तक का राज कांग्रेस सरकारों का रहा है, लेकिन उसने एक वर्ग को तुष्‍टीकरण की राजनीति का शिकार बनाते हुए उसकी कुप्रथाओं को कभी छुआ तक नहीं। अगर राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने शाहबानो प्रकरण में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटा नहीं होता तो शायद इस विधेयक की नौबत ही नहीं आती। अगर तब वोट बैंक की राजनीति को प्राथमिकता नहीं दी गई होती तो संभवतया मुस्लिम समाज अब तक तीन तलाक की मनमानी प्रथा के साथ ही अन्य अनेक कुरीतियों से मुक्त हो गया होता, इसमें कोई संदेह नहीं है। हम यह भी कह सकते हैं कि यदि मोदी सरकार जिस तरह से आज मुस्‍लिम समाज की कुप्रथाओं को दूर करने के लिए कानून बनाकर प्रयत्‍न कर रही है, वह यदि पूर्व सरकारों में हो जाते तो अब तक जो कई हजार महिलाएं इस तरह की कुप्रथा की शिकार हुईं उनका जीवन बर्बाद नहीं होता।

हम सभी जानते हैं कि शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक, बहुविवाह और हलाला के मुद्दे को चुनौती दी थी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट की ओर से एक झटके में दिए जाने वाले तीन तलाक को अमान्य-असंवैधानिक करार दिए गया था फिर भी देशभर में मनमाने तलाक के मामले सामने आ रहे हैं, जिसे देखते हुए उस पर कानून बनाना आवश्यक हो गया। इस तरह लोकसभा में आगे राज्‍यसभा में तीन तलाम पर लाए गए बिल को पास कराकर मोदी सरकार एक तरह से जहरीले पेड़ की जड़ों में मठा डालने जैसा कार्य कर रही है। इसी से आगे होकर बहुविवाह और हलाला जैसी कुप्रथाओं को पूर्णत: समाप्‍त करने को बल मिलेगा। दूसरी ओर इस निर्णय से मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सरीखे संगठन, एआइएमआइएम नेता असदुद्दीन ओवैसी और बीजू जनता दल के सांसद भर्तृहरि महताब जैसे नेताओं को भी सबक मिलेगा जोकि शरीयत का गलत हवाला दे करके अपने ही समाज को गुमराह करने में लगे हुए हैं।

तीन तलाक संबंधी मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक के कानून बन जाने के बाद होगा यह कि मुस्लिम वुमेन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन मैरिज जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू हो जाएगा। इससे एक बार में तीन तलाक गैरकानूनी तो होगा ही साथ में यह संज्ञेय और गैर जमानती अपराध भी होगा। इसमें दोषी पति को तीन साल तक की कैद और जुर्माने की सजा का प्रावधान किया गया है जोकि मुस्‍लिम पुरुष समाज को सह सबक है कि गलती करी तो कानून अपना काम करेगा। इसके कारण से अब तीन तलाक का हर रूप चाहे वह लिखित हो, बोला गया हो या इलेक्ट्रॉनिक रूप में हो, गैरकानूनी होगा और पीड़ित महिला मजिस्ट्रेट की अदालत में गुजारा भत्ता और नाबालिग बच्चों की कस्टडी मांग सकेगी।

इसमें भी यह राजनीतिक स्‍तर पर अच्‍छा हुआ है कि कांग्रेस ने लोकसभा में इस विधेयक अपना समर्थन देकर एक तरह से अपनी 37 साल पुरानी भूल को सुधारा है। यदि यह कमी पूर्व में शाहबानों प्रकरण में ही दूर करली होती तो आज देश का परिदृश्‍य कुछ ओर ही होता। लोकसभा में तीन तलाक पर बिल पेश करते हुए कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जो कहा, उसका भाव देश के हर नागरिक को अपनी धार्मिक मान्‍यताओं से ऊपर उठकर समझना होगा। उन्‍होंने कहा कि इस बिल को किसी मजहब के खिलाफ नहीं माना जाना चाहिए। ये बिल उन पीड़ित महिलाओं को संरक्षण देगा जो वर्षों तक तलाक-ए-बिद्दत यानि एक ही बार में तीन तलाक की शिकार थीं।

उम्मीद है कि अब ऐसे तमाम धर्मांध लोगों को यह समझ आ गया होगा कि वे समाज सुधार का रास्ता नहीं रोक सकते। यह एक तथ्य है कि सती प्रथा, दहेज की कुरीति और बाल विवाह के खिलाफ कानून बनाए गए। इन कानूनों ने इन प्रथाओं पर समय के साथ लगाम लगाने का काम किया तो इसलिए भी कि हिन्‍दू समाज में इन मुद्दों को लेकर जागरुकता आई थी। इसी जागरूकता की जरूरत तीन तलाक के चलन को खत्म करने के मामले में भी है। इसमें और अच्‍छा तब होगा जब ऐसे समाज सुधार के मामलों में राजनीतिक इच्‍छा शक्‍ति के साथ ही धार्मिक नेता सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए आगे आएंगे।

लेखिका,पत्रकारिता के साथ अटल बिहारी वाजपेयी हिन्‍दी वि.वि. में अध्यापन कार्य से जुड़ी हैं।

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