Home संपादकीय पल्स Modi’s victory demolished the chatrap’s delusion: मोदी की जीत ने ध्वस्त किया क्षत्रपों का मायाजाल

Modi’s victory demolished the chatrap’s delusion: मोदी की जीत ने ध्वस्त किया क्षत्रपों का मायाजाल

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17वीं लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी दोबारा बड़ी ताकत के साथ जीते हैं। एनडीए के सभी 39 दलों ने उन्हें बगैर किसी हिचक के अपना नेता चुन लिया है। उनकी भारी जीत भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कुशल प्रबंधन के साथ ही मोदी की नीतियों की स्वीकार्यता के कारण मिली है। देश के मतदाताओं ने मोदी पर भरोसा जताया है। उन पर 2014 में भी मतदाताओं ने भरोसा जताया था और जनता ने अपने रिपोर्ट कार्ड में उन्हें 303 अंकों से पास किया है। कई राज्यों में विरोधी दलों को खाता खोलने तक का विश्वास नहीं मिल सका। इतने भारी जनादेश से जनता की उम्मीदें भी भारी हैं। मोदी ने नेता चुने जाने के बाद स्पष्ट किया कि घर के पूजाघर में चाहे जो पूजिए मगर देश में भारत माता सबसे बड़ी देवी हैं। उनकी इस बात में दम भी है क्योंकि उनको जीत भाजपा के राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक रूख के कारण ही मिली है। सैन्य सम्मान के नाम पर जिस तरह से उन्होंने सेना को चुनावी मुद्दा बनाया, उसके लिए भी जनमत मिला है। ऐसे में उनका वैश्विक संबंधों को लेकर स्पष्ट रूख सकारात्मक है।
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने भले ही जनता और युवाओं से जुड़े मुद्दे उठाए मगर जनता ने उसे तरजीह नहीं दी। वह राष्ट्रवाद की कहानी पर ही मुहर लगाती रही। कांग्रेस में जो सबसे बड़ी कमी देखने को मिली वह उसमें नेताओं की भीड़ दिखी मगर कार्यकर्ताओं का टोटा था। कई जगह तो बूथ संभालने वाले भी नहीं थे। राहुल गांधी अपनी बहन प्रियंका के साथ देशभर में जूझते रहे मगर उसका प्रभाव उतना नहीं छोड़ सके जो चाहते थे। इस दौरान मोदी के अंडरकरेंट से जो सबसे बड़ा काम हुआ, वह राज्यों के क्षत्रपों का सफाया है। कांग्रेस के 9 पूर्व मुख्यमंत्री और कई पूर्व केंद्रीय मंत्री जो खुद को अपने इलाकों राज्यों का ठेकेदार समझते थे, बोरिया बिस्तर समेटते नजर आए। कांग्रेस राहुल के नेतृत्व में 44 से 52 सीटों पर पहुंच गई, हालांकि यूपी में वह अपनी अमेठी सीट भी हार गए। मोदी इतने बड़े कद के साथ खड़े हुए हैं कि बिहार में खुद को जननेता समझने वाले नितिश कुमार सूबेदार की तरह खड़े थे तो महाराष्ट्र में शिवसेना के रथ पर सवार उद्धव ठाकरे मोदी प्रार्थना में शामिल दिखे। यही हालत अन्य तीन दर्जन दलों की भी रही।
सर्वविदित है कि क्षत्रपों ने देश को जाति-धर्म और क्षेत्रवाद की सियासत करके देश को बांट रखा है। इसी सियासत के बूते सपा-बसपा और रालोद मिलकर यूपी जीतने निकले थे। उनका अहम इतना अधिक था कि उन्होंने राष्ट्रीय दल कांग्रेस को अपने गठबंधन में जगह तक नहीं दी। बंगाल में ममता दहाड़ रही थीं तो नागालैंड और कश्मीर में अलगाववादियों का शोर था। मोदी के अंडरकरेंट ने इन सब को उनकी औकात दिखा दी है। इनके लिए अपने कुनबे को बचाना भी मुश्किल हो गया। इससे देश और भाजपा को जो फायदा हुआ, वह तो दिखता है मगर दूसरा फायदा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को भी हुआ है। कांग्रेस को राज्यों में बुरी गति तक पहुंचाने वाले पूर्व मुख्यमंत्रियों की वह जमात जो राहुल पर गुरार्ती थी, अब सदमे में है। कांग्रेस ने जो 52 सीटें जीती हैं, उनमें 48 राहुल टीम के सदस्य हैं। ऐसे में उनके लिए भविष्य की राजनीति आसान हो गई है, हालांकि उन्हें मजबूत होने के लिए कड़ी मेहनत और रणनीति के साथ ही संसाधनों की जरूरत है। कांग्रेस और उसके नेताओं ने सदैव खुद को बनाने की राजनीति की है जबकि मोदी के नेतृत्व में भाजपा नेताओं ने मोदी और पार्टी को समृद्ध किया है। राहुल को भी उसी तरह की फौज तैयार करनी होगी।
इस बार जीत भाजपा की नहीं बल्कि मोदी की है। इसका प्रमाण दो दर्जन ऐसे लोग हैं जो सांसद बने हैं। उनका सियासी रिश्ता महीने भर का भी नहीं है। अकूत धनबल से चले चुनाव अभियान में पांच साल पहले किए गए अच्छे दिनों के वादे को पीछे छोड़ दिया गया। उसकी जगह हिंदुओं के दिमाग में मुसलमानों को लेकर भय पैदा करने और मोदी को आतंकवाद को खत्म करने वाले एकमात्र नेता के तौर पर पेश किया गया। मोदी ने पुलवामा के आत्मघाती हमले में शहीद हुए अर्धसैनिक बलों के जवानों का इस्तेमाल चुनावी हथियार के तौर पर खुलेआम किया। उनके नाम पर वोट मांगने से भी वह नहीं चूके। मुख्य विपक्षी कांग्रेस के पास इस राष्ट्रवादी रणनीति का कोई तोड़ नहीं था। आपने भारतीय सेना को मोदी सेना के तौर पर प्रस्तुत किया। चुनाव आयोग ने भी इस प्रचार अभियान की तरफ देखना मुनासिब नहीं समझा। उसने मोदी के मामले में तुलसीदास की चौपाई ‘मीचऊ आंख कतऊं कछु नाहीं’ को अपना लिया। विरोधी दल चिल्लाते रह गए मगर चुनाव आयोग ने चुप्पी साधे रखी। बहराल, सबसे बड़ी जनता होती है और उस जनता जनार्दन ने मोदी की हर गलती को भी सराहा, नतीजतन वह दोबारा प्रधानमंत्री की शपथ लेने जा रहे हैं।
मोदी ने जीत के बाद अपने पहले संबोधन में स्पष्ट किया कि वह सकारात्मक राजनीति की दिशा में बढ़ रहे हैं। भले ही 2014 में उन्हें जनता न जानती हो मगर वह जनता के दर्द को समझते थे। उस पर काम किया और अब दोनों एक दूसरे को जानते हैं। जनता ने जो विश्वास जताया है, उसको पूरा करना उनकी जिम्मेदारी है। मोदी ने सही कहा, उनकी जिम्मेदारी जीत के आंकड़े के साथ ही बढ़ गई है। यह समझना होगा कि दो कारण होते हैं किसी के प्रति खड़े होने के, पहला डर और दूसरा लालच। इस बार दोनों ही शामिल थे। पहला, मोदी के नाम का डर तमाम लोगों के भीतर बैठा हुआ था तो दूसरी ओर उस जनता के भीतर लालच था, जो उनसे संतुष्टि पाने को खड़ी थी। नफरत और झूठ की भी इस चुनाव में बड़ा अहम भूमिका थी। किसी को किसी खास संप्रदाय से नफरत है तो किसी को किसी जाति वर्ग से। इसका तुष्टीकरण मोदी के नाम को आगे बढ़ाने से हो रहा था। दूसरी तरफ राहुल गांधी के नेतृत्व में एक बार फिर से कांग्रेस पर यकीन बढ़ा है। उसका वोट शेयर और सीटें बढ़ी हैं मगर उनकी औकात सीमित कर दी गई है। कांग्रेस अपने गढ़ भी नहीं बचा सकी। कांग्रेस अपने से टूटे नेताओं को भी यकीन नहीं दिला सकी। उसके नेता पांच साल सत्ताविहीन रहने के बाद भी घमंड में चूर नजर आए। उन्होंने अतीत से सीखने की जरूरत नहीं समझी। इंदिरा गांधी ने 1977 की हार के बाद सरल होना सीख लिया था। पीएम रहते वह जब कांग्रेस पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष पंडित कमलापति त्रिपाठी के पास मिलने पहुंचीं, तो वह पूजा कर रहे थे। उनकी बहूजी ने कहा अभी डेढ़ घंटा लगेगा। इंदिरा गांधी ने वहीं बैठकर उनका इंतजार किया।
नरेंद्र मोदी ने भी शुक्रवार को जीत के दंभ को भूलकर भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के लाल कृष्ण आडवाणी और डॉ. मुरली मनोहर जोशी के घर जाकर चरण वंदन किया। इसके भले ही कोई भी सियासी मायने निकाले जाएं मगर कांग्रेस को भी यह सीखने की जरूरत है। उसे उस जनता के पास जाना होगा जो उनकी मार्गदर्शक और जनार्दन है। उसके भीतर विश्वास जगाना होगा। मोदी ने जिन क्षत्रपों को खत्म किया है, उनसे किनारा करके खुद को जननेता बनाने की दिशा में काम करना होगा। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक इस सकारात्मक जनादेश का फायदा जनता को नहीं मिल पाएगा। यह अच्छा अवसर मिला है भाजपा को कि वह उन सभी वादों को पूरा करे जो उसने किए थे और कांग्रेस जनता के बीच जाकर उनकी बात शुरू करे। अपने दल के संगठन को जमीनी स्तर पर तैयार करें। सशक्त ढांचा तैयार करें।
जय हिंद।

अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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